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नॉर्वे की डैग्नी-मैग्डालीन को 18 साल तक डॉक्टरों ने ‘पागल’ और ‘नशेड़ी’ बताकर इलाज से मना कर दिया. जब उनके अंगों ने काम करना बंद कर दिया, तब जाकर असली बीमारी का पता चला. जानिए कैसे एक गलत मेडिकल रिपोर्ट ने उनकी जिंदगी के 18 साल छीन लिए.
इंसानी शरीर एक रहस्यमयी मशीन की तरह है, लेकिन जब यह मशीन खराब होने लगती है और डॉक्टर इसे समझने के बजाय मरीज को ही ‘पागल’ करार दे दें, तो जिंदगी किसी नर्क से कम नहीं होती. नॉर्वे की रहने वाली 33 साल की मेकअप आर्टिस्ट डैग्नी-मैग्डालीन जैगर मार्कुसेन के साथ कुछ ऐसा ही हुआ. डैग्नी लगभग दो दशकों यानी 18 साल तक एक ऐसी बीमारी से जूझती रहीं, जिसने उनके शरीर को अंदर से खोखला कर दिया. उन्हें ऐसे भयानक झटके लगते थे जैसे उनके शरीर में किसी आत्मा ने प्रवेश कर लिया हो और उनका शरीर किसी ‘कपड़े की गुड़िया (Rag Doll)’ की तरह इधर-उधर पटक दिया जाता था. डॉक्टर को दिखाने पर वे डैग्नी को नशेड़ी और पागल कहते. लेकिन जब ऑर्गन्स फेल हुए तो खौफनाक राज से पर्दा उठा. सोशल मीडिया पर अपनी आपबीती शेयर करने वाली डैग्नी ने बताया कि उनकी तबीयत तब बिगड़ने लगी जब वह महज 17 साल की थीं.
शुरुआत में उन्हें ल्यूपस होने की बात कही गई, लेकिन कुछ ही सालों बाद डॉक्टरों ने उनकी बीमारी को फाइलों से हटा दिया और सारा इलाज रोक दिया. डैग्नी को हर वक्त थकान, तेज दर्द और बार-बार संक्रमण होता था, लेकिन जब भी वह डॉक्टरों के पास मदद के लिए जातीं, उन्हें नजरअंदाज कर दिया जाता. डॉक्टरों ने उनकी बीमारी को मानसिक समस्या बताते हुए उन पर नशेड़ी और ‘हाइपोकॉन्ड्रियाक’ (बीमारी का वहम करने वाला) होने का आरोप तक लगा दिया. डैग्नी ने नम आंखों से बताया, ‘अक्टूबर की एक रात जब मेरे पार्टनर एरिक नहाने गए थे, तब मुझे अचानक झटके लगे. जब वे वापस आए, तो उन्होंने मुझे बिस्तर के पास भ्रूण की स्थिति (Fetal Position) में जमा हुआ पाया. मैं न बोल पा रही थी, न हिल पा रही थी. हम जैसे पुराने मरीज दर्द के इतने आदी हो जाते हैं कि हम चीखते नहीं, हम शांत हो जाते हैं. हमारे लिए दर्द का स्तर जब 10 पर पहुंचता है, तो वह चीखने वाला नहीं बल्कि सब कुछ निगल जाने वाला सन्नाटा होता है.’
इन झटकों के दौरान डैग्नी का अपने शरीर पर कोई नियंत्रण नहीं रहता था, लेकिन फिर भी डॉक्टर उन्हें ‘ड्रामा’ करने वाली महिला समझते थे. जब डैग्नी को लगा कि नॉर्वे का हेल्थ सिस्टम उन्हें मार डालेगा, तो उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया. वे और उनके पार्टनर इंडोनेशिया के बाली चले गए. डैग्नी का मानना है कि इस फैसले ने उनकी जान बचा ली. बाली के अस्पताल में भर्ती होते ही डॉक्टरों ने पाया कि उनके ऑर्गन्स फेल हो रहे थे. वहां के डॉक्टरों ने भाषा की बाधा के बावजूद डैग्नी की बात सुनी, उनके पूरे मेडिकल हिस्ट्री को पढ़ा और गहन जांच की. आखिरकार उन्हें ‘मिक्स्ड कनेक्टिव टिश्यू डिजीज’ नामक एक ऑटोइम्यून बीमारी का पता चला. यह एक ऐसी बीमारी है जिसमें शरीर का इम्यून सिस्टम अपने ही अंगों पर हमला करने लगता है.
डैग्नी का कहना है, ‘बाली में डॉक्टरों ने मेरे शरीर को एक पूरे सिस्टम की तरह देखा. उन्होंने वो टेस्ट किए, जो मुझे मेरे देश में कभी ऑफर नहीं किए गए थे. एक डायग्नोसिस मिलने से सब कुछ ठीक नहीं होता, लेकिन इससे सच्चाई सामने आती है. इससे यह साबित हो गया कि मैं जो महसूस कर रही थी वह असली था, कोई कल्पना नहीं.’ डैग्नी अब इम्यून-मॉड्यूलेटिंग उपचार ले रही हैं और उनकी स्थिति में सुधार हो रहा है. पहले के इलाज से डैग्नी काफी गुस्सा हैं. वे कहती हैं, ‘मैंने अपनी जिंदगी के 18 साल खो दिए. मैं आज 33 साल की उम्र में भारी कर्ज में डूबी हुई हूं और मुझे अपनी जिंदगी शून्य से शुरू करनी होगी, क्योंकि सालों पहले एक डॉक्टर ने मेरी मेडिकल फाइल में सिर्फ एक गलत वाक्य लिख दिया था.’ डैग्नी अब अपने अनुभवों पर एक डॉक्यूमेंट्री बना रही हैं, ताकि उन महिलाओं की आवाज बन सकें, जिन्हें हेल्थ सिस्टम्स में नजरअंदाज किया जाता है.
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न्यूज़18 हिंदी (Network 18) डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर के तौर कार्यरत. इंटरनेशनल, वेब स्टोरी, ऑफबीट, रिजनल सिनेमा के इंचार्ज. डेढ़ दशक से ज्यादा समय से मीडिया में सक्रिय. नेटवर्क 18 के अलावा टाइम्स ग्रुप, …और पढ़ें
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