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Dhaincha Farming : ढैंचा की खेती को केवल हरी खाद तक सीमित न रखकर, बीज उत्पादन के जरिए किसान अपनी कमाई दोगुनी कर सकते हैं. गेहूं की कटाई के बाद खाली पड़े खेतों में ढैंचा की बुवाई को जा सकती है. बाजार में इसके बीजों की भारी मांग है, जिसकी कीमत 150 से 225 रुपये प्रति किलो तक होती है. कम लागत वाली यह फसल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के साथ-साथ कीट नियंत्रण में भी सहायक है. शाहजहांपुर के कृषि एक्सपर्ट डॉ. विमल कुमार लोकल 18 से बताते हैं कि बीज उत्पादन के लिए कतारों में बुवाई करें, क्योंकि इसमें हवा और सूर्य का प्रकाश पौधों को समान रूप से मिलता है, जिससे उत्पादन बेहतर होता है.
शाहजहांपुर. आमतौर पर किसान ढैंचा का उपयोग केवल हरी खाद के रूप में करते हैं, लेकिन अब इसे बीज उत्पादन के लिए बुवाई कर अपनी आय दोगुनी कर सकते हैं. गेहूं की कटाई के बाद खाली पड़े खेतों में ढैंचा की बुवाई को जा सकती है. बाजार में इसके बीजों की भारी मांग है, जिसकी कीमत 150 से 225 रुपये प्रति किलो तक होती है. यह न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाता है, बल्कि कम लागत में किसानों को अतिरिक्त आमदनी भी देता है.
शाहजहांपुर के कृषि एक्सपर्ट डॉ. विमल कुमार लोकल 18 से बताते हैं कि ढैंचा की खेती टिकाऊ कृषि की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है. किसान प्रति एकड़ लगभग 16 किलो बीज के साथ इसकी बुवाई कर सकते हैं. बीज उत्पादन के लिए कतारों में बुवाई करें, क्योंकि इसमें हवा और सूर्य का प्रकाश पौधों को समान रूप से मिलता है, जिससे उत्पादन बेहतर होता है. अगर किसान पूरे खेत में बीज उत्पादन के लिए बुवाई नहीं करना चाहते, तो वो अपनी मुख्य फसल के चारों ओर मेड़ों पर ढैंचा लगा सकते हैं. इससे फसलों की कीटों से रक्षा भी होगी और अगले सीजन के लिए घर पर ही उत्तम गुणवत्ता वाले बीज तैयार हो जाएंगे.
सबसे सरल तरीका
ट्रैप क्रॉप
ढैंचा की बुवाई में ‘लाइन सोइंग’ विधि का विशेष महत्त्व है. कई किसान पारंपरिक रूप से छिड़काव विधि अपनाते हैं, लेकिन कतारों में बुवाई करने से निराई-गुड़ाई और देखभाल आसान हो जाती है. कतारों में पर्याप्त जगह होने से पौधों को पोषक तत्व बेहतर मिलते हैं और बीज का आकार व गुणवत्ता भी उच्च स्तर की होती है. बेहतर प्रबंधन से किसान प्रति एकड़ अधिक आमदनी ले सकते हैं. ढैंचा न केवल खाद और बीज देता है, बल्कि एक प्रभावी ‘ट्रैप क्रॉप’ के रूप में भी काम करता है. मुख्य फसल के चारों ओर इसे लगाने से हानिकारक कीटों का प्रकोप कम हो जाता है, जिससे कीटनाशकों पर होने वाला खर्च बचता है. यह बहुउद्देशीय फसल पशुओं के लिए चारे के रूप में भी उपयोग की जा सकती है.
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प्रियांशु गुप्ता बीते 10 साल से भी ज्यादा समय से पत्रकारिता में सक्रिय हैं. 2015 में भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), दिल्ली से जर्नलिज्म का ककहरा सीख अमर उजाला (प्रिंट, नोएडा ऑफिस) से अपने करियर की शुरुआत की. य…और पढ़ें
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