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पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों ने भारतीय राजनीति के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है. बीजेपी ने वह कर दिया, जो आज तक कभी नहीं हुआ. लेकिन इस चुनावी जीत के पीछे पीएम मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के साथ-साथ एक ऐसे ‘साइलेंट मास्टर’ का भी हाथ माना जा रहा है, जो संवैधानिक पद पर बैठकर अपनी तीक्ष्ण बुद्धि और रणनीतिक कौशल से विपक्ष के लिए काल साबित हुए हैं. वह नाम है तमिलनाडु के पूर्व और बंगाल के मौजूदा गवर्नर आर एन रवि (R. N. Ravi) का. बिहार के रहने वाले पूर्व आईपीएस अधिकारी रविंद्र नारायण रवि वह नाम है, जिसने तमिलनाडु से जाते-जाते एम के स्टालिन की विदाई तय कर दी थी और बंगाल आते ही चुपचाप बिना लाइमलाइट में रहते, टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी की विदाई तय कर दी!

1976 बैच के केरल कैडर के आईपीएस अधिकारी आर. एन. रवि की पहचान केवल एक पुलिस अफसर की नहीं, बल्कि भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा ढांचे के एक मजबूत स्तंभ के रूप में है. उन्होंने अपने करियर की शुरुआत केरल के अलप्पुझा और कन्नूर जैसे चुनौतीपूर्ण जिलों से की, जहां उन्होंने संगठित अपराध और राजनीतिक हिंसा को करीब से देखा. सीबीआई और इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) में उनके कार्यकाल ने उन्हें आतंकवाद और उग्रवाद से निपटने का विशेषज्ञ बना दिया.

आर. एन. रवि की सबसे बड़ी उपलब्धि 2015 का ‘नागा शांति समझौता’ माना जाता है.

खुफिया तंत्र के ‘चाणक्य’ और नागा शांति समझौता

आर. एन. रवि की सबसे बड़ी उपलब्धि 2015 का ‘नागा शांति समझौता’ माना जाता है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनकी क्षमताओं पर भरोसा करते हुए उन्हें नागा वार्ता का मुख्य मध्यस्थ बनाया था. आईबी के स्पेशल डायरेक्टर के पद से रिटायर होने के बाद, वह डिप्टी एनएसए (National Security Adviser) बने और अजीत डोभाल की टीम के अहम हिस्सा रहे. उनकी इसी रणनीतिक समझ ने उन्हें संवैधानिक पदों पर भी एक ‘मजबूत रक्षक’ के रूप में स्थापित किया.

जहां रहे, वहीं खिला ‘कमल’

राजनीतिक गलियारों में आर. एन. रवि को भाजपा के लिए ‘बेहद शुभ’ माना जा रहा है. इसके पीछे दो बड़े उदाहरण हैं. पहला- सितंबर 2021 में जब उन्हें तमिलनाडु का राज्यपाल बनाया गया, तब वहां द्रमुक (DMK) की मजबूत सरकार थी. रवि ने संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर रहते हुए सरकार के गलत फैसलों पर अंकुश लगाया. 2026 के चुनावों में टीवीके की जीत में उनके द्वारा बनाए गए ‘प्रशासनिक दबाव’ को एक बड़ा कारक माना जाता है. तमिलनाडु में पहली बार कमल खिला. पार्टी के एक विधायक की जीत हुई. बेशक एआईएडीएमके-बीजेपी गठबंधन सत्ता तक नहीं पहुंची.लेकिन, डीएमके-कांग्रेस गठबंधन की हार में रवि ने अहम रोल निभाया.

मोदी सरकार ने बीते मार्च में ही आर एन रवि को तमिलनाडु से पश्चिम बंगाल का गवर्नर बनाया था.

बंगाल में चुपचाप कर दिया बड़ा खेला!

चुनाव आयोग की अधिसूचना जारी होने से कुछ ही दिन पहले मोदी सरकार ने आर एन रवि को तमिलनाडु से पश्चिम बंगाल का गवर्नर बना दिया. मार्च 2026 में सी. वी. आनंद बोस के बाद रवि ने बंगाल की कमान संभाली. उनके आते ही बंगाल में भाजपा कार्यकर्ताओं में यह विश्वास जागा कि अब राजभवन उनकी सुरक्षा के लिए तत्पर है. उन्होंने चुनाव के दौरान कानून-व्यवस्था पर जो कड़ी निगरानी रखी, उसने ममता सरकार के ‘खेला’ को बेअसर कर दिया.

विपक्ष के लिए ‘अशुभ’, भाजपा के लिए ‘शुभ’

आर. एन. रवि ने कभी भी अपनी जिम्मेदारियों में ढील नहीं दी. तमिलनाडु में उन्होंने स्टालिन सरकार के कई विधेयकों को रोककर संवैधानिक सर्वोच्चता दिखाई, तो बंगाल में शपथ लेते ही उन्होंने निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए दिल्ली से सीधा संपर्क साधा. विपक्षी दल उन्हें ‘बीजेपी का एजेंट’ कहते रहे, लेकिन रवि ने हमेशा कानून की किताब का हवाला देकर उन्हें निरुत्तर किया. तमिलनाडु में उनके फैसले की गूंज सुप्रीम कोर्ट तक गूंजी, लेकिन रवि अपने फैसले पर अटल रहे.

पीएम मोदी के साथ उनकी निकटता भाजपा के लिए ऐसे ‘शुभ संकेत’ साबित हुए हैं

आज बंगाल में सुवेंदु अधिकारी मुख्यमंत्री बन चुके हैं, और इस जीत के पीछे आर. एन. रवि का वह मौन समर्थन और प्रशासनिक अनुशासन है, जिसने अराजक तत्वों को शांत रखा. एक पूर्व जासूस के रूप में उनकी नजरें अब बंगाल की कानून-व्यवस्था को पटरी पर लाने में नई सरकार की मदद करेंगी. पीएम मोदी के साथ उनकी निकटता भाजपा के लिए ऐसे ‘शुभ संकेत’ साबित हुए हैं, जिनके काम करने की तरीके और मार्गदर्शन में कई विपक्षी किलों को बीजेपी ने फतह किया जो कभी अभेद्य माने जाते थे.

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