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Draupadi Temple Hastinapur: मेरठ के हस्तिनापुर में स्थित ‘प्राचीन द्रौपदी मंदिर’ महाभारत काल की जीवंत गवाही देता है. मान्यता है कि इसी घाट पर माता द्रौपदी और पांडव स्नान कर पूजन करते थे. मंदिर में भगवान कृष्ण द्वारा चीर बढ़ाने वाली ऐतिहासिक मूर्ति भक्तों का मन मोह लेती है. मंदिर की महंत के अनुसार, यहां के ‘बूढ़ी गंगा’ के पवित्र जल में स्नान करने से कुष्ठ और चर्म रोग दूर हो जाते हैं.

Draupadi Temple Hastinapur: इतिहास की धूल में दबे पन्ने जब पलटते हैं, तो महाभारत कालीन गौरव गाथाएं जीवंत हो उठती हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ से महज 45 किलोमीटर दूर स्थित हस्तिनापुर आज भी उन यादों को सहेजे हुए है. पांडवों की राजधानी रहा यह क्षेत्र न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यहां का कण-कण ऐतिहासिक साक्ष्यों को खुद में समेटे हुए है. इन्हीं में से एक विशेष स्थान है ‘प्राचीन द्रौपदी मंदिर’. मान्यता है कि यह वही स्थान है जहां महारानी द्रौपदी प्रतिदिन स्नान और पूजन किया करती थीं. ऐसे में लोकल-18 की टीम द्वारा भी द्रौपदी मंदिर पहुंचकर मंदिर की महंत वेगवती से खास बातचीत की.

बूढ़ी गंगा के तट पर स्थित है आस्था का संगम
मंदिर की महंत वेगवती बताती हैं कि इस स्थान का गौरवशाली इतिहास हजारों वर्ष पुराना है. एक समय था जब हस्तिनापुर के तमाम ऐतिहासिक मंदिरों के बिल्कुल करीब से ‘बूढ़ी गंगा’ की अविरल धारा बहा करती थी. पांचों पांडव, दानवीर कर्ण और माता द्रौपदी इसी गंगा में स्नान कर विधि-विधान से पूजन करते थे. हालांकि, समय के साथ गंगा की मुख्य धारा अब यहाँ से लगभग 10 से 12 किलोमीटर दूर खिसक गई है, लेकिन द्रौपदी घाट पर आज भी बूढ़ी गंगा का पवित्र जल उपलब्ध है.

कुष्ठ और चर्म रोगों से मुक्ति की मान्यता
द्रौपदी घाट की सबसे बड़ी महिमा इसके जल को लेकर है. स्थानीय निवासियों और श्रद्धालुओं का अटूट विश्वास है कि इस घाट का जल औषधीय गुणों से भरपूर है. महंत वेगवती के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति कुष्ठ रोग, दाद, खाज या खुजली जैसी त्वचा संबंधी समस्याओं से ग्रसित है, तो इस पवित्र जल में स्नान करने मात्र से उसकी व्याधियां दूर हो जाती हैं. यही कारण है कि दूर-दराज से लोग यहां अपनी शारीरिक समस्याओं के निवारण हेतु खिंचे चले आते हैं.

मूर्ति में जीवंत है चीरहरण की वो मार्मिक दास्तान
मंदिर के भीतर प्रवेश करते ही भक्तों को महाभारत काल के उस दृश्य के दर्शन होते हैं, जिसने धर्म और अधर्म की परिभाषा बदल दी थी. मंदिर में स्थापित मूर्ति विशेष रूप से ‘द्रौपदी चीरहरण’ के प्रसंग को दर्शाती है. मूर्ति में दिखाया गया है कि जब दुशासन द्रौपदी का अपमान कर रहा था और उन्होंने अपने भ्राता भगवान श्री कृष्ण को पुकारा, तब कान्हा ने चीर (साड़ी) को इतना विस्तार दिया कि दुशासन उसे खींचते-खींचते थक गया. इस अलौकिक दृश्य को मूर्ति के रूप में यहाँ बेहद खूबसूरती से उकेरा गया है, जहाँ श्री कृष्ण द्रौपदी की लाज बचाते दिखाई देते हैं.

वैशाख सप्तमी पर लगता है भव्य मेला
मंदिर की महंत वेगवती बताती हैं कि हस्तिनापुर के इस पावन धाम पर हर साल वैशाख माह की सप्तमी को एक विशाल मेले का आयोजन होता है. इस मेले में देश के कोने-कोने से श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएं लेकर माँ द्रौपदी के दरबार में हाजिरी लगाते हैं. ऐसी मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से मांगी गई हर मुराद पूरी होती है.

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Rahul Goel

राहुल गोयल न्यूज़ 18 हिंदी में हाइपरलोकल (यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश) के लिए काम कर रहे हैं. मीडिया इंडस्ट्री में उन्हें 16 साल से ज्यादा का अनुभव है, जिसमें उनका फोकस हमेशा न्यू मीडिया और उसके त…और पढ़ें

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