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लेखक : तरुण मिश्र
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। देश-विदेश में आयोजित होने वाले व्याख्यानों में एक प्रखर वक्ता के रूप में जाने जाते हैं। जनसेवक के रुप में प्रख्यात है।)

घर संभल नहीं रहा, चले हैं दुनिया में शांति की स्थापना कराने ! यह जुमला पाकिस्तान पर एकदम सटीक बैठ रहा है। अमेरिका-ईरान के बीच समझौता कराने के लिए पाकिस्तान काफी उतावला है। वह कभी सरपंच बनकर तो कभी डाकिया की भूमिका निभाकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी छवि को निखारने की नाकाम कोशिश कर रहा है। इसके बावजूद उसे कोई सफलता नहीं मिल रही है। दूसरों के मामलों में टांग अड़ाने से अच्छा है कि वह अपने घरेलू विवादों का शांतिपूर्वक निपटारा करने पर ध्यान दे। ताजा मामला पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) का सामने आया है। पीओके में अचानक भड़की हिंसा ने इस्लामाबाद के इंसानियत विरोधी चेहरे से नकाब उतार दिया है। पीओके में सामने आया जनाक्रोश एक तरह से इस्लामाबाद की नाकामियों को उजागर करता है। वर्तमान में जो हालात वहां नजर आ रहे हैं, वह किसी षड्यंत्र या एकाएक भड़के गुस्से का परिणाम नहीं है। इसके पीछे बरसों का दबा असंतोष है। पीओके में तनाव के कारण इंटरनेट बंद है। सड़कों पर सेना की निगरानी बढ़ चुकी है। सुरक्षाबलों की गोलाबारी में कई नागरिकों की मौत हुई है। संख्या अलग-अलग आ रही है, मगर डराने वाली बात है कि कैसे एक सेना निहत्थे नागरिकों पर अपनी शक्ति आजमा सकती है। इतनी सख्ती के बावजूद नागरिकों में जबरदस्त गुस्सा है।

इस बार यह मामला पीओके की विधानसभा में बारह आरक्षित सीटों को लेकर आरंभ हुआ है। ये सीटें उन शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं, जो जम्मू-कश्मीर से होने का दावा करते हैं। नागरिकों को अंदेशा है कि उनका प्रतिनिधित्व कमजोर होगा और इस्लामाबाद का प्रभाव बढ़ेगा। जनता की चिंता को समझने के बजाय पाकिस्तान ने दमन का रास्ता अपनाया। आम जन की आवाज बनी संयुक्त अवामी एक्शन समिति को आतंकवाद निरोधक कानून के तहत प्रतिबंधित संगठन घोषित कर दिया गया। इससे गुस्सा और भड़क उठा। इस संगठन पर प्रतिबंध का फैसला पाकिस्तान की सबसे बड़ी विफलताओं में से एक है। यह संगठन आम नागरिकों की आम समस्या जैसे महंगाई, बेरोजगारी, प्रशासनिक अव्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर खड़ा था। आज इसे जिस तरह का समर्थन मिल रहा है, उससे स्पष्ट है कि पाकिस्तान के बाकी सियासी दलों पर पीओके को भरोसा नहीं रहा। पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में हर कुछ वक्त बाद आंदोलन भड़क उठता है। तात्कालिक मुद्दे बेशक अलग-अलग लगते हों, पर असल वजह पीओके को लेकर पाकिस्तान की सोच है। अपने तमाम प्रोपेगेंडा के बावजूद पाकिस्तान ने कभी इस क्षेत्र के विकास और जनता की समस्याओं पर ध्यान नहीं दिया।

आज यह पूरा क्षेत्र बदहाली का शिकार है। ऊपर से इस्लामाबाद में बैठी सरकार उनके अधिकारों पर भी डाका डालने की फिराक में रहती है। पाकिस्तान में मानवाधिकारों का उल्लंघन आम है। बलूचिस्तान से लेकर पीओके तक, पूरी कमान वहां की सेना के हाथ में है। राजनीतिक विरोधी और असहमति जताने वाले वहां जिस तरह गायब हो जाते हैं या उनकी हत्या हो जाती हैं, इसे लेकर संयुक्त राष्ट्र भी चिंता जता चुका है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने बिल्कुल ठीक कहा है कि पीओके में पाकिस्तान अपनी विफलताओं को छिपाने का हताशा-पूर्ण प्रयास कर रहा है। पीओके में उपजे तनावपूर्ण हालात से इतर पाकिस्तान ने अफगानिस्तान ने एक बार फिर पंगा ले लिया है। आरोप है कि पाकिस्तान के हवाई हमले में कई निर्दोष नागरिकों की मौत हो चुकी है। इससे दोनों देशों के बॉर्डर पर तनाव गहरा गया है। शांति, सौहार्द एवं खुशहाली का माहौल कायम रखना समय की सबसे बड़ी जरूरत है, मगर दुनिया आज उससे कोसों दूर नजर आती है। एक तरफ अमेरिका-ईरान और दूसरी ओर पाकिस्तान-अफगानिस्तान एक बार फिर आपस में भिड़ गए हैं।

चारों देशों ने एक-दूसरे के खिलाफ सख्त एवं हमलावर रुख अपना लिया है। कुछ दिन की शांति के बाद खून-खराबे का नया दौर शुरू हो गया है। हमला ड्रोन से हो या मिसाइलों से, गोलियां बंदूक से चलाई जाएं या स्वचालित हथियारों से, निशाने पर अक्सर बेकसूर नागरिक भी होते हैं। उन पर मौत का झपट्टा कभी आसमान से पड़ता है तो कभी जमीन से। बात चाहे अमेरिका की हो, ईरान की, पाकिस्तान या अफगानिस्तान की, सच्चाई यह है कि चंद ताकतवर शख्सियतों के अहंकार ने इन मुल्कों में अमन-चैन को दांव पर लगा रखा है। युद्ध मैदान में अमेरिका का घमंड चूर-चूर होने के बाद भी बार-बार सामने आ रहा है। ईरान बर्बादी की कगार पर पहुंच चुका है, मगर वह झुकने या पीछे हटने को तैयार नहीं है।

पाकिस्तान में जनता को खाने के लाले पड़े हैं, मगर मुनीर सेना निर्दोषों पर अपनी ताकत का प्रदर्शन करने में लगी है। अमेरिका की तमाम चेतावनियों को ईरान ने नजरअंदाज कर रखा है। मौजूदा तनाव ने युद्ध विराम के दावों की पोल खोलकर रख दी है। अमेरिका बनाम ईरान युद्ध से विभिन्न देश बुरी तरह प्रभावित हैं। युद्धकाल को सौ दिन से अधिक हो चुके हैं। इस दरम्यान डीजल-पेट्रोल और रसोई गैस के दाम बढ़ने से अन्य उपभोक्ता वस्तुएं भी महंगी हो चुकी हैं। आम आदमी की कमाई में कोई वृद्धि नहीं हुई है। इसलिए इस लड़ाई को रोकना जरूरी हो गया है।

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