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5 Shoking Political Alliances: तमिलनाडु में विजय की TVK के उभार ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है. बहुमत से दूर खड़ी TVK को रोकने के लिए क्या DMK और AIADMK जैसे पुराने दुश्मन साथ आ सकते हैं? भारतीय राजनीति पहले भी ऐसे कई चौंकाने वाले गठबंधनों की गवाह रही है. शिवसेना-कांग्रेस, PDP-BJP, TDP-कांग्रेस और लेफ्ट-कांग्रेस जैसे गठबंधन बताते हैं कि राजनीति में विचारधारा से ज्यादा अहम सत्ता का गणित होता है. अब तमिलनाडु में भी वही सवाल गूंज रहा है कि क्या विजय को रोकने के लिए कट्टर विरोधी एक मंच पर आएंगे? (सभी फोटो PTI)
तमिलनाडु की राजनीति एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है, जहां दुश्मनी से ज्यादा अहम सत्ता का गणित बन गया है. अभिनेता से नेता बने विजय की पार्टी TVK ने चुनाव में शानदार प्रदर्शन कर पूरे राज्य की राजनीति को हिला दिया है. लेकिन बहुमत के आंकड़े से दूर खड़ी इस पार्टी के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या DMK और AIADMK जैसे दशकों पुराने कट्टर विरोधी सिर्फ विजय को रोकने के लिए साथ आ सकते हैं? राजनीति में यह सवाल नया नहीं है. भारत ने कई बार ऐसे गठबंधन देखे हैं, जहां मंच पर साथ बैठे नेता कभी एक-दूसरे के सबसे बड़े आलोचक हुआ करते थे. जनता हर बार हैरान हुई लेकिन सत्ता की राजनीति ने बार-बार साबित किया कि विचारधारा से ज्यादा अहम कुर्सी होती है. तमिलनाडु में चल रही हलचल ने पुराने राजनीतिक अध्याय फिर से खोल दिए हैं.
महाराष्ट्र से लेकर कश्मीर और बिहार से बंगाल तक भारतीय राजनीति ऐसे गठबंधनों की कहानियों से भरी पड़ी है, जहां विरोध की दीवारें अचानक समझौते के दरवाजे में बदल गईं. कभी शिवसेना और कांग्रेस एक-दूसरे पर तीखे हमले करते थे लेकिन 2019 में दोनों ने साथ मिलकर सरकार बना ली. जम्मू-कश्मीर में PDP और BJP का गठबंधन भी लोगों को चौंका गया था. अब तमिलनाडु में चर्चा यही है कि क्या DMK और AIADMK भी उसी राह पर बढ़ सकते हैं? राजनीतिक गलियारों में यह भी माना जा रहा है कि अगर विजय की लोकप्रियता तेजी से बढ़ी तो दोनों बड़े दल अपने अस्तित्व की लड़ाई में एक-दूसरे का हाथ पकड़ सकते हैं. फिलहाल यह सिर्फ संभावना है, लेकिन भारतीय राजनीति में संभावनाएं अक्सर हकीकत बन जाती हैं.
2019 के महाराष्ट्र चुनाव के बाद जो तस्वीर सामने आई, उसने पूरे देश को चौंका दिया था. बाल ठाकरे की हिंदुत्व वाली शिवसेना ने कांग्रेस और NCP के साथ मिलकर महाविकास अघाड़ी सरकार बनाई. उद्धव ठाकरे मुख्यमंत्री बने और वह पार्टी, जो वर्षों तक कांग्रेस को अपना वैचारिक दुश्मन बताती रही, उसी के साथ सत्ता साझा करने लगी. शुरुआत में यह गठबंधन मजबूत दिखा, लेकिन अंदरूनी विरोध और विचारधारात्मक टकराव धीरे-धीरे सामने आने लगे. आखिरकार एकनाथ शिंदे की बगावत ने इस गठबंधन को गिरा दिया. इस घटना ने दिखा दिया कि सत्ता के लिए बना बेमेल गठबंधन ज्यादा समय तक स्थिर नहीं रह पाता.
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जम्मू-कश्मीर में PDP और BJP का गठबंधन भारतीय राजनीति के सबसे विरोधाभासी प्रयोगों में गिना जाता है. एक तरफ महबूबा मुफ्ती थीं, जो कश्मीर की विशेष पहचान की बात करती थीं. दूसरी तरफ BJP थी, जो अनुच्छेद 370 हटाने की पक्षधर थी. दोनों दलों ने मिलकर सरकार तो बना ली, लेकिन वैचारिक दूरी कभी खत्म नहीं हुई. जब 2019 में अनुच्छेद 370 हटाया गया, तब यह गठबंधन पूरी तरह टूट गया. इस राजनीतिक प्रयोग ने यह साबित किया कि सिर्फ सत्ता साझा करने से राजनीतिक सोच नहीं बदलती.
तेलुगु देशम पार्टी की स्थापना ही कांग्रेस के विरोध से हुई थी. एनटी रामाराव ने कांग्रेस के खिलाफ क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति खड़ी की थी. लेकिन समय बदला और वही TDP बाद में कांग्रेस के साथ खड़ी दिखाई दी. यह गठबंधन राजनीतिक मजबूरी का उदाहरण माना गया. पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए यह बदलाव स्वीकार करना आसान नहीं था, क्योंकि दशकों तक कांग्रेस विरोध ही TDP की पहचान रहा था. लेकिन चुनावी राजनीति में कई बार पुराने सिद्धांत पीछे छूट जाते हैं.
अगर भारतीय राजनीति में गठबंधन बदलने की सबसे चर्चित मिसाल किसी नेता की है, तो वह नीतीश कुमार हैं. उन्होंने NDA और महागठबंधन के बीच कई बार पाला बदला. बिहार की राजनीति में उनकी रणनीति को सत्ता संतुलन की कला कहा जाता है. आलोचक उन्हें अवसरवादी बताते हैं, जबकि समर्थक इसे राजनीतिक व्यावहारिकता मानते हैं. लेकिन हर बार उनके फैसलों ने यह दिखाया कि भारतीय राजनीति में स्थायी दोस्ती या दुश्मनी जैसी कोई चीज नहीं होती.
पश्चिम बंगाल में लेफ्ट और कांग्रेस ने दशकों तक एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ा. केरल में आज भी दोनों दल आमने-सामने रहते हैं. लेकिन बंगाल में ममता बनर्जी के बढ़ते प्रभाव ने दोनों को साथ आने पर मजबूर कर दिया. यह गठबंधन विचारधारा से ज्यादा राजनीतिक अस्तित्व बचाने की कोशिश माना गया. हालांकि कार्यकर्ताओं के बीच यह समीकरण कभी पूरी तरह सहज नहीं हो पाया. अब तमिलनाडु में भी वैसी ही चर्चाएं शुरू हो चुकी हैं कि क्या विजय के उभार को रोकने के लिए पुराने विरोधी एक मंच पर आ सकते हैं.
तमिलनाडु की राजनीति लंबे समय से DMK और AIADMK के इर्द-गिर्द घूमती रही है. लेकिन विजय की एंट्री ने इस समीकरण को हिला दिया है. अगर TVK आने वाले दिनों में और मजबूत होती है, तो दोनों बड़े दलों पर दबाव बढ़ सकता है. यही वजह है कि राजनीतिक विश्लेषक अब उन संभावनाओं पर चर्चा कर रहे हैं, जिन्हें कुछ साल पहले असंभव माना जाता था. फिलहाल DMK और AIADMK के बीच किसी औपचारिक बातचीत की पुष्टि नहीं हुई है. लेकिन भारतीय राजनीति का इतिहास कहता है कि सत्ता का रास्ता कई बार दुश्मनों को भी साथी बना देता है.
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