लेखक-तनुजा
शिक्षाविद्
(समाजसेवी एवं राजनीतिक चिंतक हैं। राजनीतिक और सामाजिक विषयों पर लिखते हैं। जनसेविका के रुप में प्रख्यात है।)
ताकत के दम पर हर बार कुछ बड़ा हासिल करना संभव नहीं है। यह सबक अमेरिका और रूस ने जरूर सीख लिया है। एक तरफ अमेरिका ने ईरान के खिलाफ एकतरफा युद्ध विराम घोषित कर रखा है तो दूसरी ओर रूस अब यूक्रेन संग युद्ध मैदान में टिकने की स्थिति में नहीं है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का यह बयान गौर करने लायक है, जिसमें वह कह चुके हैं कि यूक्रेन के साथ युद्ध खत्म होने की ओर अग्रसर है। दरअसल रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध अब पांचवें साल में प्रवेश करने को है। इसके बावजूद रूस को कोई बड़ा लाभ नहीं मिल पाया है। राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को यह समझ आ चुका है कि युद्ध के चक्कर में राष्ट्र की प्रगति और अर्थव्यवस्था दोनों बुरी तरह प्रभावित हो रही हैं। रूस जैसी स्थिति अमेरिका की भी है। जिसने बगैर सोचे-विचारे ईरान पर आक्रमण कर दिया था। युद्ध मैदान में ईरान अपने प्रतिद्वंदी पर भारी पड़ता चला गया। ऐसे में अमेरिका को एकतरफा युद्ध विराम का ऐलान करने पर मजबूर होना पड़ा। उधर, रूस ने अब तक स्थायी युद्धविराम की संभावना से इनकार किया है। इसके बजाय उसने एक व्यापक शांति समझौते की डिमांड की है। इस डिमांड के मुताबिक यूक्रेन को तटस्थ रहना होगा, उसे डोनबास क्षेत्र से पीछे हटना होगा, रूस पर लगे तमाम प्रतिबंध हटाने होंगे और मॉस्को एवं नाटो के बीच एक नई सुरक्षा व्यवस्था होनी चाहिए।
बेशक रूस की सुरक्षा संबंधी चिंताएं वास्तविक हैं तथा पूरब की तरफ नाटो के बेलगाम विस्तार से ये चिंताएं और बढ़ गई हैं, मगर एक अंतहीन जान पड़ने वाले युद्ध को लड़ते हुए अधिकतमवादी मांगों पर अड़े रहने से रूस कतई मजबूत नहीं होगा। पुतिन ने त्वरित जीत की उम्मीद में यह युद्ध शुरू किया था। रूस की सेनाओं ने यूक्रेन के बीस फीसदी से ज्यादा भूभाग पर कब्जा कर लिया है, मगर इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। अब वक्त आ गया है कि वह एक ऐसे युद्ध, जिसका कोई स्पष्ट अंत नहीं है, को जारी रखने के बजाय शांति का मार्ग तलाशने पर ध्यान केंद्रित करें। यूक्रेन ने यह साबित कर दिया है कि वह किसी महाशक्ति के हमले का मुकाबला कर सकता है, मगर कीव के पास भी जीत हासिल करने का कोई व्यावहारिक रास्ता नहीं है। बढ़ती चुनौतियों के बावजूद रूस के पास ज्यादा नुकसान पहुंचाने की सैन्य क्षमता बरकरार है और यदि यह युद्ध लंबा खिंचता है, तो कीव को और ज्यादा क्षेत्र गंवाने का खतरा है। यूरोप को यह भी समझना होगा कि यूक्रेन युद्ध ने इस महाद्वीप को आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर कर दिया है, जिससे वह अमेरिका पर और ज्यादा निर्भर हो गया है।
जबकि वाशिंगटन उससे दूर हटता जा रहा है। पिछले चार साल से ज्यादा का अरसा बीतने के बाद यह साफ हो गया है कि इस संघर्ष का कोई सैन्य समाधान नहीं है। इसके बजाय सभी पक्षों द्वारा बातचीत के जरिए समाधान की दिशा में गंभीरतापूर्वक प्रयास करने की जरूरत है। बेशक इस साल जंग के मोर्चे पर कोई खास बदलाव नहीं हो पाया है, मगर दोनों पक्षों ने ड्रोन और मिसाइलों से विनाशकारी हमले किए हैं। इस युद्ध के शुरुआती साल में रूस की जनता इसके परिणाम से काफी हद तक सुरक्षित रही, मगर अब ऐसा नहीं है। आज यूक्रेन रूस के क्षेत्र में काफी अंदर तक हमला करने में सक्षम है। करों में इजाफा, बढ़ती कीमत और व्यापार क्षेत्र में गहराते आर्थिक संकट ने जनता के मध्य असंतोष को बढ़ावा दिया है। इससे पुतिन की लोकप्रियता पर असर पड़ा है। एक दौर वह था, जब मास्को और वाशिंगटन को आंखें दिखाने की हिम्मत किसी में नहीं होती थी। रूस के पास आज भी परमाणु हथियारों का सबसे बड़ा जखीरा है। इसके बाद नंबर दो पर अमेरिका आता है। अर्थव्यवस्था की दृष्टि से वाशिंगटन पूरे विश्व में नंबर एक पर है।
डॉलर को चुनौती देने की हिम्मत किसी देश की मुद्रा में नहीं है, मगर वर्तमान में रूस व अमेरिका की स्थिति बदल चुकी है। ट्रंप को आज शी जिनपिंग के दर पर जाने की जरूरत क्यों पड़ी? इसके पीछे कुछ अहम कारण हैं। अमेरिका और ईरान के बीच गहरे मतभेद चल रहे हैं। इजरायल के साथ मिलकर भी वह तेहरान को दबाने में पूर्णत: असफल रहा है। मुख्य समुद्री मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य अब तक खुल नहीं पाया है। इससे पूरी दुनिया को ऊर्जा संकट की मार झेलनी पड़ रही है। डोनाल्ड ट्रंप की धमकियों का तेहरान पर रत्ती भर असर नहीं पड़ा है। उलटा वह अमेरिका को आंखें दिखाने पर उतर आया है। ईरान और चीन की दोस्ती काफी गाढ़ी है। ट्रंप को लगता है कि बीजिंग के जरिए वह ईरान को रास्ते पर लाने में कामयाब हो सकता है। इसी मकसद से भी ट्रंप को वहां जाना पड़ा है। मिडिल ईस्ट युद्ध में मुंह की खाने के कारण अमेरिका की खूब जग हंसाई हो रही है। उसके सहयोगी देश भी वाशिंगटन की ताकत को समझ चुके हैं। अमेरिका ने पाकिस्तान के जरिए ईरान पर दबाव बनाने की कोशिश की थी, मगर बात नहीं बन पाई।
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