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नब्बे के दशक में एक ऐसी कल्ट क्लासिक फिल्म आई जिसने बॉलीवुड की परिभाषा बदल दी. यह कहानी एक सीधे-साधे इंसान के फौलाद बनने की है, जो अपने परिवार और समाज पर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ अकेले युद्ध छेड़ देता है. राजकुमार संतोषी ने इस फिल्म को डायरेक्ट किया. फिल्म को रिलीज हुए 30 साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी देखने पर रोंगटे खड़े हो जाते हैं. इसमें दमदार एक्शन और धांसू डायलॉग्स भी हैं.

नई दिल्ली. भारतीय सिनेमा के इतिहास में कुछ ऐसी फिल्में होती हैं जो महज पर्दे पर चलती नहीं, बल्कि दर्शकों के दिलों में बस जाती हैं. 90 के दशक में आई एक ऐसी ही एक्शन-ड्रामा फिल्म ने बॉक्स ऑफिस पर तहलका मचा दिया था, जिसने एक साधारण इंसान के व्यवस्था के खिलाफ विद्रोह की कहानी को बड़े पर्दे पर जीवंत किया.

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अपनी दमदार डायलॉग डिलीवरी और रोंगटे खड़े कर देने वाले सीन्स के कारण यह फिल्म आज 30 साल बाद भी कल्ट क्लासिक मानी जाती है. अन्याय के खिलाफ दिखाने वाली इस कहानी ने न केवल एक एक्टर के करियर को नई ऊंचाई दी, बल्कि बॉलीवुड को एक यादगार खलनायक भी दिया.

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जब भी बेहतरीन एक्शन और इमोशनल ड्रामा वाली फिल्मों का जिक्र होता है, तो राजकुमार संतोषी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘घातक’ का नाम सबसे ऊपर आता है. साल 1996 में रिलीज हुई यह फिल्म आज भी अपनी शानदार कहानी के लिए याद की जाती है. यह फिल्म घायल और ‘दामिनी’ के बाद संतोषी और सनी देओल की जोड़ी की तीसरी सुपरहिट फिल्म थी, जिसने प्रतिशोध की कहानी को एक नया आयाम दिया.

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फिल्म की कहानी काशी (सनी देओल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो बनारस का एक सीधा-साधा पहलवान है. वह अपने बीमार पिता शंभू नाथ (अमरीश पुरी) के इलाज के लिए मुंबई आता है. मुंबई आने के बाद काशी को पता चलता है कि पूरा शहर खूंखार अपराधी कात्या (डैनी डेन्जोंगपा) के खौफ में जी रहा है. कात्या ने शहर के लोगों को अपना गुलाम बना रखा है और जो भी उसके खिलाफ आवाज उठाता है, उसे मौत के घाट उतार दिया जाता है.

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काशी के किरदार में . ‘हलक में हाथ डालकर कलेजा खींच लूंगा’ जैसे डायलॉग्स फिल्म की असली जान है और खास बात है कि इसी डायलॉग के बाद पूरी कहानी पलट जाती है. घातक फिल्म के सभी डायलॉग्स आज भी मीम्स और चर्चाओं में छाए रहते हैं. डैनी डेन्जोंगपा ने कात्या के रूप में एक ऐसा विलेन पेश किया, जिसका खौफ पर्दे पर महसूस होता था.

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अमरीश पुरी ने फिल्म में एक आदर्शवादी पिता के रूप में दर्शकों को भावुक कर दिया. पिता-पुत्र के बीच के सीन्स फिल्म की भावनात्मक रीढ़ हैं, फिल्म में गौरी का किरदार निभाने वाली मीनाक्षी की यह आखिरी फिल्म थी और उन्होंने अपनी सादगी से फिल्म में संतुलन बनाए रखा.

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‘घातक’ उस साल की सबसे बड़ी हिट फिल्मों में से एक साबित हुई थी. बॉलीवुड हंगामा के मुताबिक, फिल्म ने घरेलू बॉक्स ऑफिस पर करीब 16 करोड़ से ज्यादा का नेट कलेक्शन किया था, जो कि 1996 के हिसाब से एक बड़ी रकम थी. वर्ल्डवाइड कमाई के मामले में भी इसने 21 करोड़ कमाकर शानदार प्रदर्शन किया और उस साल की टॉप ग्रॉसिंग फिल्मों की सूची में जगह बनाई.

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फिल्म के डायलॉग्स जैसे ‘ये मजदूर का हाथ है कात्या, लोहा पिघलाकर उसका आकार बदल देता है’, ‘सातों को साथ मारूंगा एक साथ मारूंगा’ खूब मशहूर हुए. वहीं, कात्या का क्रूर अवतार इसे आम एक्शन फिल्मों से अलग बनाता है. यह फिल्म महज मार-धाड़ नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और अन्याय के खिलाफ लड़ने की प्रेरणा देती है. 30 साल बाद भी जब यह फिल्म टीवी पर आती है, तो दर्शक इसे उसी उत्साह के साथ देखते हैं जैसे पहली बार देख रहे हों.

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