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जब चार बड़े और ताकतवर देश मिलकर एक ग्रुप बनाते हैं तो दुनिया को लगता है कि अब जियो-पॉलिटिक्स में कोई बड़ा भूचाल आने वाला है. भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया ने मिलकर जब ‘क्वाड’ (QUAD) का गठन किया था तो चीन में खलबली मच गई थी. दुनिया को लगा था कि ये ग्रुप इंडो-पैसिफिक इलाके में चीन की दादागिरी को पूरी तरह से मटियामेट कर देगा. हालांकि, कूटनीतिक दुनिया में जैसा दिखता है, हमेशा वैसा होता नहीं है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद इस पूरे ग्रुप की हवा निकलती हुई दिखाई दे रही है. हालात ऐसे बन गए हैं कि जिस चीन को घेरने के लिए यह पूरा ताना-बाना बुना गया था, वो आज बिना कुछ किए ही जीत रहा है.

Quad Summit में चल क्या रहा है?

जाने-माने रणनीतिक विश्लेषक डॉ ब्रह्मा चेलानी का एक ताजा विश्लेषण आज के हालातों की कड़वी हकीकत का पर्दाफाश किया है. किसी भी अंतरराष्ट्रीय संगठन की असली ताकत इस बात में होती है कि उसके देशों के सबसे बड़े नेता यानी राष्ट्राध्यक्ष आपस में कितनी गंभीरता से मिल रहे हैं लेकिन क्वाड के साथ पिछले कुछ समय से जो हो रहा है, वो इसके कमजोर होते वजूद की गवाही देता है.

चेलानी ने अपने पोस्ट में बताया कि नई दिल्ली में हाल ही में क्वाड देशों के विदेश मंत्रियों की एक हाई-प्रोफाइल बैठक हुई थी. उम्मीद जताई जा रही थी कि इस बैठक में उस ‘लीडर्स समिट’ की तारीखों का ऐलान हो जाएगा, जो साल 2024 के बाद से अब तक नहीं हो पाई है. हालांकि, ये मीटिंग महज एक घंटे से कुछ ज्यादा समय में खत्म हो गई और नेताओं की बैठक को लेकर कोई ऐलान नहीं हुआ.

ब्रह्मा चेलानी ने Quad पर दी चेतावनी!

इस बैठक के दौरान अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की और उन्हें जल्द से जल्द व्हाइट हाउस आने का न्योता दे डाला. चेलानी का कहना है कि ये न्योता साफ इशारा करता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस साल भारत की यात्रा पर आने के मूड में बिल्कुल नहीं हैं.

नेताओं की बड़ी बैठक न होने का नुकसान सीधे भारत को उठाना पड़ रहा है. नई दिल्ली इस साल इस समिट की मेजबानी करने के लिए पूरी ताकत लगा रही थी ताकि ये ग्रुप पूरी तरह निष्क्रिय न हो जाए, लेकिन अगर इस साल यह बैठक भारत में नहीं हो पाती है तो मेजबानी का ये मौका भारत के हाथ से निकलकर अगले साल के लिए ऑस्ट्रेलिया के पास चला जाएगा.

ट्रंप की ‘बिजनेस वाली कूटनीति’ ने बिगाड़ दिया खेल

क्वाड के इस तरह कमजोर होने की सबसे बड़ी वजह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का काम करने का तरीका है, जिसे एक्सपर्ट्स ‘व्यापारिक कूटनीति’ कहते हैं. ट्रंप प्रशासन किसी बड़े ग्रुप को मजबूत करने के बजाय सीधे द्विपक्षीय सौदेबाजी करने में ज्यादा यकीन रखता है. पिछले साल भारत और अमेरिका के बीच जो ट्रेड वॉर और भारी टैरिफ का खेल चला था, उसी ने इस साल की क्वाड समिट की संभावनाओं को ठंडे बस्ते में डाल दिया था.

सबसे बड़ा झटका तो ये है कि ट्रंप प्रशासन इस समय चीन के साथ सीधे टकराव मोल लेने के बजाय उसके साथ किसी तरह का समझौता करने या बीच का रास्ता निकालने की फिराक में दिख रहा है. अब सोचिए, जब इस ग्रुप का सबसे बड़ा लीडर यानी अमेरिका ही चीन के प्रति नरम रुख अपना लेगा तो फिर चीन को घेरने का जो इस ग्रुप का मूल मकसद था, वो तो अपने आप ही दम तोड़ देगा. यही वजह है कि चीन को इस ग्रुप को तोड़ने के लिए कुछ करना ही नहीं पड़ा.

अमेरिका की नई नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रेटजी (NSS) को देखें तो समझ आता है कि वॉशिंगटन के लिए अब क्वाड की अहमियत कितनी कम हो चुकी है. इस पूरे सरकारी दस्तावेज में क्वाड का नाम सिर्फ एक जगह, वो भी केवल भारत के संदर्भ में एक पासिंग रिफरेंस की तरह इस्तेमाल किया गया है.

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