राष्ट्रीय चंबल घड़ियाल वन्यजीव अभयारण्य में हो रहे अवैध खनन पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मीडिया रिपोर्ट्स और सीएसआर (CSR) की रिपोर्टों के आधार पर मामले का स्वतः संज्ञान (Suo Motu) लिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि संरक्षित क्षेत्रों में पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद रेत का अवैध खनन और परिवहन जारी है, जो लुप्तप्राय प्रजातियों के लिए काल बन रहा है। जहां CM ने घड़ियाल छोड़े, वह इलाका भी सुरक्षित नहीं सुनवाई के दौरान विक्रम नाथ ने गंभीर टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि CM मोहन यादव ने जिन इलाकों में घड़ियाल छोड़े थे, वे क्षेत्र भी अब सुरक्षित नहीं रहे। अवैध खनन के कारण वहां का प्राकृतिक वातावरण खराब हो रहा है। खनन माफिया के डर और प्राकृतिक आवास नष्ट होने की वजह से घड़ियालों को अपने क्षेत्र छोड़ने पर मजबूर होना पड़ रहा है। हमने देखा है कि जिन संरक्षित क्षेत्रों में घड़ियाल संरक्षण कार्यक्रम चल रहा है, वहां अंधाधुंध खनन हो रहा है। इसके कारण घड़ियालों को विस्थापित होना पड़ रहा है। मामला अब उचित दिशा-निर्देशों के लिए प्रधान न्यायाधीश (CJI) के समक्ष भेजा जाएगा।” — जस्टिस संदीप मेहता पारिस्थितिक तंत्र पर मंडरा रहा खतरा चंबल अभयारण्य का 435 किलोमीटर लंबा क्षेत्र घड़ियालों के अलावा रिवर डॉल्फिन, दुर्लभ कछुओं और पक्षियों का भी घर है। कोर्ट ने चिंता जताई कि संरक्षित क्षेत्र में रेत का परिवहन और खनन पूरी तरह प्रतिबंधित है, फिर भी यह धड़ल्ले से जारी है। रेत इस पूरे ईको-सिस्टम का आधार है। इसके हटने से घड़ियालों के प्रजनन और रहने की जगह खत्म हो रही है। अवैध खनन न केवल वन्यजीवों बल्कि पूरे पर्यावरण के संतुलन को बिगाड़ रहा है। तीन राज्यों की सीमा पर स्थित है ‘सेंसिटिव जोन’ 1979 में अधिसूचित राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान के त्रिकोणीय क्षेत्र (Trisection) पर स्थित है। इसे मुख्य रूप से लुप्तप्राय घड़ियालों को बचाने के लिए बनाया गया था, लेकिन अब यह माफियाओं की शरणस्थली बनता जा रहा है।
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