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पति ने अपनी याचिका में कोर्ट को बताया था कि वह पेशे से श्रमिक है. उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह हर महीने चार हजार रुपये दे सके. पति ने कोर्ट में हलफनामा देकर पत्नी पर अवैध संबंध के आरोप भी लगाए थे. हालांकि हाईकोर्ट ने पति की दलीलें खारिज कर दीं.

बीवी-बच्चे पालने की हैसियत नहीं तो शादी नहीं... पति की याचिका HC में हुई खारिजZoom

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेंटनेंस की याचिका पर की बड़ी टिप्पणी.

प्रयागराजः इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मेंटिनेंस की याचिका पर सुनवाई करते हुए कड़ी टिप्पणी की है. कोर्ट ने कहा कि अगर बीवी और बच्चों को पालने की हैसियत नहीं है तो शादी नहीं करनी चाहिए. शादी के बाद आर्थिक तंगी का हवाला देकर जिम्मेदारी से भागा नहीं जा सकता है. जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस विवेक सरन की बेंच ने पति की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उसने फैमिली कोर्ट की ओर से पत्नी को 4000 रुपये प्रति महीने भरण-पोषण के आदेश को चुनौती दी थी. पति ने अपनी याचिका में कोर्ट को बताया था कि वह पेशे से श्रमिक है. उसकी आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह हर महीने चार हजार रुपये दे सके. पति ने कोर्ट में हलफनामा देकर पत्नी पर अवैध संबंध के आरोप भी लगाए थे. हालांकि हाईकोर्ट ने पति की दलीलें खारिज कर दीं.

फैमिली कोर्ट के फैसले को दिया था चुनौती
7 अप्रैल को दिए गए एक आदेश में, न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और विवेक सरन की पीठ ने कहा कि कोई भी पुरुष अपनी पत्नी का भरण-पोषण करने से बचने के लिए आर्थिक तंगी का बहाना नहीं बना सकता. उच्च न्यायालय ने कहा, “एक बार जब कोई पुरुष किसी महिला से शादी कर लेता है, तो कानून के तहत वह उसका भरण-पोषण करने के लिए बाध्य होता है.” उच्च न्यायालय ने प्रयागराज परिवार न्यायालय के उस आदेश को चुनौती देने वाली पति की अपील को खारिज कर दिया, जिसमें वैवाहिक विवाद के लंबित रहने के दौरान पत्नी को भरण-पोषण देने का आदेश दिया गया था.

पति ने अपनी याचिका में पत्नी पर लगाए थे आरोप
फैमिली कोर्ट ने तेज बहादुर मौर्य को अपनी पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण के रूप में 4,000 रुपये देने का निर्देश दिया था. इस आदेश को चुनौती देते हुए मौर्य ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की और तर्क दिया कि परिवार न्यायालय ने आदेश पारित करते समय उनकी आर्थिक स्थिति को ध्यान में नहीं रखा. यह भी कहा गया कि परिवार न्यायालय ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया कि महिला किसी अन्य पुरुष के साथ रह रही थी और दोनों पक्षों के बीच हलफनामे पर आपसी सहमति से अलगाव दर्ज था.

हाईकोर्ट ने कहा- यह राशि अधिक नहीं है
उच्च न्यायालय ने पाया कि पारिवारिक न्यायालय ने इन आरोपों पर उचित रूप से विचार किया था और महिला के इस दावे को ध्यान में रखा था कि वह बिना किसी स्वतंत्र आय के अपने बच्चों का भरण-पोषण करती है. उच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि आज के जीवन यापन के खर्च को देखते हुए, यह नहीं कहा जा सकता कि यह राशि अत्यधिक है और अपीलकर्ता के लिए वहनीय नहीं है.

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Prashant RaiChief Sub Editor

Prashant Rai am currently working as Chief Sub Editor at News18 Hindi Digital, where he lead the creation of hyper-local news stories focusing on politics, crime, and viral developments that directly impact loc…और पढ़ें

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