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कबालम्मा मंदिर, कबालू, बेंगलुरु ग्रामीण
शिवकुमार जितने भी मंदिरों में जाते हैं, उनमें कबालम्मा मंदिर उनके दिल के सबसे करीब है. यह मंदिर कनकपुरा के पास कबालू नाम की जगह पर है. शिवकुमार और उनका पूरा परिवार इस देवी मां को बहुत ज्यादा मानता है. ये मंदिर अक्टूबर 2019 में राजनीति की बड़ी चर्चा में तब आया, जब जेल से छूटने के तुरंत बाद शिवकुमार सीधे यहां पहुंचे थे. उन पर पैसों की हेराफेरी का आरोप था और वे तिहाड़ जेल में थे. जेल से आते ही इस मंदिर में जाने को लोगों ने भगवान का शुक्रिया अदा करना और अपनी राजनीति की नए सिरे से शुरुआत करना माना था.

इसके बाद से वे हर चुनाव, बड़ी राजनीतिक हलचल या अपने जीवन के किसी भी खास मौके से पहले इस मंदिर में जरूर जाते हैं. हाल ही में जब कर्नाटक में मुख्यमंत्री बदलने की अफवाहें उड़ीं, तो उनके समर्थकों ने इस मंदिर में विशेष पूजा रखी ताकि शिवकुमार को सरकार में सबसे बड़ा पद मिल सके.

सिद्दारमैया के साथ डीके शिवकुमार. फोटो- पीटीआई

केनकेरम्मा मंदिर, कनकपुरा
केनकेरम्मा मंदिर भी एक ऐसा देवस्थान है जो कनकपुरा इलाके में शिवकुमार के परिवार और उनकी राजनीति से गहराई से जुड़ा है. कहा जाता है कि यह उनके परिवार की कुलदेवी हैं. बेंगलुरु के सदाशिवनगर में शिवकुमार का जो अपना घर है, उसका नाम भी उन्होंने इसी देवी के नाम पर ‘केनकेरी’ रखा है.

जब-जब कांग्रेस पार्टी के अंदर मतभेद बढ़े या राजनीति में अनिश्चितता आई, तब-तब शिवकुमार यहां पूजा करने पहुंचे. इस इलाके के स्थानीय लोगों और जातियों के बीच इस मंदिर की बहुत बड़ी मान्यता है. इसलिए जब भी शिवकुमार अपनी राजनीतिक यात्रा के किसी खास मोड़ पर अपने इलाके में आते हैं, तो इस मंदिर में सिर झुकाना नहीं भूलते. जानकारों का कहना है कि जब भी सरकार के अंदर पदों को लेकर खींचतान शुरू होती है, शिवकुमार का अपनी इस कुलदेवी के पास आना-जाना बढ़ जाता है.

जगदीशवरी मंदिर, अंडले, अंकोला, उत्तर कन्नड़
हाल के दिनों में शिवकुमार के जिस मंदिर दौरे की सबसे ज्यादा चर्चा हुई, वह था उत्तर कन्नड़ जिले के अंकोला के पास अंडले गांव का जगदीशवरी मंदिर. बताया जाता है कि अपने ज्योतिषी के कहने पर वे कुछ महीने पहले दिसंबर 2025 में यहां गए थे. तब से लेकर अभी हाल तक इस मंदिर में रोज उनके नाम से विशेष ‘संकल्प’ और पूजा की जा रही थी. यह रोजाना होने वाली पूजा इसलिए कराई जा रही थी ताकि उनके रास्ते में आने वाली सभी रुकावटें और मुश्किलें दूर हो जाएं. यह भी कहा जाता है कि पूजा के दौरान देवी की मूर्ति के सिर से ‘हिंगारा’ (सुपारी का फूल) नीचे गिरा, जिसे उन्होंने भगवान के आशीर्वाद और अपनी प्रार्थना सफल होने का संकेत माना.

यह दौरा इसलिए सुर्खियों में रहा क्योंकि उसी दौरान कर्नाटक में सत्ता बदलने की बातें बहुत जोर-शोर से चल रही थीं. राजनीति पर नजर रखने वालों ने ध्यान दिया कि जब-जब कांग्रेस के अंदर कुर्सी की लड़ाई या होने वाले बदलावों पर बहस छिड़ती है, ठीक उसी समय शिवकुमार का तटीय और उत्तरी कर्नाटक के मंदिरों में जाना बढ़ जाता है. भले ही इसे उनकी निजी भक्ति की यात्रा कहा गया, लेकिन यह बात कर्नाटक की राजनीति में एक बड़ा मुद्दा बन गई.

अजज्या मठ, नोनाविनकेरे, तुमकुर जिला
कर्नाटक के तुमकुर जिले के नोनाविनकेरे में बने ऐतिहासिक श्री कादसिद्धेश्वर मठ (जिसे लोग ‘अजज्या मठ’ के नाम से जानते हैं) में भी डी. के. शिवकुमार दर्शन के लिए गए. इसे उनकी धार्मिक और सामाजिक पहुंच का एक बड़ा हिस्सा माना गया.

मध्य कर्नाटक की कई बड़ी जातियों और समुदायों के बीच इस मठ का बहुत बड़ा असर है. इतिहास गवाह है कि अलग-अलग पार्टियों के बड़े-बड़े नेता हमेशा से इस मठ और यहां के संतों से अच्छे संबंध बनाकर रखते आए हैं.

शिवकुमार यहां ऐसे समय पर गए जब कर्नाटक की राजनीति में धर्म और समाज के बीच पकड़ बनाना बहुत जरूरी माना जा रहा था. एक बार जब कर्नाटक की राजनीति में उनकी अगली भूमिका को लेकर बहुत ज्यादा चर्चा हो रही थी, तब शिवकुमार को आशीर्वाद लेने के लिए बेंगलुरु में इसी अजज्या मठ की एक दूसरी शाखा में भी जाते हुए देखा गया था.

मध्यरंगनाथ मंदिर, शिवनसमुद्र, चामराजनगर
शिवनसमुद्र में स्थित मध्यरंगनाथ मंदिर कावेरी नदी के किनारे बने तीन सबसे मशहूर रंगनाथ मंदिरों में से एक है. शिवकुमार का यहां आना भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बना क्योंकि यह भी उसी समय हुआ जब वे लगातार कई धार्मिक यात्राएं कर रहे थे और राज्य की राजनीति में बहुत कुछ चल रहा था. पूरे दक्षिण कर्नाटक के लोगों के दिलों में इस मंदिर के लिए बहुत श्रद्धा है और हर साल यहां हजारों लोग आते हैं.

राजनीति को करीब से देखने वालों का मानना है कि शिवकुमार यहां इसलिए गए ताकि वे बड़े और असरदार धार्मिक केंद्रों से जुड़ सकें और लोगों के बीच अपनी छवि एक ऐसे नेता की बना सकें जो कर्नाटक की पुरानी परंपराओं और संस्कृति का सम्मान करता है.

कामाख्या मंदिर, असम
गुवाहाटी का कामाख्या मंदिर शिवकुमार के हाल के मंदिर दौरों में सबसे महत्वपूर्ण और सबसे दूर का धार्मिक स्थान है. देवी कामाख्या को समर्पित यह मंदिर भारत के सबसे बड़े शक्तिपीठों में से एक है. इस मंदिर को बहुत शक्तिशाली तांत्रिक परंपराओं और विशेष पूजा-पाठ के लिए जाना जाता है. पिछले कुछ सालों की खबरों के मुताबिक, शिवकुमार ने अपने ज्योतिषियों और गुरुओं की सलाह पर कामाख्या मंदिर की यात्रा की थी. इस यात्रा में लोगों ने बहुत दिलचस्पी दिखाई क्योंकि यह ठीक उस समय हुई थी जब उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर कयास और अफवाहें सबसे ज्यादा गर्म थीं. राजनीति की दुनिया में यह बात सब जानते हैं कि कामाख्या मंदिर एक ऐसी जगह है जहां बड़े-बड़े नेता अपने करियर के बुरे, अनिश्चित या बड़े बदलाव वाले दौर में आशीर्वाद और सफलता पाने के लिए आते हैं.

महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग, उज्जैन
शिवकुमार की जिन यात्राओं की खबरें टीवी और अखबारों में सबसे ज्यादा चलीं, उनमें से एक थी मध्य प्रदेश के उज्जैन में महाकालेश्वर मंदिर की उनकी यात्रा. उन्होंने वहां महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन किए और पास में बने कालभैरव मंदिर में भी माथा टेका. इस दौरान उन्होंने अपने परिवार के साथ मिलकर वहां विशेष पूजा-पाठ और अनुष्ठान भी किए. कहा जाता है कि उज्जैन की यह यात्रा और गुवाहाटी के कामाख्या मंदिर की यात्रा, दोनों ही उन्होंने अपने गुरु राजगुरु द्वारकानाथ के कहने पर की थीं, जिनकी बातों को शिवकुमार बहुत नियम से मानते हैं.

यह यात्रा भी ठीक उसी समय हुई जब कर्नाटक की राजनीति में आगे क्या होगा, इस बात की चर्चाएं अखबारों और टीवी चैनलों की मुख्य सुर्खियां बनी हुई थीं. चूंकि महाकालेश्वर देश के सबसे बड़े और प्रमुख ज्योतिर्लिंगों में से एक है और पुराने समय से ही बड़े नेता किसी बड़े चुनाव या राजनीतिक फैसले से पहले यहां आते रहे हैं, इसलिए शिवकुमार के जाते ही पूरी राजनीतिक दुनिया और मीडिया में इस पर बातें शुरू हो गईं.

इन मंदिर यात्राओं पर इतनी राजनीतिक चर्चा क्यों हुई?
देखा जाए तो किसी नेता का मंदिर जाना एक आम और सामान्य बात है. लेकिन शिवकुमार के मामले में जिस चीज ने सबका ध्यान खींचा, वह थी उनके मंदिर जाने की रफ्तार, उसका समय और देश के अलग-अलग कोनों के मंदिरों का चुनाव. ऊपर बताए गए मंदिरों के अलावा, डीके शिवकुमार उत्तर कन्नड़ के महाबलेश्वर मंदिर (गोकर्ण), मांड्या के भूवराहनाथ स्वामी मंदिर, धर्मस्थल के श्री मंजूनाथेश्वर मंदिर और राज्य के कई अन्य बड़े मंदिरों में भी जा चुके हैं.

इनमें से ज्यादातर तीर्थयात्राएं उसी समय हुईं जब कर्नाटक कांग्रेस के अंदर मुख्यमंत्री बदलने, बारी-बारी से मुख्यमंत्री की कुर्सी संभालने या आने वाले समय में सत्ता की चाबी किसके हाथ में होगी, ऐसी अफवाहें चारों तरफ उड़ रही थीं. पिछले 3 सालों में डीके शिवकुमार ने पूरे भारत के कोने-कोने में मौजूद सैकड़ों मंदिरों की यात्रा की है. कश्मीर के माता वैष्णो देवी मंदिर से लेकर केरल के राजराजेश्वरी मंदिर तक (जो नजरदोष और तंत्र-मंत्र के बुरे असर को काटने के लिए मशहूर है), वे इन सभी जगहों पर गए और वहां बड़ी-बड़ी पूजाएं और दान-पुण्य किए.

इन अफवाहों को हवा देने में उनके ज्योतिषी राजगुरु बेलूर द्वारकानाथ के बयानों ने भी बड़ा काम किया. वे बार-बार मीडिया में शिवकुमार के राजनीतिक भविष्य के लिए अच्छे समय और बड़ी तारीखों की बातें करते रहते हैं.

शिवकुमार के समर्थक इन मंदिर यात्राओं को इस तरह देखते हैं कि उनके नेता को भगवान भविष्य में किसी बड़े पद और बड़ी जिम्मेदारी के लिए तैयार कर रहे हैं. वहीं उनके विरोधी और आलोचक इसे एक सोची-समझी चाल मानते हैं ताकि मुख्यमंत्री पद के लिए शिवकुमार का नाम हमेशा चर्चा में बना रहे.

हालांकि, शिवकुमार खुद हमेशा यही कहते आए हैं कि मंदिर जाना उनकी व्यक्तिगत आस्था और भगवान के प्रति उनका अपना प्रेम है. लेकिन कर्नाटक की राजनीति के माहौल को देखते हुए, जहां हर बात का एक खास इशारा होता है, वहां किसी बड़े नेता का मंदिर जाना, विशेष पूजा कराना और बड़े संतों से मिलना सिर्फ एक प्रार्थना नहीं रह जाता, बल्कि उसके पीछे राजनीति के कई गहरे मायने निकाल लिए जाते हैं.

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