अब लोग भूलना भूल जाएंगे, क्योंकि अल्जाइमर अब घातक नहीं होगा। भारतीय वैज्ञानिकों ने एक ऐसी आधुनिक खोज की है, जिससे बीमारी को पकड़ने के साथ ही उसका इलाज भी एक बार में करना संभव होगा। वैज्ञानिकों ने एक नई प्रोब (जांच तकनीक) विकसित की है, जो न केवल बीमारी का जल्दी पता लगा सकती है, बल्कि उसके इलाज में भी मदद कर सकती है।
यह शोध एम्स के डॉ. सरोज कुमार, आईआईटी (बीएचयू) वाराणसी के डॉ. ज्ञान प्रकाश मोदी, एनआईआई की डॉ. सारिका गुप्ता और अन्य संस्थानों के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया है। अध्ययन जर्नल नेचर कम्युनिकेशंस में छपा है। वैज्ञानिकों ने आई-43 नाम की एक खास प्रोब विकसित की है, जो अल्जाइमर के दो प्रमुख कारणों अमाइलॉइड-बीटा प्रोटीन और कोलाइनेस्टरेज एंजाइम पर एक साथ काम करती है।
यह प्रोब दिमाग में जमा अमाइलॉइड-बीटा प्रोटीन से जुड़कर खास एनआईआर फ्लोरेसेंस रोशनी के जरिए चमकने लगती है, जिससे स्कैन में जहरीले प्लाक साफ दिखाई देते हैं और बीमारी का शुरुआती पता लगाना आसान हो जाता है। साथ ही, यह कोलाइनेस्टरेज एंजाइम की गतिविधि को रोकती है, जिससे याददाश्त में सुधार की संभावना बढ़ती है। चूहों पर किए गए परीक्षण में इसके सकारात्मक नतीजे सामने आए हैं। यह तकनीक अपेक्षाकृत सस्ती है, इसमें महंगी या रेडियोएक्टिव जांच की जरूरत नहीं पड़ती और यह स्पष्ट इमेज देती है। हालांकि, वैज्ञानिकों का कहना है कि इसे और प्रभावी बनाने के लिए इसकी पानी में घुलनशीलता और स्थिरता पर अभी और काम किया जाएगा।
यह मस्तिष्क का रोग है, जहां एमाइलॉयड-बीटा प्रोटीन जमा होकर प्लाक बनाती है, जो नर्व सेल्स को नष्ट करती है। साथ ही, कोलाइनेस्टरेज एंजाइम (सीएचई) असंतुलित हो जाता है, जो एसिटाइलकोलाइन नामक रसायन को तोड़ता है, जो याददाश्त का मुख्य स्त्रोत है। नतीजतन भूलने की बीमारी, भटकना और रोजमर्रा की मुश्किलों को झेलना पड़ता है। दुनिया में 5 करोड़ से ज्यादा लोग इससे पीड़ित हैं और भारत में भी इसके लाखों मरीज है। अब तक जांच के लिए पीईटी स्कैन या एमआरआई जैसे महंगे तरीकों से ही इलाज सीमित था। लेकिन नई तकनीक से इलाज तेजी और आसानी से संभव हो पाएगा।
मौजूदा दवाएं केवल लक्षण कम करने में कारगर
विशेषज्ञों के अनुसार, अल्जाइमर डिमेंशिया के लगभग 70 से 80 प्रतिशत मामलों का कारण है। मौजूदा दवाएं केवल लक्षण कम करती हैं, लेकिन यह नई प्रोब जांच और इलाज दोनों में मदद कर सकती है। ऐसे इलाज को थेरानोस्टिक कहा जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार, अगर आगे के परीक्षण सफल रहते हैं, तो यह तकनीक अल्जाइमर के शुरुआती चरण में ही बीमारी पकड़ने में मदद करेगी।
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