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Sulatanpur History: 1857 की पहली क्रांति में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले ने अंग्रेजी हुकूमत की जड़े हिला दी थीं. इस बगावत से अंग्रेज इस कदर खौफजदा हो गए थे कि उन्होंने तोप चलाकर पूरे पुराने सुल्तानपुर शहर को ही उड़ा दिया था और बाद में गोमती नदी के किनारे नया शहर बसाया. सुल्तानपुर के रणबांकुरों के इस हैरतअंगेज हौसले का असर ऐसा था कि इसकी गूंज सीधे सात समंदर पार लंदन की ब्रिटिश पार्लियामेंट में भी सुनाई दी थी. आइए जानते हैं सुल्तानपुर के इस गौरवशाली और रोंगटे खड़े कर देने वाले इतिहास की पूरी कहानी.

सुल्तानपुर: देश की आजादी की लड़ाई में उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता. इस मिट्टी ने जनरल बख्त खां, संगम लाल गुप्ता और बाबा रामलाल मिश्र जैसे महान स्वतंत्रता सेनानी देश को दिए, जो आजादी की लड़ाई में सुल्तानपुर के मुख्य स्तंभ बनकर खड़े रहे. यही वजह थी कि जब सन 1857 की पहली क्रांति की लपटें उठीं, तो सुल्तानपुर के चांदा, भदैंया, गभड़िया, फिरोजपुर, दाउदपुर और कादू नाला के मैदानों में अंग्रेजों के खिलाफ ऐसी जंग छिड़ी कि ब्रिटिश सरकार कांप उठी थी.

इस क्रांति में सुल्तानपुर जनपद से कुल मिलाकर 60,000 से अधिक रणबांकुरों ने अपनी जान की बाजी लगा दी थी, जिसमें हजारों देशभक्त शहीद हुए. आजादी के दीवानों के इस तेवर से अंग्रेज इस कदर बौखला गए कि उन्होंने गुस्से में प्राचीन यानी पुराने सुल्तानपुर को तोप से उड़ाकर पूरी तरह तहस-नहस कर दिया. इसके बाद अंग्रेजों ने गोमती नदी के दक्षिणी किनारे पर ‘गिरगिट गांव’ में एक नया सुल्तानपुर बसाया, जो आज का सुल्तानपुर शहर है. पुराने मुख्यालय को नष्ट करने के बाद अंग्रेजों ने वहां इतनी पाबंदी लगा दी थी कि 15 अगस्त 1947 से पहले तक वहां शाम को दीपक जलाने तक की इजाजत नहीं थी.

जब ब्रिटिश पार्लियामेंट में गूंजा सुल्तानपुर का नाम
वरिष्ठ पत्रकार विक्रम बृजेंद्र सिंह ने लोकल 18 को बताया कि 1857 के गदर में सुल्तानपुर का पराक्रम इतना जबरदस्त था कि इसकी गूंज सीधे ब्रिटिश पार्लियामेंट तक पहुंची. जब वहां भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर चर्चा हो रही थी, तो प्रसिद्ध ब्रिटिश सांसद डिजरायली ने अपने ऐतिहासिक भाषण में सुल्तानपुर का खास तौर पर जिक्र किया और यहां के लोगों के संघर्ष की कहानी पूरी दुनिया के सामने रखी. हालांकि, बाद में रानी विक्टोरिया की घोषणा के बाद यह विद्रोह धीरे-धीरे शांत हो गया, लेकिन ब्रिटिश संसद में सुल्तानपुर के संग्राम की चर्चा होना इतिहास के पन्नों में हमेशा के लिए अमर हो गया.

राजाओं और तालुकेदारों की जप्त कर ली थी संपत्ति
1857 की क्रांति के बाद, बगावत का रास्ता अपनाने वाले यहां के कई राजाओं और तालुकेदारों ने ब्रिटिश हुकूमत के सामने घुटने टेक दिए थे. लेकिन कुछ ऐसे भी जांबाज थे जो आखिरी सांस तक अंग्रेजों से लोहा लेते रहे और कभी आत्मसमर्पण नहीं किया. नतीजा यह हुआ कि अंग्रेजों ने उनकी पूरी संपत्ति और रियासत को जप्त कर लिया. इसके बाद, 15 मार्च 1858 को गवर्नर जनरल की एक नई घोषणा आई, जिसके तहत जिन तालुकेदारों ने आत्मसमर्पण कर दिया था, उन्हें उनके भू-भाग वापस लौटा दी गईं.

इतिहास के पन्नों में दर्ज है यह गौरवगाथा
आज भले ही देश की राजधानी दिल्ली से दूर सुल्तानपुर जिला विकास के मामले में अन्य बड़े शहरों से थोड़ा पीछे दिखता हो, लेकिन इसके शानदार इतिहास का कोई मुकाबला नहीं है. ‘फ्रीडम स्ट्रगल इन उत्तर प्रदेश’ (किताब के खंड 2) में भी साफ-साफ दर्ज है कि ब्रिटिश पार्लियामेंट में सांसद डिजरायली के भाषण ने सुल्तानपुर की सामंती व्यवस्था और यहां के विद्रोह को दुनिया भर में पहचान दिलाई थी. सुल्तानपुर की मिट्टी का यह गौरवशाली इतिहास आज भी यहां के लोगों के सीने को गर्व से चौड़ा कर देता है.

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Seema Nath

सीमा नाथ 6 साल से मीडिया के क्षेत्र में काम कर रही हैं. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत शाह टाइम्स में रिपोर्टिंग के साथ की जिसके बाद कुछ समय उत्तरांचल दीप, न्यूज अपडेट भारत के साथ ही लोकल 18 (नेटवर्क18) में काम …और पढ़ें

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