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दुनिया भर में जब भी कोई बड़ा बवाल या युद्ध होता है, तो सबसे पहला सवाल यही उठता है कि अपना भारत किसके साथ है? साल 2022 में जब रूस ने यूक्रेन पर धावा बोला, तो अमेरिका और यूरोप के बड़े-बड़े देशों ने मान लिया था कि अब भारत रूस से किनारा कर लेगा. उन सबको लगा कि भारत पश्चिमी देशों के सुर में सुर मिलाएगा और रूस की कड़ी निंदा करेगा. लेकिन हुआ क्या? एकदम उल्टा. भारत ने अपना फायदा देखा, अपनी विदेश नीति का स्वैग दिखाया और दुनिया को बता दिया कि हमारी डिक्शनरी में परमानेंट दोस्त या परमानेंट दुश्मन जैसा कुछ नहीं होता. पोलैंड के पूर्व राजदूत और कूटनीति के जानकार एडम बुराकोव्स्की ने इसे भारत की कामयाबी बताया है. उन्‍होंने बताया क‍ि कैसे युद्ध के माहौल में भी भारत ब‍िना कोई बड़ा नुकसान उठाए, ग्लोबल पॉलिटिक्स में छाया रहा.

जब रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू हुआ, तो पश्चिमी देशों ने भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाया. वो चाहते थे कि भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर खड़े होकर खुलकर रूस की निंदा करे. लेकिन एडम बुराकोव्स्की लिखते हैं कि पश्चिमी देशों की ये उम्मीद ही बेवकूफी भरी थी. पीढ़ियों से भारत की पॉलिसी रही है कि वो रूस की सीधी निंदा नहीं करता. रूस भारत का पुराना और भरोसेमंद साझेदार रहा है. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि भारत युद्ध का चीयरलीडर बन गया हो. भारत ने रूस से साफ कह दिया कि भैया, युद्ध से बात नहीं बनेगी, शांति से मसला सुलझाओ. भारत ने यूक्रेन से भी रिश्ते निभाए और यूरोप से भी. इसी मल्टी-अलाइंड या कहिए बैलेंसिंग एक्ट का सीधा फायदा, भारत रूस के साथ भी है और यूरोप के नजदीक भी…

आंकड़ों से समझ‍िए पूरा खेल

रूस के भारी डिस्काउंट वाले ऑफर को भारत ने दोनों हाथों से लपका. और ये कोई छोटी-मोटी डील नहीं थी. एडम बुराकोव्स्की ने ल‍िखा, साल 2022 से अब तक भारत ने रूस से लगभग 168 बिलियन डॉलर यानी यानी कई लाख करोड़ रुपये का कच्चा तेल खरीदा. युद्ध से पहले दोनों देशों का व्यापार बमुश्किल 12-13 बिलियन डॉलर सालाना होता था. आज ये उछलकर 70 बिलियन डॉलर सालाना के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. और मजे की बात देखिए, इस 70 बिलियन डॉलर में से 60 बिलियन डॉलर तो सिर्फ कच्चे तेल का है. दोनों देशों ने अब तो 2030 तक इस व्यापार को 100 बिलियन डॉलर तक पहुंचाने का तगड़ा टारगेट भी सेट कर दिया है.

अमेरिका की धमकी को ठेंगा

अब जब भारत भर-भरकर रूसी तेल ले रहा था, तो अमेरिका के पेट में दर्द होना लाजमी था. पिछले साल के अंत में वाशिंगटन ने भारत पर प्रेशर बनाया. इसका असर भी दिखा. फरवरी आते-आते भारत का रूसी तेल आयात गिरकर 1.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन के निचले स्तर पर आ गया. लेकिन तभी कूटनीति की बिसात पर एक नया मोहरा चला गया. मिडिल ईस्ट यानी खाड़ी क्षेत्र में जंग छ‍िड़ गई और स्‍ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद हो गया.

अमेरिका को तुरंत समझ आ गया कि अगर भारत ने ग्लोबल बाजार से महंगा तेल उठाना शुरू किया, तो दुनिया भर में तेल की कीमतें आसमान छू जाएंगी. अमेरिका ने अपनी अकड़ छोड़ी और देशों को रूसी तेल खरीदने की छूट दे दी. भारत ने तुरंत गियर बदला और मार्च आते-आते रूसी तेल का आयात 2.25 मिलियन बैरल प्रतिदिन के रिकॉर्ड पर पहुंच गया. मतदा जहां, भारत वहां. इससे भारत ने न सिर्फ पेट्रोल-डीजल महंगा होने से बचाया, बल्कि घरेलू महंगाई को भी कंट्रोल में रखा.

डॉलर को ‘बाय-बाय’

भारत ने पेमेंट का तरीका बदल द‍िया. पश्चिमी देशों ने रूस पर बैन लगाए और उसे इंटरनेशनल स्विफ्ट सिस्टम से बाहर कर दिया. यानी रूस डॉलर में व्यापार नहीं कर सकता था. तो जुगाड़ क्या निकला? अपना ‘भारतीय रुपया’. रूस के बैंकों ने भारत में वोस्ट्रो खाते खोले और पेमेंट रुपये में होने लगी. लेकिन इंडिया इतना तेल खरीद रहा था कि रूस के पास रुपये का अंबार लग गया.

रूस ने कहा कि थोड़ा यूएई के दिरहम या चीन के युआन में पेमेंट कर दो. हालांकि, व्यापार में चीनी युआन का शेयर बढ़ा जरूर है, जिससे बीजिंग को थोड़ा फायदा मिला, लेकिन अभी भी व्यापार में बॉस रुपया ही है. मजबूरी में शुरू हुए इस सिस्टम ने दुनिया भर में डॉलर के वर्चस्व को एक तगड़ा झटका दे दिया है.

रूस अब भारत में लुटाएगा पैसा

दिसंबर 2025 में जब रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत आए थे, तब ये मुद्दा उठा कि रूस के पास जो इतना सारा रुपया जमा हो गया है, उसका क्या किया जाए? फैसला हुआ कि रूस अब भारत में ही निवेश करेगा. पहले कुछ दिक्कतें थीं, जैसे 1994 की निवेश संधि जो 2017 में भारत ने खत्म कर दी थी, और रूस की गिरती क्रेडिट रेटिंग. लेकिन अब चीजें तेजी से बदल रही हैं. रूसी बैंक भारत में अपना सेटअप लगा रहे हैं, पेमेंट आसान कर रहे हैं और रूसी पैसा भारत के स्टार्टअप्स से लेकर ई-कॉमर्स कंपनियों में लग रहा है. जून 2026 में दोनों देशों के बीच एक नई द्विपक्षीय निवेश संधि पर बातचीत भी होने वाली है.

एक हाथ से रूस, दूसरे हाथ से यूरोप…

एडम बुराकोव्स्की ने ल‍िखा, भारत सिर्फ रूस के सस्ते तेल के भरोसे नहीं बैठा है, वो अपने विकल्प डायवर्सिफाई कर रहा है. जनवरी 2026 में भारत ने यूरोपीय यून‍ियन के साथ एक ऐतिहासिक ‘फ्री ट्रेड एग्रीमेंट’ की इबारत लिख दी है. इसका ड्राफ्ट पब्लिश हो गया है और 2027 तक इसके लागू होने की पूरी उम्मीद है. इतना ही नहीं, 27 अप्रैल 2026 को भारत न्यूजीलैंड के साथ भी ऐसा ही एक शानदार एफटीए साइन करने जा रहा है, जिसे सिर्फ 9 महीने के रिकॉर्ड समय में फाइनल किया गया है.

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