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जॉन ट्राइकोस के नाम टेस्ट क्रिकेट इतिहास में दो मैचों के बीच सबसे लंबे अंतराल (समय) का एक ऐसा अटूट रिकॉर्ड दर्ज है, जिसे तोड़ पाना आधुनिक क्रिकेट में लगभग असंभव है. उन्होंने अपने दो टेस्ट मैचों के बीच 22 साल और 222 दिनों का एक लंबा सफर तय किया, जो खेल के इतिहास में एक महान अध्याय के रूप में दर्ज है.
दो देशों के लिए टेस्ट क्रिकेट खेलने वाले जॉन ट्राइकॉस ने 22 साल 222 दिन के बाद खेला अपना दूसरा मैच
जॉन ट्राइकोस के नाम टेस्ट क्रिकेट इतिहास में दो मैचों के बीच सबसे लंबे अंतराल (समय) का एक ऐसा अटूट रिकॉर्ड दर्ज है, जिसे तोड़ पाना आधुनिक क्रिकेट में लगभग असंभव है. उन्होंने अपने दो टेस्ट मैचों के बीच 22 साल और 222 दिनों का एक लंबा सफर तय किया, जो खेल के इतिहास में एक महान अध्याय के रूप में दर्ज है.
दो अलग देशों के लिए खेला टेस्ट मैच
मिस्र में जन्मे और ग्रीक मूल के जॉन ट्राइकोस का अंतरराष्ट्रीय करियर जितना लंबा था, उतना ही अनोखा भी था. उन्होंने दुनिया के दो अलग-अलग देशों का प्रतिनिधित्व किया. ट्राइकोस ने अपने टेस्ट करियर की शुरुआत साल 1969-70 में साउथ अफ्रीका की मशहूर टीम से की थी. यह वह समय था जब साउथ अफ्रीका की टीम बेहद मजबूत मानी जाती थी.अपने डेब्यू के तुरंत बाद, रंगभेद नीति के कारण साउथ अफ्रीका पर अंतरराष्ट्रीय खेलों से प्रतिबंध लगा दिया गया इसे ‘स्पोर्टिंग आइसोलेशन’ कहा जाता है. इस प्रतिबंध ने ट्राइकोस के उभरते करियर पर अचानक ब्रेक लगा दिया.
22 साल बाद जिम्बाब्वे के साथ ऐतिहासिक वापसी
साउथ अफ्रीका पर प्रतिबंध लगने के बाद किसी भी खिलाड़ी के लिए अपनी उम्मीदें बनाए रखना मुश्किल था लेकिन ट्राइकोस ने प्रथम श्रेणी क्रिकेट खेलना जारी रखा और खुद को जिम्बाब्वे के क्रिकेट ढांचे में ढाल लिया. साल 1992 में जब जिम्बाब्वे को आधिकारिक तौर पर टेस्ट दर्जा मिला, तो इतिहास ने एक नई करवट ली. भारत के खिलाफ जिम्बाब्वे के ऐतिहासिक पहले टेस्ट मैच में 45 साल की उम्र में जॉन ट्राइकोस को टीम में शामिल किया गया. जब वे मैदान पर उतरे, तो उन्होंने न सिर्फ उम्र को मात दी, बल्कि 22 साल और 222 दिनों के अंतराल के बाद टेस्ट क्रिकेट खेलने का एक विश्व रिकॉर्ड भी बना दिया. इस मैच में उन्होंने शानदार गेंदबाजी करते हुए 5 विकेट भी चटकाए, जिसने यह साबित कर दिया कि उनका चयन सिर्फ उनके अनुभव के लिए नहीं बल्कि उनकी काबिलियत के लिए हुआ था.
क्यों खास है यह रिकॉर्ड?अटूट रिकॉर्ड
आधुनिक युग में खिलाड़ियों का करियर ही औसतन 10 से 15 साल का होता है ऐसे में 22 साल तक वापसी का इंतजार करना और फिट रहना अपने आप में चमत्कार है. 45 साल की उम्र में जहां खिलाड़ी संन्यास लेकर कोचिंग या कमेंट्री की राह चुनते हैं, वहां ट्राइकोस ने जिम्बाब्वे के शुरुआती चार टेस्ट मैचों में मुख्य स्पिनर की भूमिका निभाई. दो दशकों तक बिना किसी अंतरराष्ट्रीय संभावना के घरेलू क्रिकेट में पसीना बहाना उनके खेल के प्रति सच्चे समर्पण को दर्शाता है. जॉन ट्राइकोस की यह कहानी हमें सिखाती है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी प्रतिकूल क्यों न हों, यदि आपके अंदर अपने खेल के प्रति निष्ठा और धैर्य है, तो इतिहास रचने से आपको कोई नहीं रोक सकता.
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मैं, राजीव मिश्रा, वर्तमान में नेटवर्क 18 में एसोसिएट स्पोर्ट्स एडिटर के रूप में कार्यरत हूँ. इस भूमिका में मैं डिजिटल स्पोर्ट्स कंटेंट की योजना, संपादकीय रणनीति और एंकरिंग की जिम्मेदारी निभाता हूँ. खेल पत्रका…और पढ़ें
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