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Indus Water Treaty In Ambience Effect: भारत की ओर से सिंधु नदी प्रणाली से जुड़े दो बड़े प्रोजेक्ट पर काम शुरू किए जाने की खबर ने पाकिस्तान की बेचैनी बढ़ा दी है. पाकिस्तान अब खुलकर कहने लगा है कि भारत का यह कदम उसकी अर्थव्यवस्था के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने गुरुवार को भारत की चिनाब-ब्यास लिंक परियोजना और सलाल बांध से जुड़ी नई सुरंग परियोजना पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए दावा किया कि इनसे उसके आर्थिक हितों को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है.

दरअसल, हाल ही में सामने आई जानकारी के अनुसार भारत ने चिनाब नदी प्रणाली से जुड़ी दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर काम शुरू किया है. इनमें पहली परियोजना हिमाचल प्रदेश में प्रस्तावित चिनाब-ब्यास लिंक है, जबकि दूसरी जम्मू-कश्मीर स्थित सलाल जलविद्युत परियोजना में तलछट प्रबंधन के लिए नई सुरंग का निर्माण है. दोनों परियोजनाओं की कुल लागत करीब 2,600 करोड़ रुपये बताई जा रही है.

इन योजनाओं की जानकारी सामने आने के बाद पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय से इस बारे में सवाल पूछा गया. जवाब में पाकिस्तान ने कहा कि उसने मीडिया रिपोर्ट और भारत सरकार द्वारा जारी सार्वजनिक टेंडर दस्तावेज देखे हैं. पाकिस्तान का दावा है कि इस लिंक परियोजना के जरिए चिनाब नदी से लगभग 1.9 मिलियन एकड़ फीट पानी ब्यास नदी बेसिन की ओर मोड़ा जाएगा. पाकिस्तान ने इसे सिंधु जल संधि का गंभीर उल्लंघन करार दिया है.

भारत ने इन परियोजनाओं के बारे में उसे कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी

पाकिस्तान का कहना है कि भारत ने इन परियोजनाओं के बारे में उसे कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी है और न ही किसी प्रकार का नोटिस साझा किया है. इस्लामाबाद का आरोप है कि भारत पानी को एक रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल करना चाहता है. पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने यहां तक कहा कि ये परियोजनाएं पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती हैं.

भारत और पाकिस्तान के बीच जल विवाद का यह नया अध्याय ऐसे समय सामने आया है, जब भारत पहले ही सिंधु जल संधि को स्थगित रखने का फैसला कर चुका है. बीते साल पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इस संधि को अबेयंस में रखने की घोषणा की थी. इसके बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा था कि खून और पानी एक साथ नहीं बह सकते और भारत पश्चिमी नदियों पर अपने वैध हिस्से का पूरा उपयोग करेगा.

इसी नीति के तहत चिनाब नदी से जुड़ी विभिन्न जलविद्युत परियोजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है. साथ ही ऐसी नई योजनाओं पर भी काम हो रहा है, जिनके जरिए अतिरिक्त पानी का बेहतर उपयोग किया जा सके. चिनाब-ब्यास लिंक परियोजना को इसी दिशा में सबसे महत्वाकांक्षी कदम माना जा रहा है.

सरकारी योजना के अनुसार इस परियोजना पर 1 अगस्त से काम शुरू करने की तैयारी है. इसका लक्ष्य 31 जुलाई 2029 तक पूरा करना है. लगभग 2,300 करोड़ रुपये की लागत वाली यह परियोजना चिनाब नदी के अतिरिक्त जल को ब्यास नदी बेसिन तक पहुंचाने के लिए बनाई जा रही है.

परियोजना लाहौल घाटी में प्रस्तावित

एनएचपीसी के दस्तावेजों के अनुसार यह परियोजना हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति जिले की लाहौल घाटी में प्रस्तावित है. योजना के तहत चेन्नाब नदी पर 19 मीटर ऊंचा बैराज बनाया जाएगा. इसके अलावा जल प्रवाह को दूसरी दिशा में ले जाने के लिए लगभग 8.7 किलोमीटर लंबी सुरंग का निर्माण भी किया जाएगा. परियोजना के दूसरे चरण में जलविद्युत उत्पादन की संभावनाओं को भी शामिल किया गया है. इस बीच, भारत ने चिनाब नदी से जुड़ी दूसरी महत्वपूर्ण परियोजना पर भी काम शुरू कर दिया है. जम्मू-कश्मीर स्थित सलाल जलविद्युत परियोजना में लगभग 268 करोड़ रुपये की लागत से एक डायवर्जन-कम-सेडिमेंट बायपास टनल बनाई जा रही है. इस परियोजना का उद्देश्य वर्षों से चली आ रही एक तकनीकी समस्या का समाधान करना है.

विशेषज्ञों के अनुसार चिनाब नदी हिमालयी क्षेत्र से बड़ी मात्रा में तलछट और गाद लेकर आती है. इसके कारण सलाल जलाशय में लगातार सिल्ट जमा होती रही है. समय के साथ इस सिल्टेशन ने जलाशय की भंडारण क्षमता को प्रभावित किया है. साथ ही टर्बाइनों की कार्यक्षमता और जल प्रबंधन पर भी असर पड़ा है. अत्यधिक गाद बाढ़ प्रबंधन को जटिल बना सकती है और जलविद्युत ढांचे की आयु भी घटा सकती है.

नई सुरंग का उद्देश्य इसी समस्या का समाधान करना है. यह आवश्यकता पड़ने पर पानी को मोड़ने और जलाशय में जमा तलछट को बायपास तंत्र के जरिए बाहर निकालने में मदद करेगी. भारत के लिए यह परियोजना केवल तकनीकी महत्व नहीं रखती, बल्कि रणनीतिक दृष्टि से भी अहम मानी जा रही है.

पाकिस्तान की प्रतिक्रिया यह संकेत देती है कि भारत की जल परियोजनाओं को लेकर वहां गंभीर चिंता पैदा हो चुकी है. खासतौर पर चिनाब नदी पर बढ़ती भारतीय गतिविधियां इस्लामाबाद को परेशान कर रही हैं. यही वजह है कि पाकिस्तान अब खुलकर इन परियोजनाओं का विरोध कर रहा है और उन्हें अपनी अर्थव्यवस्था के लिए खतरा बता रहा है. फिलहाल भारत अपनी योजनाओं को आगे बढ़ाने के संकेत दे चुका है. ऐसे में आने वाले वर्षों में चिनाब नदी प्रणाली से जुड़ी ये परियोजनाएं भारत-पाकिस्तान संबंधों और जल कूटनीति के केंद्र में बनी रह सकती हैं.

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