जेनरल ऑटोमिक्स के ग्लोबल सीईओ विवेक लाल ने द इकनॉमिक टाइम्स को दिए इंटरव्यू में बताया कि MQ-9B-AEW दुनिया का पहला ऐसा हाई-एल्टीट्यूड, लॉन्ग-एंड्योरेंस ड्रोन होगा, जिसमें अर्ली वार्निंग रडार लगाया जाएगा. अब तक यह काम बड़े और मानव-चालित AWACS विमान करते रहे हैं, लेकिन अब बिना पायलट का यह ड्रोन वही जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार है.
MQ-9B ड्रोन में क्या है खूबी?
करीब 50,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरने और 30 घंटे से ज्यादा हवा में टिके रहने की क्षमता के कारण MQ-9B बेहद खास है. इसकी रफ्तार करीब 480 KMpH बताया जाता है. यह स्पीड और रेंज ऐसी है कि यह एक घंटे के भीतर दिल्ली से लाहौर जैसे संवेदनशील इलाकों तक पहुंच सकता है और रास्ते भर दुश्मन के विमानों, ड्रोन और मिसाइल खतरों पर नजर रख सकता है. AEW सिस्टम इसे एक उड़ता हुआ रडार स्टेशन बना देता है, जो रियल-टाइम डेटा सीधे कमांड सेंटर तक भेजता है.
विवेक लाल के मुताबिक, आधुनिक युद्ध में जीत का दारोमदार स्पीड, इंटीग्रेशन और साफ कमांड सिस्टम पर होता है. ऐसे में ड्रोन प्लेटफॉर्म फैसले लेने की प्रक्रिया को तेज करते हैं और दुश्मन के लिए अपनी गतिविधियां छिपाना मुश्किल बना देते हैं. हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ड्रोन अकेले निर्णायक हथियार नहीं होते, बल्कि पूरे नेटवर्क और लेयर्ड डिफेंस सिस्टम का अहम हिस्सा होते हैं.
भारत के लिए कैसे गैमचेंजर बनेगा यह ड्रोन?
भारत के लिए MQ-9B इसलिए भी अहम है, क्योंकि देश पहले ही करीब 3 अरब डॉलर की डील के तहत 31 MQ-9B ड्रोन खरीदने का करार कर चुका है, जिन्हें थलसेना, नौसेना और वायुसेना तीनों इस्तेमाल करेंगी. MQ-9B SeaGuardian और SkyGuardian जैसे वर्जन समुद्र और जमीन के विशाल इलाकों पर लंबे समय तक निगरानी रखने में सक्षम हैं. आने वाला AEW वर्जन इसी प्लेटफॉर्म पर अर्ली वार्निंग रडार जोड़कर इसे एक उड़ता हुआ सर्विलांस और कमांड नोड बना देगा.
समुद्री मोर्चे पर भी यह ड्रोन खास भूमिका निभा सकता है. इस ड्रोन के समुद्री वर्जन में सोनाबॉय छोड़ने की क्षमता है, जिससे पनडुब्बियों की निगरानी कम लागत में संभव होती है. इसकी नेटवर्क आधारित युद्ध क्षमता इसे जहाजों, विमानों और जमीनी यूनिट्स के साथ जोड़कर एक साझा तस्वीर तैयार करने में मदद करती है.
पूरा ड्रोन इकोसिस्टम खड़ा करने का मौका
हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि MQ-9 पूरी तरह अभेद्य नहीं है. इसकी गति फाइटर जेट्स से कम है और यूक्रेन- यमन जैसे संघर्ष क्षेत्रों में ऐसे ड्रोन गिराए जा चुके हैं. एयर डिफेंस मिसाइलें, इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर और रडार जैमिंग इसके खिलाफ असरदार साबित हो सकती हैं.
विवेक लाल का कहना है कि भारत के लिए मौका सिर्फ ड्रोन खरीदने का नहीं, बल्कि एक पूरा ड्रोन इकोसिस्टम खड़ा करने का है, जिसमें कंपोनेंट्स, पेलोड इंटीग्रेशन, सॉफ्टवेयर, ट्रेनिंग और मेंटेनेंस शामिल हों. इसी दिशा में लार्सेन एंड टुब्रो के साथ भारत में UAV कंपोनेंट निर्माण की साझेदारी भी अहम मानी जा रही है.
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि अगर MQ-9B का AEW वर्जन भविष्य में भारतीय बेड़े में शामिल होता है, तो यह हिंद महासागर से लेकर उत्तर और पश्चिमी सीमाओं तक भारत की आसमानी निगरानी और त्वरित प्रतिक्रिया क्षमता को बिल्कुल नई ऊंचाई पर पहुंचा सकता है और यही वजह है कि इसे भारत की ‘आसमान में उड़ती नई ताकत’ कहा जा रहा है.
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