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कुल 27 नक्षत्रों में से 6 नक्षत्र 'गंडमूल' की श्रेणी में आते हैं। ये उन स्थानों पर होते हैं जहाँ राशि और नक्षत्र दोनों एक साथ समाप्त होते हैं। अश्विनी (मेष राशि), अश्लेषा (कर्क राशि), मघा (सिंह राशि), ज्येष्ठा (वृश्चिक राशि), मूल (धनु राशि) और रेवती (मीन राशि) नक्षत्र गण्डमूल नक्षत्र कहे जाते हैं। तिथि लग्न व नक्षत्र का कुछ भाग गण्डान्त कहलाता है। अतिगण्ड योग वैदिक ज्योतिष के 27 योगों में से छठा योग है। इसे बहुत ही अशुभ योग माना जाता है। इस योग में जन्म लेने वाला जातक या तो टॉप पर रहता है या फिर एकदम बर्बाद जीवन होता है।

 

2. यह दोष क्यों माना जाता है?

गंडमूल को 'संधि काल' या 'बदलाव का समय' माना जाता है। ज्योतिष में माना जाता है कि इस समय ऊर्जा अस्थिर होती है।


<strong>मान्यता:</strong> पुराने समय में माना जाता था कि इस नक्षत्र में जन्मे बच्चे का स्वास्थ्य नरम रह सकता है या उसका स्वभाव माता-पिता के लिए कुछ चुनौतियाँ ला सकता है।


<strong>सच्चाई:</strong> आधुनिक ज्योतिष इसे केवल &#039;चुनौती&#039; नहीं मानता। गंडमूल में जन्मे लोग अक्सर बहुत तेज बुद्धि, संघर्षशील और असाधारण व्यक्तित्व वाले होते हैं।


 

3. इसके प्रभाव

  • ऐसा नहीं है कि गंडमूल हमेशा बुरा ही होता है। इसका प्रभाव इस पर निर्भर करता है कि जन्म किस 'चरण' (Quarter) में हुआ है:
  • कुछ चरण धन लाभ देते हैं।
  • कुछ चरण माता-पिता के कष्ट का संकेत देते हैं।
  • कुछ चरण स्वयं जातक के संघर्ष को दर्शाते हैं।

4. शांति के उपाय

<strong>पारंपरिक उपाय: </strong>यदि किसी की कुंडली में गंडमूल दोष है, तो डरने की आवश्यकता नहीं है। इसके पारंपरिक उपाय बहुत प्रभावी माने जाते हैं:


<strong>27वें दिन पूजा: </strong>बच्चे के जन्म के ठीक 27वें दिन (जब वही नक्षत्र दोबारा आए) गंडमूल शांति पूजा कराई जाती है।


<strong>27 कुओं का पानी/मिट्टी: </strong>इसमें प्रतीकात्मक रूप से 27 अलग-अलग जगहों की चीजों का उपयोग किया जाता है।


<strong>दान-पुण्य: </strong>नक्षत्र के देवता की पूजा और दान करने से दोष समाप्त हो जाता है।


<strong>मुंह नहीं देखना: </strong>गंडांत योग में जन्म लेने वाले बालक के पिता उसका मुंह तभी देखें, जब इस योग की शांति हो गई हो।

गंडमूल के अचूक उपाय:

1. पराशर मुनि के अनुसार तिथि गण्ड में बैल का दान, नक्षत्र गण्ड में गाय का दान और लग्न गण्ड में स्वर्ण का दान करने से दोष मिटता है। 


2. संतान का जन्म अगर गण्डान्त पूर्व में हुआ है तो पिता और शिशु का अभिषेक करने से और गण्डान्त के अंतिम भाग में जन्म लेने पर माता एवं शिशु का अभिषेक कराने से दोष कटता है।


3. ज्येष्ठा गंड शांति में इन्द्र सूक्त और महामृत्युंजय का पाठ किया जाता है।


4. मूल, ज्येष्ठा, आश्लेषा और मघा को अति कठिन मानते हुए 3 गायों का दान बताया गया है। 


5. रेवती और अश्विनी में 2 गायों का दान और अन्य गंड नक्षत्रों के दोष या किसी अन्य दुष्ट दोष में भी एक गाय का दान बताया गया है।

अतिगंड योग:

अतिगंड योग को ज्योतिष में एक अत्यंत अशुभ समय माना गया है, जिसका स्वामी चंद्रमा है। इसकी शुरुआती 6 घटी शुभ कार्यों के लिए वर्जित हैं।


 

मुख्य नकारात्मक प्रभाव:

<strong>कष्टकारी जीवन: </strong>इस योग में जन्म लेने वाला जातक अमीर होने के बावजूद बाधाओं और संघर्षों से घिरा रहता है।


<strong>स्वभाव: </strong>जातक क्रोधी, अहंकारी, और कभी-कभी अपराधी या धोखेबाज प्रवृत्ति का हो सकता है।


<strong>पारिवारिक अनिष्ट: </strong>यह योग परिवार के सदस्यों (माता-पिता, सास-ससुर, जेठ या देवर) के लिए अनिष्टकारी हो सकता है। गंभीर स्थितियों में यह &#039;कुलहन्ता&#039; या &#039;बालारिष्ट&#039; योग भी बनाता है।


 

गंडांत योग (राशियों की संधि):

जब मीन-मेष, कर्क-सिंह या वृश्चिक-धनु राशियों का मिलन होता है, तो उसे गंडांत कहते हैं। 


इसमें भी ज्येष्ठा के अंत की 5 घटी और मूल के आरंभ की 8 घटी महाअशुभ मानी गई हैं।


 

नक्षत्रों का विशिष्ट प्रभाव:

<strong>आश्लेषा: </strong>सास के लिए कष्टकारी।


<strong>मूल (प्रथम चरण): </strong>पिता और ससुर के लिए भारी।


<strong>ज्येष्ठा: प</strong>ति के बड़े भाई (जेठ) के लिए अनिष्टकारी।


<strong>निष्कर्ष: </strong>यदि किसी जातक का जन्म इन योगों में हुआ है, तो अशुभ प्रभावों को कम करने के लिए शास्त्रोक्त शांति उपाय अनिवार्य हैं।

 

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