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भारत मिडिल ईस्ट पर बहुत निर्भर है और देश की करीब 55 फीसदी एनर्जी आयात इसी इलाके से आती है, जो अब ईरान के हमलों से प्रभावित है. इसके अलावा शिपिंग रूट भी बाधित हो गए हैं, क्योंकि होर्मुज स्ट्रेट अब प्रभावी रूप से बंद हो चुका है. सरकार ने अब फैसला किया है कि भारत की सप्लाई चेन को बचाने के लिए जरूरी कदम उठाए जाएंगे. खास तौर पर निर्यात को सुरक्षित रखा जाएगा और जरूरी सामान जैसे एनर्जी, खाद और खाने वाले तेलों की आयात बिना रुके चलती रहेगी.

यह सब अलग-अलग सोर्स से होगा, जिसमें रूस भी शामिल है, ताकि घरेलू उपभोक्ताओं को कोई कमी न हो. रेड सी का वैकल्पिक रास्ता भी हमलों की वजह से जोखिम भरा माना जा रहा है. ऐसे में रिफाइनरी वाले अब सुरक्षित इलाकों से ज्यादा खरीदारी बढ़ा सकते हैं.

एनर्जी सप्लाई में डायवर्सिफिकेशन की तैयारी

अगर यह तनाव लंबा चला तो भारत एनर्जी आयात को और ज्यादा विविधता दे सकता है. क्रूड ऑयल और लिक्विफाइड नेचुरल गैस दोनों के लिए अमेरिका, वेनेजुएला और रूस जैसे देशों की तरफ रुख कर सकता है. रूस पिछले साल तक भारत का सबसे बड़ा क्रूड सप्लायर था, क्योंकि वहां डिस्काउंटेड दाम मिलते थे, लेकिन जनवरी 2026 से अमेरिकी दबाव के कारण खरीदारी काफी कम हो गई. भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल उपभोक्ता है, अमेरिका और चीन के बाद, लेकिन अपनी जरूरत का सिर्फ छोटा हिस्सा खुद बनाता है. जो तेल प्रोसेस होता है, उसमें से 88 फीसदी से ज्यादा आयात किया जाता है. हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, अधिकारियों का कहना है कि रिफाइनरी सभी संभव सप्लायरों से तेल लेती रहेंगी, ताकि उपलब्धता स्थिर रहे और कीमतें ज्यादा न बढ़ें.

वैश्विक कीमतों में उछाल, सरकार सतर्क

अमेरिका-इजराइल ने ईरान पर हमले किए और तेहरान ने जवाबी कार्रवाई की, जिससे वैश्विक कीमतें बढ़ गईं. बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड सोमवार को 81.57 डॉलर प्रति बैरल पर खुला, जो शुक्रवार के 72.87 डॉलर से करीब 12 फीसदी ज्यादा है. पेट्रोलियम मंत्रालय ने सोमवार को एक पोस्ट में कहा कि उन्होंने क्रूड ऑयल, एलपीजी और दूसरे पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स की सप्लाई स्थिति की समीक्षा की है. वरिष्ठ अधिकारियों और सरकारी तेल कंपनियों के साथ बैठक हुई. मंत्रालय ने कहा कि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है और जरूरी कदम उठाए जाएंगे ताकि प्रमुख पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स उपलब्ध और सस्ते रहें.

एक्सपोर्ट-इंपोर्ट लॉजिस्टिक्स पर फोकस

कॉमर्स मंत्रालय ने भी इंटर-डिपार्टमेंटल मीटिंग की, जिसमें हितधारकों से बात हुई कि ट्रेड में कितनी बाधा आ सकती है. मीटिंग में शिपिंग रूट में बदलाव, समय पर निर्यात के प्रभाव की समीक्षा हुई. चर्चा हुई कि कार्गो मूवमेंट में भरोसा बना रहे, देरी कम हो और एक्सपोर्टर-इंपोर्टर के लिए डॉक्यूमेंटेशन और पेमेंट आसान रहे. यह मीटिंग कॉमर्स डिपार्टमेंट के स्पेशल सेक्रेटरी सुचिंद्रा मिश्रा और डायरेक्टर जनरल ऑफ फॉरेन ट्रेड लव अग्रवाल की अध्यक्षता में हुई. इसमें लॉजिस्टिक्स ऑपरेटर, शिपिंग लाइंस, सेंट्रल बोर्ड ऑफ इंडायरेक्ट टैक्सेस एंड कस्टम्स, फाइनेंशियल सर्विसेज डिपार्टमेंट, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, पेट्रोलियम मंत्रालय और पोर्ट्स, शिपिंग एंड वॉटरवेज मंत्रालय के अधिकारी शामिल थे. एक्सपोर्ट प्रमोशन बॉडीज भी मौजूद थीं.

सरकार ने बताया है कि एक्सपोर्ट-इंपोर्ट लॉजिस्टिक्स में निरंतरता बनाए रखना प्राथमिकता है और ट्रेड फ्लो में बाधा कम करना. तरीका कोऑर्डिनेटेड और मददगार रहेगा, खासकर एक्सपोर्टरों की सुरक्षा पर ध्यान, विशेष रूप से एमएसएमई पर, जबकि जरूरी आयात प्रभावित न हों. सभी ने सहमति जताई कि रीयल-टाइम कोऑर्डिनेशन रहेगा, रूट, शिपिंग कैपेसिटी और इक्विपमेंट की उपलब्धता पर नजर रखी जाएगी. इसके अलावा कुछ सेक्टर जैसे पेरिशेबल और हाई-वैल्यू मैन्युफैक्चर्ड एक्सपोर्ट के लिए सपोर्ट मैकेनिज्म पर भी बात हुई. मीटिंग में पोर्ट फैसिलिटेशन मजबूत करने और कार्गो कंजेशन रोकने पर जोर दिया गया. सरकार ने संकेत दिया कि डिसरप्शन के दौरान एक्सपोर्ट ऑथराइजेशन में प्रोसीजरल फ्लेक्सिबिलिटी लाई जा सकती है, कस्टम्स के साथ क्लियरेंस कोऑर्डिनेट किया जाएगा और फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन से एक्सपोर्टरों को सपोर्ट मिलेगा. इंटर-मिनिस्टीरियल कोऑर्डिनेशन भी जारी रहेगा.

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