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जब हम 1960 के दशक के भारतीय क्रिकेट की बात करते हैं, तो अक्सर तकनीक और रक्षात्मक खेल का जिक्र होता है लेकिन उस दौर में भी एक ऐसा खिलाड़ी था जो चश्मे पहनकर मैदान पर उतरता था और पहली ही गेंद से विपक्षी गेंदबाजों की बखिया उधेड़ देता था वे थे बुधी कुंदरन.
60 के दशक में भारत के लिए खेले विकेटकीपर बुधी कुंदरन का उस समय था धोनी जैसा जलवा
जब हम 1960 के दशक के भारतीय क्रिकेट की बात करते हैं, तो अक्सर तकनीक और रक्षात्मक खेल का जिक्र होता है लेकिन उस दौर में भी एक ऐसा खिलाड़ी था जो चश्मे पहनकर मैदान पर उतरता था और पहली ही गेंद से विपक्षी गेंदबाजों की बखिया उधेड़ देता था वे थे बुधी कुंदरन.
अनोखा सफर: पहले टेस्ट, फिर रणजी
कुंदरन की कहानी किसी फिल्मी पटकथा जैसी है. 1960 में जब ऑस्ट्रेलिया की टीम भारत दौरे पर थी, तब कुंदरन को बिना किसी प्रथम श्रेणी (First-class) अनुभव के सीधे टेस्ट टीम में चुन लिया गया. उन्होंने अपना पहला टेस्ट खेला और उसके बाद वे घरेलू क्रिकेट यानी रणजी ट्रॉफी के मैदान पर उतरे क्रिकेट की दुनिया में ऐसा उदाहरण विरला ही मिलता है. कुंदरन अपने पहले ही रणजी मैच में दोहरा शतक जड़ देते है.
1964 की वो ऐतिहासिक सीरीज
कुंदरन के करियर का सबसे स्वर्णिम अध्याय 1964 में इंग्लैंड के खिलाफ घरेलू सीरीज में लिखा गया. चेन्नई (तब मद्रास) के कॉर्पोरेशन स्टेडियम में उन्होंने अपनी बल्लेबाजी का ऐसा जलवा बिखेरा कि अंग्रेज गेंदबाज त्राहि-त्राहि कर उठे उस मैच में उन्होंने 192 रनों की तूफानी पारी खेली. पूरी सीरीज में कुंदरन का बल्ला आग उगलता रहा ौर उन्होंने उस सीरीज में 525 रन बनाए, जो आज भी एक विकेटकीपर-बल्लेबाज द्वारा एक टेस्ट सीरीज में बनाए गए सर्वाधिक रनों का भारतीय रिकॉर्ड है. उनकी बल्लेबाजी में वो आक्रामकता थी जो उस दौर के हिसाब से समय से बहुत आगे मानी जाती थी.
बल्लेबाज, कीपर और ‘नई गेंद’ का गेंदबाज
कुंदरन केवल अपनी बल्लेबाजी के लिए ही नहीं, बल्कि अपनी बहुमुखी प्रतिभा के लिए भी जाने जाते थे. एक विकेटकीपर होने के नाते दस्ताने संभालना उनका मुख्य काम था, लेकिन उनकी कहानी में एक दिलचस्प मोड़ तब आया जब उन्होंने टेस्ट मैच में नई गेंद से गेंदबाजी की. यह घटना 1967 के एजबेस्टन टेस्ट की है. भारत के पास उस समय तेज गेंदबाजों की कमी थी. कुंदरन ने विकेटकीपिंग के दस्ताने उतारे और गेंदबाजी का जिम्मा संभाला. एक विकेटकीपर का नई गेंद के साथ गेंदबाजी की शुरुआत करना क्रिकेट के सबसे दुर्लभ और रोचक दृश्यों में से एक था. वे मैदान पर कुछ भी करने का माद्दा रखते थे.
एक बेमिसाल विरासत
18 टेस्ट मैचों के अपने छोटे से करियर में कुंदरन ने 32.70 की औसत से 981 रन बनाए, जिसमें दो शतक शामिल थे. उन्होंने फारुख इंजीनियर जैसे दिग्गज के साथ टीम में जगह के लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा की, लेकिन उनके खेल की शैली ने उन्हें दर्शकों का चहेता बना दिया. बुधी कुंदरन का खेल आज के टी-20 युग के क्रिकेटरों जैसा था बेखौफ और मनोरंजक. उन्होंने सिखाया कि क्रिकेट सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह दिल से खेलने और दर्शकों का मनोरंजन करने का भी माध्यम है. भले ही वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन ‘पहले टेस्ट, फिर रणजी’ का उनका रिकॉर्ड और 1964 की वो बेमिसाल बल्लेबाजी आज भी भारतीय क्रिकेट के सुनहरे पन्नों में दर्ज है.
About the Author
मैं, राजीव मिश्रा, वर्तमान में नेटवर्क 18 में एसोसिएट स्पोर्ट्स एडिटर के रूप में कार्यरत हूँ. इस भूमिका में मैं डिजिटल स्पोर्ट्स कंटेंट की योजना, संपादकीय रणनीति और एंकरिंग की जिम्मेदारी निभाता हूँ. खेल पत्रका…और पढ़ें
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