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अमेजन प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हुई वेब सीरीज ‘राख’ इन दिनों काफी चर्चा में है. यह सीरीज देश के सबसे खौफनाक और दिल दहला देने वाले ‘रंगा-बिल्ला कांड’ पर आधारित है. अली फजल और सोनाली बेंद्रे स्टारर यह क्राइम ड्रामा करीब 48 साल पुराने एक ऐसे जख्म को कुरेदता है, जिसने पूरे भारत को हिलाकर रख दिया था. क्या था 70 के दशक में हुआ ‘रंगा-बिल्ला कांड’ चलिए बताते हैं.

नई दिल्ली. साल 1978 में दिल्ली में हुआ ‘रंगा-बिल्ला’ कांड देश के सबसे खौफनाक अपराधों में गिना जाता है. 16 साल की गीता चोपड़ा और 14 साल के संजय चोपड़ा घर से एक कार्यक्रम में हिस्सा लेने निकले थे, लेकिन कभी वापस नहीं लौटे. दो दिन बाद दोनों के शव मिलने से पूरे देश में सनसनी फैल गई थी. इस मामले ने न सिर्फ लोगों को झकझोर दिया, बल्कि बच्चों की सुरक्षा को लेकर गंभीर बहस भी छेड़ दी. अब करीब 48 साल बाद यही दर्दनाक कहानी वेब सीरीज ‘राख’ के जरिए फिर चर्चा में है. सीरीज उस भय, दुख और इंसाफ की लड़ाई को पर्दे पर उतारती है, जिसने कभी पूरे देश को हिलाकर रख दिया था.

Nearly five decades after two young siblings left home for what should have been an ordinary evening, their story is once again finding a new audience through Raakh, the gripping crime drama now streaming on Prime Video.

अमेजन प्राइम वीडियो पर 12 जून 2026 को स्ट्रीम हुई. इस 8 एपिसोड की सीरीज में अली फजल, सोनाली बेंद्रे, आमिर बशीर, आकाश माखिजा और राकेश बेदी मुख्य भूमिकाओं में हैं. सीरीज 1970 के दशक की दिल्ली की पृष्ठभूमि में बनी है, जिसमें दो बच्चों के गायब होने के बाद शहर में दहशत फैल जाती है.

Inspired by the infamous 1978 Ranga-Billa case, the series revisits a tragedy that changed India forever, not merely because of its brutality, but because of the courage and memory of the two children at its heart.

साल 1978 की दिल्ली में कानून व्यवस्था को चुनौती देने वाली एक ऐसी घटना घटी, जिसने देश का इतिहास बदल दिया. 26 अगस्त 1978 को नौसेना अधिकारी के दो बच्चे गीता और संजय दोनों ऑल इंडिया रेडियो के ‘युवा वाणी’ कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए घर से निकले थे. वे धौला कुआं से रेडियो स्टेशन के लिए रवाना हुए, लेकिन कभी वहां नहीं पहुंचे. उस शाम भारी बारिश के कारण दोनों भाई-बहन ने एक कार में सवारी ली, लेकिन यह कार ‘रंगा’ यानी कुलजीत सिंह और ‘बिल्ला’ जसबीर सिंह नाम के दो कुख्यात अपराधियों की थी. Image: Instagram/@eksatyanveshi

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On August 26, 1978, Geeta, 16, and her younger brother Sanjay, 14, left their home to participate in a programme at All India Radio. They never reached their destination. Two days later, their bodies were discovered, sending shockwaves across the nation. The case dominated headlines and led to one of the most extensive manhunts of its time.

‘रंगा’ और ‘बिल्ला’ ने दोनों बच्चों को अगवा कर लिया. अपहरण के दौरान दोनों बच्चों ने हार नहीं मानी और अपराधियों से जमकर लोहा लिया. संजय एक मुक्केबाज था और उसने अंत तक मुकाबला किया. कहा जाता है कि गीता ने गाड़ी चला रहे अपराधी के बाल खींचे और राहगीरों से मदद मांगी. कई लोगों ने पुलिस को इसकी सूचना भी दी, लेकिन ज्यूरिस्डिक्शन के विवाद और ढुलमुल रवैये के कारण पुलिस समय पर कार्रवाई नहीं कर सकी. Image: X/@divya_gandotra

The accused, Kuljeet Singh alias Ranga and Jasbir Singh alias Billa, were eventually arrested, convicted and executed in 1982.

शुरू में उन्होंने फिरौती मांगने की योजना बनाई थी, लेकिन जब उन्हें पता चला कि बच्चे एक नौसेना अधिकारी के बच्चे हैं तो मर्डर प्लान किया. रंगा और बिल्ला इन दोनों को बुद्धा गार्डेन की तरफ रिज इलाके में ले गए. वहां उन्होंने एक सुनसान इलाके में कार रोककर पहले संजय चोपड़ा की हत्या की और गीता के साथ बलात्कार किया. दो दिन बाद, 28 अगस्त को दोनों बच्चों के क्षत-विक्षत शव दिल्ली के एक जंगली इलाके से बरामद हुए. संजय के शरीर पर चाकू के 25 से ज्यादा घाव थे. इस क्रूरता ने पूरी दिल्ली को खौफ और गुस्से से भर दिया था. Image: X/@divya_gandotra

But the story of Geeta and Sanjay did not end there. In the years that followed, their bravery came to symbolise resilience. The Indian Council for Child Welfare instituted the Geeta Chopra Award and the Sanjay Chopra Award, honouring children who display exceptional courage. The brave siblings were also awarded the Kirti Chakra posthumously. Their names continue to inspire generations, ensuring that the siblings are remembered not as victims, but as young lives whose legacy transcends tragedy.

वारदात के बाद बिल्ला और रंगा दिल्ली से भागकर पहले मुंबई गए और फिर वहां से आगरा. आगरा से दिल्ली आते हुए वो कालका मेल में गलती से सैनिकों के डिब्बे में चढ़ गए. सैनिकों ने दोनों को पहचान लिया और पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया. अदालत ने दोनों को दोषी ठहराया. बाद में 1982 में उन्हें फांसी दे दी गई. यह मामला उस दौर के सबसे चर्चित अपराध मामलों में गिना जाता है. Image: X/@SushilS27538625

Raakh is more than a crime thriller. It is a reminder of a dark chapter in India's history and a tribute to two children whose memory has endured for nearly 50 years. 

हालांकि, गीता और संजय की कहानी सिर्फ एक अपराध की कहानी बनकर नहीं रह गई. उनकी बहादुरी और संघर्ष को देश ने हमेशा याद रखा. उनकी याद में भारतीय बाल कल्याण परिषद ने गीता चोपड़ा पुरस्कार और संजय चोपड़ा पुरस्कार की शुरुआत की. ये सम्मान उन बच्चों को दिए जाते हैं जो असाधारण साहस का परिचय देते हैं. इतना ही नहीं, गीता और संजय को मरणोपरांत कीर्ति चक्र से भी सम्मानित किया गया था. आज भी उनके नाम साहस और हिम्मत की मिसाल माने जाते हैं.  (Image: Prime Video)

What was horrific 1978 Ranga Billa case True Story Behind Prime Video Raakh

‘राख’ सिर्फ एक क्राइम थ्रिलर नहीं है. यह भारत के इतिहास के एक दर्दनाक अध्याय की याद दिलाती है. साथ ही उन दो बच्चों को श्रद्धांजलि भी है, जिनकी कहानी लगभग पांच दशक बाद भी लोगों के दिलों में जिंदा है. (Image: Prime Video)

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