Image Slider

 

Dhanrajgir Palace Hyderabad: निज़ामों के शहर हैदराबाद में स्थित 136 साल पुराना ज्ञान बाग पैलेस अपनी अनूठी इतालवी और पैलाडियन वास्तुकला के लिए जाना जाता है. कभी शाही वैभव और फिल्मी शूटिंग का केंद्र रहा यह ऐतिहासिक महल आज उपेक्षा और रखरखाव की कमी के कारण अपनी पहचान खोता जा रहा है. संरक्षण के अभाव में शहर की यह दुर्लभ धरोहर अस्तित्व के संकट से जूझ रही है.

हैदराबाद. निज़ामों के शहर हैदराबाद की आलीशान गलियों में सिमटी सदियों पुरानी वास्तुकला आज वक्त की मार झेल रही है. इसी ऐतिहासिक विरासत का एक गुमनाम हिस्सा है नामपल्ली और अघापुरा के समीप स्थित ज्ञान बाग पैलेस यानी धनराजगीर पैलेस. साल 1890 के आसपास बना यह महल अपनी अनोखी यूरोपीय और इतालवी शैली के लिए जाना जाता है. कभी शहर की सबसे भव्य संपत्तियों में शुमार यह धरोहर, आज प्रशासनिक उपेक्षा और देखरेख की कमी के कारण गुमनामी के अंधेरे में खोती जा रही है.

हैदराबाद की बहुतायत ऐतिहासिक इमारतों में जहां कुतुबशाही, मुगल या ठेठ आसफ जाही वास्तुकला की छाप दिखाई देती है, वहीं ज्ञान बाग पैलेस अपनी अनूठी इतालवी और पैलाडियन शैली के कारण बिल्कुल जुदा नज़र आता है. लगभग 30,000 वर्ग फीट के विशाल क्षेत्र में फैले इस आलीशान महल का निर्माण उस दौर के सबसे रसूखदार बैंकर, साहूकार और गोसाई राजघराने के प्रमुख राजा धनराजगीरजी बहादुर ने करवाया था. बारीक नक्काशीदार चूना-पत्थर और सुदूर देशों से मंगाए गए बेहतरीन संगमरमर से निर्मित यह महल कभी हैदराबाद की सबसे कीमती और राजसी संपत्तियों की फेहरिस्त में शीर्ष पर था.

कई फिल्मों के सीन भी यहां फिल्माए

सांस्कृतिक और सिनेमाई गलियारों से भी इस पैलेस का गहरा नाता रहा है. सत्तर के दशक में राजेश खन्ना अभिनीत प्रसिद्ध बॉलीवुड फिल्म महबूब की मेहंदी और कालजयी तेलुगु फिल्म मुत्याला मुग्गु के कई ऐतिहासिक दृश्यों को इसी पैलेस की भव्यता के बीच फिल्माया गया था. हालांकि, वर्तमान में यह महल एक निजी संपत्ति के रूप में तब्दील हो चुका है, जिसके कारण इसके भारी-भरकम मुख्य द्वार अक्सर बंद रहते हैं और आम जनता या पर्यटकों को इसके भीतर जाने की अनुमति नहीं मिलती है. उचित रख-रखाव के अभाव और लगातार बदलती शहरी सीमाओं के कारण इस अद्भुत संरचना का बाहरी हिस्सा धीरे-धीरे अपनी चमक खो रहा है. शहर के इतिहासकारों और धरोहर संरक्षकों का कहना है कि यदि समय रहते इस निजी ऐतिहासिक परिसर के संरक्षण के लिए सरकार या पुरातत्व विभाग द्वारा कोई ठोस नीति नहीं बनाई गई तो हैदराबाद अपनी एक बेहद नायाब और दुर्लभ स्थापत्य कला की निशानी को हमेशा के लिए खो देगा.

About the Author

 

authorimg

 

Monali Paul

नमस्ते मेरा नाम मोनाली है, पेशे से पत्रकार हूं, ख़बरें लिखने का काम है. लेकिन कैमरे पर समाचार पढ़ना बेहद पसंद है. 2016 में पत्रकारिता में मास्टर्स करने के बाद पांच साल कैमरे पर न्यूज़ पढ़ने के साथ डेस्क पर खबरे…और पढ़ें

———-

🔸 स्थानीय सूचनाओं के लिए यहाँ क्लिक कर हमारा यह व्हाट्सएप चैनल जॉइन करें।

 

Disclaimer: This story is auto-aggregated by a computer program and has not been created or edited by Ghaziabad365 || मूल प्रकाशक ||