-राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल बोलीं- ई-सिगरेट बच्चों को नशे की ओर धकेलने वाला नया जाल
-विशेषज्ञों ने चेताया- 12 साल के बच्चे भी बन रहे निकोटीन की गिरफ्त का शिकार
उदय भूमि संवाददाता
नई दिल्ली। देश में ई-सिगरेट और ‘वेपिंग’ के बढ़ते चलन को लेकर चिंता लगातार गहराती जा रही है। विश्व तंबाकू निषेध दिवस 2026 से पहले आयोजित एक महत्वपूर्ण संगोष्ठी में राज्यसभा सांसद स्वाति मालीवाल ने इस मुद्दे को गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट बताते हुए कहा कि ‘वेपिंग’ अब बच्चों और युवाओं को नशे की गिरफ्त में धकेलने वाला नया माध्यम बन चुकी है। उन्होंने साफ कहा कि वह इस गंभीर विषय को संसद में मजबूती से उठाएंगी और बच्चों को इस खतरनाक लत से बचाने के लिए कड़े कदमों की मांग करेंगी। दिल्ली में ‘मदर्स अगेंस्ट वेपिंग’ (एमएवी) द्वारा आयोजित कार्यक्रम में स्वाति मालीवाल ने कहा कि देश में ई-सिगरेट पर प्रतिबंध के बावजूद यह अवैध बाजारों में खुलेआम उपलब्ध है और महानगरों में इसका इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा कि अब 12 साल तक के बच्चे भी ‘वेपिंग’ उपकरणों का इस्तेमाल करने लगे हैं, जो बेहद खतरनाक संकेत है। स्वाति मालीवाल ने कहा कि सबसे बड़ी समस्या यह है कि इन उत्पादों पर किसी प्रकार के खतरे की स्पष्ट चेतावनी नहीं होती। आकर्षक डिजाइन, रंग-बिरंगे फ्लेवर और आधुनिक गैजेट जैसी बनावट बच्चों और किशोरों को तेजी से अपनी ओर आकर्षित कर रही है।
उन्होंने कहा कि ‘वेपिंग’ को जानबूझकर सुरक्षित और स्टाइलिश दिखाने की कोशिश की जा रही है, जबकि वास्तविकता इससे बिल्कुल अलग है। सांसद ने कहा कि वेपिंग केवल धुआं नहीं बल्कि जहरीले रसायनों का मिश्रण है, जो सीधे फेफड़ों तक पहुंचता है। इसमें निकोटीन, फॉर्मेल्डिहाइड, डायएसिटाइल और कई भारी धातुएं मौजूद होती हैं, जो शरीर को गंभीर नुकसान पहुंचाती हैं। उन्होंने कहा कि निकोटीन किशोरों के मस्तिष्क के विकास को प्रभावित करता है और भविष्य में सिगरेट तथा अन्य नशों की लत लगने की संभावना को कई गुना बढ़ा देता है। कार्यक्रम में मौजूद विशेषज्ञों ने भी वेपिंग को युवाओं के लिए बड़ा खतरा बताया। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) के अंतर्गत राष्ट्रीय कैंसर निवारण एवं अनुसंधान संस्थान की निदेशक एवं वैज्ञानिक डॉ. शालिनी सिंह ने कहा कि ई-सिगरेट को कम हानिकारक बताने की धारणा पूरी तरह भ्रम फैलाने वाली है।
उन्होंने कहा कि उद्योग प्रायोजित शोध और चुनिंदा तथ्यों के आधार पर लोगों को गुमराह किया जा रहा है। दिल्ली विश्वविद्यालय के वल्लभभाई पटेल चेस्ट इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. राज कुमार ने कहा कि अधिकांश युवा जिज्ञासा या दोस्तों के दबाव में ‘वेपिंग’ शुरू करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे यह गंभीर लत में बदल जाती है। उन्होंने कहा कि अक्सर पहली बार प्रयोग करने वाले किशोर यह मानते हैं कि यह हानिरहित है, जबकि निकोटीन की लत पहले कश से ही शुरू हो सकती है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी कि वेपिंग से फेफड़ों की गंभीर बीमारियां, हृदय संबंधी समस्याएं, मानसिक तनाव और कैंसर जैसी खतरनाक बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। बच्चों और किशोरों में इसका प्रभाव और भी अधिक गंभीर हो सकता है क्योंकि उनका शरीर और मस्तिष्क विकासशील अवस्था में होता है। स्वाति मालीवाल ने केंद्र और राज्य सरकारों से अपील करते हुए कहा कि ई-सिगरेट निषेध अधिनियम 2019 को और अधिक सख्ती से लागू करने की आवश्यकता है।
उन्होंने कहा कि केवल कानून बना देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि बाजार में हो रही अवैध बिक्री और ऑनलाइन उपलब्धता पर भी कठोर निगरानी जरूरी है। उन्होंने कहा कि यदि समय रहते इस समस्या पर नियंत्रण नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में देश के लाखों युवा निकोटीन की लत के शिकार हो सकते हैं। कार्यक्रम में मौजूद सामाजिक संगठनों और विशेषज्ञों ने अभिभावकों से भी अपील की कि वे बच्चों की गतिविधियों पर नजर रखें और उन्हें ‘वेपिंग’ के खतरों के बारे में जागरूक करें। वक्ताओं ने कहा कि बच्चों को बचाने के लिए समाज, परिवार और सरकार सभी को मिलकर काम करना होगा। विश्व तंबाकू निषेध दिवस से पहले आयोजित इस संगोष्ठी ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि ‘वेपिंगÓ केवल एक फैशन नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी के स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है।
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