मौसम की बेरुखी
इसके साथ मौसम में इस साल अल नीनो का असर बताया जा रहा है. हर 2-4, 5-6 साल में दक्षिण अमेरिका के पास के समुद्र के ऊपर से एशिया की तरफ आने वाली हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं तो गर्म हवा की वजह से बने बादलों की सारी बारिश वहीं हो जाती है. और इधर मानसून की हवाएं भी कमजोर हो जाती हैं. जो इस साल होने के आसार हैं. यानी मानसून के बादल कम आएंगे. तो गर्मी तो पड़ेगी ही पड़ेगी, जो कि पड़ ही रही है, इससे फसल का बहुत नुकसान होने की आशंका है. जून से अक्टूबर की जो खरीफ की फसल होती है उसके नुकसान हो सकता है. यानी धान की फसल, मक्के की फसल, जवार की फसल, बाजरे की फसल, दलहन की फसल, तिलहन की फसल, कपास की फसल, गन्ने की फसल, सब पर मानसून के बादल नहीं आए तो संकट के बादल आ जाएंगे. तो किसानों के लिए खरीफ की फसल पर MSP पर पिछले साल के मुकाबले औसतन 5% की बढ़ोतरी कर ही दी गई है. तो अब इन चीजों के दाम भी बढ़ेंगे बाजार में. ये मौसम का असर होने वाला है.
होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने से तेल और गैस की आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई है. (फाइल फोटो/Reuters)
रुपये पर मार
और युद्ध और मौसम के साथ मार आई है रुपये की. डॉलर बाहर ज्यादा जा रहे हैं और देश में कम आ रहे हैं. उससे रुपये की कीमत गिरती जा रही है. यानी जो-जो चीजें विदेश से मंगानी पड़ती हैं उन सब के लिए ज्यादा रुपये खर्च करने पड़ेंगे, क्योंकि रुपया कमजोर है. कच्चे तेल और गैस की महंगाई युद्ध के अलावा रुपये की कमजोरी से भी बढ़ रही है, क्योंकि ये तो बाहर से ही आते हैं. और इलॉक्ट्रॉनिक्स का सामान बहुत सारा विदेश से आता है, मतलब सिर्फ इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम ही नहीं, इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम देश में बनाने के लिए जो सेमिकंडक्टर चिप्स होती हैं और भी कई पुर्जे होते हैं वो बाहर से आते हैं तो वो सब महंगे हो रहे हैं. यानी इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम तो महंगे होंगे ही, इलेक्ट्रॉनिक्स आइटम जिस-जिस सामान को बनाने में लगते हैं वो भी महंगे हो सकते हैं. जैसे गाड़ियों में भी बहुत सारे इलेक्ट्रॉनिक्स के पुर्जे लगते हैं. तो वो सब महंगे हो जाएंगे. यानी हर तरह का सामान अगर इन सब वजहों से महंगा होगा तो महंगाई बढ़ने की आशंका बनी हुई है और महंगाई दर बढ़ती हुई दिख भी रही है.
रिजर्व बैंक के सामने डबल चैलेंज
pजब महंगाई बढ़ती है तो डबल चुनौती खड़ी हो जाती है रिजर्व बैंक के सामने. कि ब्याज दरों का क्या करें? क्योंकि अगर कोई चीज पिछले साल 100 रुपये की थी और इस साल 105 की है, तो महंगाई हुई 5% और ब्याज दर को इससे ज्यादा रखना पड़ता है. तभी तो कोई पैसा ब्याज पर रखेगा. अगर 100 रुपये का सामान 105 का हो रहा हो तो ब्याज 5 रुपये से तो ज्यादा मिलना चाहिए तभी तो फायदा है. नहीं तो अगर ब्याज पर पैसा जमा किया और उतना भी ब्याज नहीं मिला जितनी महंगाई बढ़ गई तो क्या फायदा? लेकिन अगर महंगाई बढ़ने पर ब्याज दर बढ़ानी पड़ गई तो सिर्फ आपकी EMI बढ़ने का मामला नहीं है. बड़े कर्ज तो उद्योग लेता है ना. कर्ज ले कर काम धंधे में निवेश किया जाता है और फिर मुनाफा कमा कर कर्ज चुकाया जाता है. फिर काम को और बढ़ाने के लिए और कर्ज लिया जाता है और फिर और बड़ा कारोबार किया जाता है. और ज्यादा लोगों को रोजगार देने का मौका मिलता. और ऐसे ये पहिया चलता रहता है. लेकिन कर्ज अगर महंगा हो जाता है ब्याज दरें बढ़ने पर तो कारोबार में कम कर्ज लेने की कोशिश होती है, जो सामान बनाते हैं उसमें ब्याज चुकाने का पैसा भी शामिल होता है तो वो सामान भी महंगा बनने लगता है, और कारोबार बढ़ाने का खर्चा भी बढ़ जाता है क्योंकि कर्ज महंगा हो जाता है. तो रोजगार पर भी जाकर असर पड़ता है. यानी ये तो पहिया है. इधर घुमाओ तो गाड़ी आगे जाती है, उधर घुमाओ तो गाड़ी पीछे जाती है. तो युद्ध की वजह से और एल नीन्यो की मौसम की मार की वजह से महंगाई बढ़ेगी तो ब्याज दरों को बढ़ाने की चुनौती खड़ी हो जाएगी. ब्याज दरें नहीं बढ़ाई तो पैसा जमा कम होने का खतरा है, ब्याज दरें बढ़ा दीं तो कर्ज महंगा होने की वजह से उद्योग धंधों के मुनाफे और कारोबार पर असर बढ़ने की आशंका है.
10 प्वाइंट में समझें मौजूदा हालात
- ईरान युद्ध और वैश्विक तनाव के बीच भारत में लगातार उच्चस्तरीय सरकारी बैठकों का दौर तेज हो गया है, क्योंकि सरकार को आर्थिक और रणनीतिक चुनौतियों के बढ़ने की आशंका दिखाई दे रही है.
- कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के कारण पेट्रोल, डीजल, CNG, PNG और LPG महंगे होने का खतरा बढ़ गया है, जिसका सीधा असर आम जनता की जेब और महंगाई पर पड़ेगा.
- जेट फ्यूल महंगा होने से हवाई यात्रा का खर्च बढ़ सकता है, वहीं ट्रांसपोर्टेशन लागत बढ़ने से रोजमर्रा के सामानों की कीमतों में भी तेजी आने की संभावना है.
- विशेषज्ञों के अनुसार इस साल अल नीनो का असर मानसून को कमजोर कर सकता है, जिससे खरीफ फसलों जैसे धान, मक्का, दलहन, तिलहन, कपास और गन्ने पर संकट गहरा सकता है.
- कमजोर मानसून की आशंका को देखते हुए सरकार ने किसानों के लिए MSP में औसतन 5 प्रतिशत तक बढ़ोतरी की है, लेकिन इससे खाद्यान्न कीमतों में और बढ़ोतरी का दबाव बन सकता है.
- डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी से आयातित वस्तुएं महंगी हो रही हैं. कच्चा तेल, गैस, इलेक्ट्रॉनिक सामान और सेमीकंडक्टर चिप्स की लागत बढ़ने से ऑटोमोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग पर असर पड़ सकता है.
- बढ़ती महंगाई के बीच भारतीय रिजर्व बैंक के सामने ब्याज दरों को लेकर दोहरी चुनौती खड़ी हो गई है. ब्याज दर बढ़ाने से EMI और उद्योगों के लिए कर्ज महंगा होगा, जबकि दरें स्थिर रखने से बचत पर रिटर्न घट सकता है.
- महंगे कर्ज का असर निवेश, उत्पादन और रोजगार पर पड़ सकता है. उद्योगों की लागत बढ़ने से बाजार में वस्तुएं और महंगी होने की आशंका जताई जा रही है.
- टैक्स कटौती और GST में बदलाव के जरिए मांग बढ़ाने की सरकार की रणनीति पर भी संकट के बादल मंडरा रहे हैं, क्योंकि ग्रामीण और शहरी दोनों इलाकों में लोगों की खरीद क्षमता प्रभावित होने की आशंका है
- सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती महंगाई नियंत्रण, टैक्स संग्रह, सब्सिडी, किसानों की मदद और विकास योजनाओं के बीच संतुलन बनाने की है। खाद संकट और ऊर्जा महंगाई ने आर्थिक प्रबंधन को रस्सी पर संतुलन जैसी स्थिति में ला खड़ा किया है.
अल नीनो के प्रभाव से इस बार मानसून के कमजोर होने की पूरी संभावना है. इसका असर फसलों के उत्पादन पर पड़ सकता है. ऐसे में RBI के सामने दोहरी चुनौती मुंह बाए खड़ी है. (फाइल फोटो/Reuters)
…ये और बड़ी दिक्कत
और इतना ही नहीं है, अभी और भी चुनौती है सुनते जाइए. पिछले ही साल याद होगा आपको टैक्स में कटौती की गई थी. GST में भी बदलाव किये गए थे. उसके पीछे कोशिश ये थी कि टैक्स देने के बजाय लोगों के हाथ में ज्यादा पैसा रहेगा तो वो उसको खर्च करेंगे, लोग पैसा खर्च करेंगे तो सामान खरीदेंगे, सामान खरीदेंगे तो मांग बढ़ेगी, मांग बढ़ेगी तो उद्योग धंधे प्रोडक्शन बढ़ाएंगे, प्रोडक्शन बढ़ाने के लिए निवेश करना होगा, निवेश करेंगे तो रोजगार भी बढ़ेगा, वो भी एक पहिया ही है. लेकिन फसल पर अगर मौसम का असर पड़ेगा तो गांवों में लोगों के हाथ तंग हो जाएंगे, तो वो खरीद कम करेंगे और गांवों में मांग कम बढ़ेगी. और शहरों में तेल की महंगाई लोगों के हाथ तंग कर सकती है कई तरीकों से जैसा हम बात कर ही चुके हैं. तो शहरों में भी मांग बढ़ने पर संकट है. तो टैक्स दरें जो कम की थीं ये सोचकर कि मांग बढ़ेगी तो ज्यादा कमाई होने से ज्यादा टैक्स आ जाएगा और दरें कम करने से जो नुकसान होने वाला था वो उससे पूरा कर लिया जाएगा. वो अब होना उतना ही मुश्किल दिख रहा है.
सरकार कैसे बनाएगी बैलेंस?
सरकार के पास भी खर्च करने के लिए उतना पैसा लाने की चुनौती है जितना सरकार ने सोचा हुआ था कि टैक्स से आ जाता. तो सरकार के पास भी पैसा कम आएगा तो सरकार भी योजनाओं में ज्यादा पैसा नहीं लगा पाएगी. वो एक अलग चुनौती खड़ी हो गई है. पेट्रोल-डीजल और गैस के दाम लोगों के लिए कम करने के लिए अगर सरकार उनपर टैक्स कम करती है तो सरकार के पास और कम पैसा आएगा योजनाओं के लिए. टैक्स कम नहीं करती है तो लोगों पर और मार पड़ेगी. ऊपर से खाद का एक अलग संकट खड़ा हो रहा है. खाद भी युद्ध की मार झेल रही है. क्योंकि खाद बनाने के लिए भी गैस चाहिए. एक खाद की कमी से फसल पर असर पड़ने का डर है और दूसरा, खाद महंगी हुई तो किसानों को और सब्सिडी देनी पड़ेगी सरकार को. तो सरकार को उसके लिए भी ज्यादा पैसा जुटाना है. यानी वो सर्कस में देखा है ना आपने, या जैसे मेले में भी देखा होगा, साइकिल के एक पहिये पर बड़ा सा बांस लेकर उस पहिये को खंभों के बीच बंधी हुई रस्सी पर चलाते हैं, वैसा बैलेंस बनाने की चुनौती है. और थोड़ा सा भी अगर इधर-उधर होने पर रस्सी पर पहिया बहुत जोर-जोर से डोलने लगता है और फिर पूरी रस्सी ही डोलने लगती है, वैसी हालत है इस वक्त. अब बांस को बहुत ध्यान से संभाल कर फिर से बैलेंस बनाना है और रस्सी पर पहिया चलाते हुए दूसरे छोर तक पहुंचना है. बांस बैंलेंस करने में जरा सा इधर-उधर हुए तो ना रहेगा बांस, और छूट ना जाए गाड़ी. सौ बात की एक बात.
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