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एक होनहार छात्र से बिस्तर पर पड़े मरीज और फिर सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले तक हरीश राणा की जिंदगी का सफर पिछले 13 वर्षों में कई दर्दनाक मोड़ों से गुजरा है। जुलाई 2010 में हरीश ने चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी में सिविल इंजीनियरिंग में दाखिला लिया था। परिवार को उम्मीद थी कि पढ़ाई पूरी कर वह इंजीनियर बनेंगे और अपने सपनों को साकार करेंगे। इसी बीच 21 अगस्त 2013 की रात एक हादसे ने उनकी दुनिया ही बदल दी।




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Harish Rana case in hindi From accident to euthanasia

हरीश राणा की फाइल फोटो
– फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी


पीजी की चौथी मंजिल से गिर गया था हरीश

उस रात हरीश अपनी बहन से बात करते हुए पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए। गंभीर रूप से घायल हरीश को तुरंत पीजीआई चंडीगढ़ में भर्ती कराया गया। बाद में दिसंबर 2013 में उन्हें दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल ले जाया गया। वहां डॉक्टरों ने बताया कि वह क्वाड्रिप्लेजिया से ग्रसित है। इस स्थिति में उनके हाथ-पैर पूरी तरह निष्क्रिय हो गए।


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हरीश राणा के पिता
– फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी


पिता को इलाज के लिए बेचना पड़ा तीन मंजिला मकान

हादसे के बाद परिवार का संघर्ष शुरू हो गया। बेटे के इलाज और देखभाल के लिए परिवार ने अपना सब कुछ झोंक दिया। वर्ष 2020 में परिवार दिल्ली से गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन की राज एंपायर सोसायटी में शिफ्ट हो गया। इलाज के बढ़ते खर्च को पूरा करने के लिए वर्ष 2021 में पिता अशोक राणा ने दिल्ली का अपना तीन मंजिला मकान भी बेच दिया। इसके बावजूद हरीश की स्थिति में कोई सुधार नहीं हो सका।


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हरीश राणा और उसके पिता
– फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी


आठ जुलाई 2025 को मांगी इच्छा मृत्यु

आखिरकार परिवार ने बेटे की पीड़ा को देखते हुए अदालत का दरवाजा खटखटाया। आठ जुलाई 2025 को दिल्ली हाईकोर्ट ने इच्छामृत्यु की अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद परिवार ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। करीब आठ महीने बाद 11 मार्च 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) की मंजूरी दे दी। इस फैसले के साथ हरीश के जीवन की लंबी और पीड़ादायक यात्रा एक निर्णायक मोड़ पर पहुंच गई।


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सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा को इच्छामृत्यु की दी इजाजत
– फोटो : एएनआई


फैसला पढ़ते हुए भावुक हुए जज साहब

फैसला पढ़ते समय जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि हरीश राणा कभी एक उज्ज्वल छात्र थे और अपने भविष्य के सपने देख रहे थे। लेकिन हादसे के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल गई। मामले की परिस्थितियों का जिक्र करते-करते जस्टिस पारदीवाला भावुक हो गए और कुछ देर के लिए उनकी आंखें नम हो गईं। 


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