सुपरवुमन शब्द का अर्थ जब गूगल पर तलाशा, तो जवाब मिला…. एक ऐसी महिला, जिसके पास असाधारण शक्तियां हों। वैसे ये असाधारण शक्तियों वाली महिलाएं हमारे आसपास ही मौजूद हैं। ये सुपरवुमन सुबह की पहली किरण के साथ अपने दिन की शुरुआत करती हैं। फिर बिना थके 18 से 19 घंटे कुछ न कुछ करती रहती हैं।
इसमें नाश्ता बनाना, बच्चों को तैयार कर स्कूल भेजना, घर को व्यवस्थित करना। फिर वही महिलाएं दफ्तर पहुंचकर मीटिंग्स लीड करती हैं, फैसले लेती हैं और पेशेवर जिम्मेदारियों को उतनी ही कुशलता से निभाती है। इन 24 घंटों में वह ऑफिस की मैडम से लेकर घर की सुपरमॉम तक का लंबा सफर तय कर लेती हैं, यह संतुलन साधना आसान नहीं होता। एक तरफ समय की पाबंदी, दूसरी तरफ परिवार की जरूरतें। दोनों के बीच बिना रुके, बिना थके आगे बढ़ना यह किसी असाधारण क्षमता से कम नहीं।
कुछ बातें…
अपनी बेटी की परवरिश के साथ-साथ सैलून चलाना मेरे लिए सिर्फ संतुलन बनाने का मामला नहीं रहा, बल्कि दो दुनियाओं को समझदारी से जोड़ने का सफर है। कुछ दिन ऐसे होते हैं, जब क्लाइंट्स को मेरी जरूरत ज्यादा होती है, और कुछ दिन मेरी बेटी को। मैंने बिना किसी अपराधबोध के दोनों को महत्व देना सीख लिया है। इस सफर में मैंने सिर्फ एक बिजनेस ही नहीं, बल्कि एक मजबूत और आत्मनिर्भर बेटी भी तैयार की है।
-दीपाली रावतानी, पॉश बुटीक सैलून, बेटी-मान्या अहलानी
मातृत्व परफेक्ट संतुलन का नाम नहीं है। यह उपस्थित रहने का नाम है। एक कामकाजी मां के रूप में मैं हर दिन कई दुनियाओं के बीच चलती हूं लेकिन मेरा बेटा अरदास मुझे हमेशा जमीन से जोड़े रखता है। उसकी हंसी में मुझे स्पष्टता मिलती है। उसकी मासूमियत मुझे मेरा उद्देश्य याद दिलाती है। इस मदर्स डे पर, मैं हर मां की उस शांत ताकत को सलाम करती हूं जो हर दिन आगे बढ़ती है और प्यार के साथ नेतृत्व करती है।
-श्रुति चतुर्लाल, कल्चरल प्रमोटर, बेटा-अरदास
अगर रानी लक्ष्मीबाई अपने बच्चे को पीठ पर बांधकर युद्धभूमि में उतर सकती थीं, तो मुझे लगता है कि मैं स्कूल ड्रॉप-ऑफ, टिफिन, खेल का समय और बर्थडे पार्टियां मुस्कुराते हुए संभाल सकती हूं। मेरी जंग भले ही अलग हो, कभी शूटिंग का कॉल टाइम तो कभी स्कूल इवेंट्स के बीच भागदौड़ लेकिन वह छवि हमेशा याद दिलाती है कि मांएं कितनी मजबूत होती हैं। अपने बेटे रुद्रांश के साथ मैं इस सफर को पूरे दिल से जीती हूं।
-मिताली नाग, टीवी अभिनेत्री, बेटा- रुद्रांश
न्यूज रूम की तेज रफ्तार और घर की जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बिठाना आसान नहीं होता। हर दिन नई चुनौतियां सामने आती हैं, लेकिन मेरी सात साल की बेटी ओविया की मुस्कान सारी थकान दूर कर देती है। मैंने सीखा है कि परफेक्ट होने से ज्यादा जरूरी है हर पल को ईमानदारी से जीना। मां होने ने मुझे और ज्यादा संवेदनशील, मजबूत और संतुलित बनाया है।
-किरण सिंह, न्यूज एंकर, बेटी- ओविया
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