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वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को आने वाला यह पर्व, जिसे हम 'अखा तीज' के नाम से भी जानते हैं, सिर्फ एक त्योहार नहीं बल्कि सौभाग्य का एक 'अक्षय' भंडार है। 'अक्षय' का अर्थ ही है- वह जिसका कभी नाश न हो। मान्यता है कि इस दिन किया गया कोई भी शुभ कार्य, चाहे वह दान हो, जप हो या निवेश, उसका फल जन्म-जन्मांतर तक हमारे साथ रहता है। इस विशेष तिथि को त्रेतायुग के आरंभ और भगवान परशुराम, नर-नारायण व हयग्रीव के प्राकट्य दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। इतना ही नहीं, इसी पावन दिन बद्रीनाथ धाम के कपाट भी खुलते हैं।

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अक्षय तृतीया व्रत 2026:

<strong>पूजा: </strong>इस दिन भक्त व्रत का संकल्प लेकर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की संयुक्त रूप से पूजा करते हैं।


<strong>उद्देश्य: </strong>यह व्रत जीवन में सुख-समृद्धि और अक्षय (कभी न खत्म होने वाले) पुण्य की प्राप्ति के लिए रखा जाता है।


<strong>प्रकार: </strong>भक्त अपनी क्षमतानुसार निराहार (बिना भोजन के) या फलाहारी व्रत रखते हैं।


<strong>नियम: </strong>सुबह जल्दी उठकर पवित्र नदी या घर पर गंगाजल मिलाकर स्नान करना अनिवार्य है। व्रत के दौरान पीले रंग के वस्त्र पहनना और मन को शांत रखना जरूरी है।


<strong>भोजन: </strong>यदि पूर्ण व्रत संभव न हो, तो शाम को एक समय बिना नमक का भोजन (जैसे मीठा हलवा, दूध, फल या केसरिया चावल) ग्रहण किया जाता है।


<strong>निषेध:</strong> इस दिन क्रोध करना, झूठ बोलना और तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस) का सेवन पूरी तरह वर्जित है।


 

अक्षय तृतीया पूजा का शुभ मुहूर्त:

<span style="color:#8b4513"><strong>अक्षय तृतीया पूजा मुहूर्त: </strong></span>10:49:08 से 12:20:34 तक<br />
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    <strong><span style="color:#b22222">19 अप्रैल पूजा और खरीददी का शुभ मुहूर्त:</span></strong>

    शुभ मुहूर्त: सुबह 10:49 से दोपहर 12:20 तक।

    अभिजीत मुहूर्त: दिन में 11:54 से दोपहर 12:46 तक।

    त्रिपुष्कर योग: सुबह 07:10 से 10:49 तक रहेगा।

    राहुकाल: शाम 05:12 से शाम 06:49 के बीच रहेगा। इस बीच सभी कार्य वर्जित रहेंगे।

     

    <strong><span style="color:#b22222">20 अप्रैल पूजा और खारीदी का शुभ मुहूर्त:</span></strong>

    शुभ मुहूर्त: सुबह 09:06 से 10:43 तक।

    अभिजीत मुहूर्त: दिन में 11:54 से दोपहर 12:46 तक।

    सर्वार्थ सिद्धि योग: पूरे दिन

    राहुकाल: सुबह 07:28 से 09:05 के बीच। इस बीच सभी कार्य वर्जित रहेंगे।

 


<strong>अबूझ मुहूर्त: </strong>शास्त्रों के अनुसार, यह त्योहार तब मनाया जाता है जब तृतीया तिथि दिन के पहले हिस्से (पूर्वाह्न) में मौजूद हो। यदि यह तिथि लगातार दो दिन आती है, तो दूसरे दिन को प्रधानता दी जाती है। सबसे उत्तम संयोग तब बनता है जब इस दिन बुधवार या सोमवार के साथ &#039;रोहिणी नक्षत्र&#039; का साथ मिल जाए। इसे साल के उन &#039;साढ़े तीन&#039; मुहूर्तों में गिना जाता है, जिसमें बिना पंचांग देखे कोई भी शुभ कार्य किया जा सकता है।


 

पूजा की सरल और सात्विक विधि

इस दिन की शुरुआत तन और मन की शुद्धि के साथ करें। सुबह स्नान के बाद पीले वस्त्र धारण करना अत्यंत शुभ माना जाता है, क्योंकि पीला रंग भगवान विष्णु को प्रिय है।


<strong>अर्चन: </strong>विष्णु जी की प्रतिमा को गंगाजल से स्नान कराएं और उन्हें तुलसी दल, पीले फूल व माला अर्पित करें।


<strong>साधना: </strong>पीले आसन पर बैठकर विष्णु सहस्रनाम या चालीसा का पाठ करें और अंत में प्रेमपूर्वक आरती उतारें।


<strong>भोग: </strong>प्रसाद में जौ या गेहूं का सत्तू, ककड़ी और भीगी हुई चने की दाल अर्पित करना परंपरा का हिस्सा है।


<strong>उपवास का विकल्प: </strong>यदि आप पूर्ण उपवास नहीं कर सकते, तो फलाहार के रूप में पीला मीठा हलवा, केले या केसरिया चावल ग्रहण कर सकते हैं।


 

दान और निवेश: समृद्धि का मार्ग

  • अक्षय तृतीया पर 'सोना खरीदने' का चलन केवल दिखावा नहीं, बल्कि महालक्ष्मी को आमंत्रित करने का एक प्रतीक है। माना जाता है कि आज खरीदा गया सोना आपके वैभव को आजीवन बढ़ाता है।
  • लेकिन याद रखें, इस दिन असली धन 'पुण्य' है। अपने पितरों की शांति के लिए तीर्थ स्नान, तर्पण और ब्राह्मणों को भोजन कराना विशेष फलदायी है। जौ, सत्तू, दही-चावल और दूध से बनी वस्तुओं का दान आज के दिन आपके भाग्य के द्वार खोल सकता है।
 

अक्षय तृतीया की आरती:

1. माता लक्ष्मी जी की आरती (Maa Lakshmi Aarti) 

ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता।

तुमको निशदिन सेवत, हरि विष्णु विधाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता… 

उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता।

मैया तुम ही जग-माता।

सूर्य-चंद्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता… 

दुर्गा रूप निरंजनी, सुख सम्पत्ति दाता।

मैया सुख संपत्ति दाता।

जो कोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि धन पाता॥

ॐ जय लक्ष्मी माता… 

 

अक्षय तृतीया पौराणिक कथा

एक बार युधिष्ठिर के पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें इस तिथि का महत्व बताया। उन्होंने एक प्राचीन कथा सुनाई कि एक बहुत ही गरीब और सदाचारी व्यापारी था, जो अपनी गरीबी से परेशान रहता था। किसी विद्वान की सलाह पर उसने अक्षय तृतीया के दिन गंगा स्नान किया और अपनी सामर्थ्य के अनुसार श्रद्धापूर्वक देवी-देवताओं की पूजा व दान किया। इसी पुण्य के प्रभाव से वह व्यापारी अगले जन्म में कुशावती का प्रतापी राजा बना। वह इतना धनी और वैभवशाली हुआ कि उसका खजाना कभी खाली नहीं हुआ।


 

 यह कथा सिखाती है कि इस दिन किया गया दान और पूजन कभी निष्फल नहीं जाता और व्यक्ति को अक्षय (कभी न खत्म होने वाले) सुख की प्राप्ति होती है।

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