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Air India Pilot Story : एक आरोप ने एयर इंडिया के वरिष्ठ पायलट जीतेंद्र कृष्ण वर्मा की पूरी जिंदगी बदल दी. 2011 में जब वह अपने करियर के शिखर पर थे और एयर इंडिया के बेड़े में शामिल तीनों तरह के विमानों को उड़ाने वाले चुनिंदा पायलटों में गिने जाते थे, तभी उनका लाइसेंस अचानक निलंबित कर दिया गया. इसके बाद जो हुआ, उसने उनकी पेशेवर और निजी जिंदगी दोनों को पूरी तरह बदलकर रख दिया.
एक आरोप ने एयर इंडिया के वरिष्ठ पायलट जीतेंद्र कृष्ण वर्मा की पूरी जिंदगी बदल दी. (प्रतीकात्मक तस्वीर – AI)
वक्त किस तरह करवट बदलता है और इंसान को अर्श से फर्श पर ला पटका है, जीतेंद्र कृष्ण वर्मा को इसका जीता जागता उदाहरण कहा जाए तो गलत नहीं होगा. कभी एयर इंडिया के सबसे अनुभवी पायलटों में गिने जाने वाले जितेंद्र की जिंदगी 2011 में एक झटके में बदल गई थी. 46 साल की उम्र में वह अपने करियर के शिखर पर थे. एयर इंडिया के बेड़े में शामिल सभी तरह के विमानों को उड़ाने की योग्यता रखने वाले जितेंद्र हजारों घंटे की उड़ान का अनुभव रखते थे. लेकिन एक दिन उन पर फर्जी मार्कशीट के जरिये पायलट लाइसेंस हासिल करने का आरोप लगा और बिना किसी विस्तृत जांच या सुनवाई के उनका लाइसेंस निलंबित कर दिया गया. इसके बाद जो हुआ, उसने उनकी पूरी जिंदगी को बिखेर कर रख दिया.
लाइसेंस सस्पेंड होने के साथ ही एयर इंडिया की नौकरी चली गई. वर्षों की मेहनत से बनाया गया करियर खत्म हो गया. आर्थिक संकट इतना गहरा गया कि उन्हें पुणे और मुंबई छोड़कर गुजरात में अपने पिता के घर रहना पड़ा. इस बीच उनका वैवाहिक जीवन भी टूट गया. पत्नी से तलाक हो गया और बच्चों की कस्टडी भी उनसे दूर चली गई. सबसे बड़ा दर्द यह रहा कि वह पिछले 15 वर्षों से अपने बच्चों को देख तक नहीं पाए.
15 साल की लड़ाई में खर्च हुए 50 लाख रुपये
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जितेंद्र वर्मा कहते हैं कि उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि उन्हें अदालतों और पुलिस थानों के चक्कर लगाने पड़ेंगे. एक आरोप ने उन्हें मीडिया ट्रायल का भी शिकार बना दिया. उनका कहना है कि 22 साल की बेदाग सेवा के बाद अचानक उन पर सवाल उठे और देखते ही देखते सब कुछ खत्म हो गया. उन्होंने बताया कि इन 15 वर्षों में उन्होंने कानूनी लड़ाई लड़ने में 50 लाख रुपये से ज्यादा खर्च कर दिए. अगर परिवार, भाई-बहनों और दोस्तों का साथ नहीं मिलता तो शायद उनका जीवन और भी कठिन हो जाता.
मार्च 2011 में शंघाई से दिल्ली लौटने के दौरान उन्हें पुलिस जांच में शामिल होने के लिए बुलाया गया था. आरोप था कि उन्होंने फर्जी डिग्री के आधार पर पायलट का लाइसेंस हासिल किया है. उन्हें गिरफ्तार भी किया गया, लेकिन एक सप्ताह के भीतर जमानत मिल गई. इसके बावजूद उनका लाइसेंस बहाल नहीं हुआ और करियर ठहर गया. हैरानी की बात यह रही कि 15 साल बीत जाने के बाद भी उनके खिलाफ आरोप तय नहीं हो सके.
कोर्ट से मिली राहत
अब बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस पूरे मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए लाइसेंस सस्पेंड करने के डीजीसीए के आदेश को रद्द कर दिया है. अदालत ने कहा कि न तो कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया, न कथित फर्जी दस्तावेज पेश किए गए और न ही निलंबन की अवधि स्पष्ट की गई. कोर्ट ने माना कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन नहीं किया गया और कार्रवाई कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं है.
अब 61 की उम्र में फिर उड़ान का सपना
इस फैसले के बाद 61 वर्षीय जितेंद्र वर्मा की आंखों में फिर उम्मीद जगी है. पायलटों के लिए अधिकतम आयु सीमा 65 वर्ष है, यानी उनके पास अभी भी कुछ साल बचे हैं. हालांकि 15 वर्षों में तकनीक और प्रशिक्षण के तरीके काफी बदल चुके हैं और उन्हें लगभग नए सिरे से शुरुआत करनी होगी. फिर भी उनका कहना है, ‘उड़ान मेरे खून में है. मैंने अपनी जिंदगी और सम्मान वापस पा लिया है. अब मैं फिर से आसमान में लौटना चाहता हूं.’
15 साल तक अदालतों, दफ्तरों और कानूनी प्रक्रियाओं के बीच भटकने के बाद यह फैसला सिर्फ एक पायलट का लाइसेंस बहाल होने की कहानी नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति की वापसी की कहानी है जिसने नौकरी, परिवार, सम्मान और अपने बच्चों का साथ खोने के बावजूद उम्मीद नहीं छोड़ी. अब उनकी सबसे बड़ी ख्वाहिश है कि वह एक बार फिर कॉकपिट में बैठकर आसमान की ओर उड़ान भर सकें.
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साद बिन उमर को पत्रकारिता के क्षेत्र में 15 साल से अधिक का अनुभव है, जिनमें से 12 साल उन्होंने डिजिटल पत्रकारिता को दिए है. न्यूज़18 के साथ जुड़ने से पहले उन्होंने आज तक, एनडीटीवी, पीटीआई और नया इंडिया जैसे प्र…और पढ़ें
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