बलिया शहीद पार्क स्वतंत्रता सेनानियों की याद में बना एक ऐतिहासिक स्थल है. 1942 के आंदोलन में लोहा पट्टी इलाके में मारे गए नौ क्रांतिकारियों की शहादत की कहानी आज भी यहां की मिट्टी में जीवित है. पार्क में शहीदों के नामांकित पट्टिकाएं लोगों को उनके साहस और बलिदान की याद दिलाती हैं. आइए जानते है इसकी कहानी…
बलिया के देवकली स्थित सूर्य मंदिर में स्थापित देवी प्रतिमा को बेहद प्राचीन माना जाता है. यह प्रतिमा यहां के पुरातात्विक टीले से मिली थी. इसकी बनावट में ईरानी और भारतीय शैली का सुंदर मेल दिखाई देता है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, यह प्रतिमा भृगु मुनि के आगमन की ऐतिहासिक निशानी मानी जाती है.
प्रख्यात इतिहासकार डॉ. शिवकुमार सिंह कौशिकेय के अनुसार, बलिया की पुरानी ट्रेजरी अंग्रेजों द्वारा लगभग सन 1900 में बनवाई गई थी. यहां उस समय की मजबूत तिजोरियां आज भी मौजूद हैं. 9 अगस्त 1942 के आंदोलन के दौरान, जब लोगों ने अंग्रेजी शासन का विरोध किया, तब यहां रखे लगभग नौ लाख रुपये जला दिए गए थे. यह घटना भी बलिया की ऐतिहासिक धरोहर का हिस्सा मानी जाती है.
असेगा गांव का शोक हरण नाथ मंदिर भी इतिहास और आस्था से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल है. यहां के प्राचीन शिवलिंग के बारे में मान्यता है कि मुगल सैनिकों ने इसे तोड़ने का प्रयास किया, तो लिंग से खून निकल पड़ा था. यह घटना आज भी लोगों के बीच आस्था और चमत्कार की कहानी के रूप में जीवित है. मंदिर में “शोक” का अर्थ दुःख और “हरण” का अर्थ नाश करने वाला माना जाता है.
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जिलाधिकारी कार्यालय बलिया अंग्रेजी दौर की ऐतिहासिक इमारत है, जिसे लगभग 1900 में बनाया गया था. ब्रिटिश शासन के समय स्वतंत्रता सेनानियों के खिलाफ कई फैसले यहीं से सुनाए जाते थे. इसी भवन से आदेश जारी होते थे, जिनके जरिए क्रांतिकारियों को सजा और यातनाएं दी जाती थीं. इस भवन में आज भी गर्मी के दिनों में ठंड और ठंड के दिनों में गर्मी महसूस होती है, जिसे बहुत प्राकृतिक तरीके से बनाया गया है.
बलिया शहर के बीचोंबीच स्थित शहीद पार्क स्वतंत्रता सेनानियों की याद में बनाया गया है. यहां की मिट्टी शहीदों के खून से सनी हुई मानी जाती है. इसके थोड़े आगे लोहा पट्टी इलाके में 1942 के आंदोलन के दौरान अंग्रेजों ने नौ क्रांतिकारियों को गोली मार दी थी. आज यहां शहीदों के नामांकित पट्टिकाएं लगी हैं, जो लोगों को उनके बलिदान की याद दिलाती हैं.
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