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कर्नाटक सरकार 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए मोबाइल और सोशल मीडिया बैन करने पर विचार कर रही है. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने ऑस्ट्रेलिया और यूरोपीय देशों की तर्ज पर इसे लागू करने के लिए कुलपतियों से राय मांगी है. इसका मुख्य उद्देश्य बच्चों को रील की लत और साइबर खतरों से बचाना है. यदि यह प्रस्ताव पास होता है तो कर्नाटक डिजिटल कर्फ्यू लगाने वाला देश का पहला राज्य बनेगा.
कर्नाटक सरकार विचार कर रही है. (AI Image)
बेंगलुरु: कर्नाटक सरकार बच्चों को सोशल मीडिया की लत और साइबर खतरों से बचाने के लिए 16 साल से कम उम्र के नाबालिगों पर मोबाइल फोन के उपयोग को प्रतिबंधित करने का ऐतिहासिक फैसला ले सकती है. मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने विश्वविद्यालयों के कुलपतियों के साथ उच्च स्तरीय बैठक में इस प्रस्ताव पर गंभीर चर्चा की. सरकार का तर्क है कि जिस तरह ऑस्ट्रेलिया और कई यूरोपीय देशों ने डिजिटल एडिक्शन को रोकने के लिए सख्त कानून बनाए हैं, उसी तर्ज पर कर्नाटक में भी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है. इस फैसले के लागू होने के बाद कर्नाटक, देश का ऐसा पहला राज्य बन सकता है जहां नाबालिगों के लिए डिजिटल स्क्रीन टाइम पर कानूनी लगाम होगी.
क्या भारत में सफल होगा ऑस्ट्रेलिया वाला ‘नो मोबाइल’ मॉडल?
कर्नाटक सरकार जिस बदलाव की बात कर रही है, उसकी नींव वैश्विक स्तर पर बढ़ रहे ‘डिजिटल प्रोटेक्शन’ कानूनों में छिपी है. आइए समझते हैं कि ऑस्ट्रेलिया का मॉडल क्या है और भारत में यह कितना व्यावहारिक है:
1. क्या है ऑस्ट्रेलिया का सोशल मीडिया बैन कानून?
हाल ही में ऑस्ट्रेलिया ने दुनिया का सबसे सख्त कानून पारित किया है, जिसके तहत 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स (जैसे Instagram, TikTok, Facebook) का इस्तेमाल पूरी तरह प्रतिबंधित है. वहां की सरकार ने कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाने का प्रावधान किया है यदि वे उम्र की पुष्टि (Age Verification) करने में विफल रहती हैं.
2. भारत में डिजिटल कर्फ्यू लागू करना कितना चुनौतीपूर्ण?
भारत में मोबाइल फोन केवल मनोरंजन नहीं बल्कि शिक्षा का भी मुख्य साधन बन चुका है. ग्रामीण इलाकों में ऑनलाइन क्लास और होमवर्क के लिए बच्चे माता-पिता के फोन पर निर्भर हैं. ऐसे में पूर्ण प्रतिबंध के बजाय ग्रेडेड रिस्ट्रिक्शन (सीमित उपयोग) की संभावना अधिक है.
3. क्या कंपनियां साथ देंगी?
ऑस्ट्रेलियाई मॉडल की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वहां जिम्मेदारी कंपनियों पर डाली गई है. भारत में भी अगर यह नियम आता है तो टेक कंपनियों को अपनी एल्गोरिदम बदलनी होगी ताकि 16 साल से कम उम्र के बच्चों को कंटेंट एक्सेस न मिले.
4. सीएम सिद्धारमैया ने ड्रग्स का एंगल क्यों जोड़ा?
विशेषज्ञों का मानना है कि सोशल मीडिया पर मिलने वाली गुमनाम पहचान बच्चों को नशीली दवाओं के तस्करों के संपर्क में लाती है. सरकार इसी ऑनलाइन-टू-ऑफलाइन खतरे को खत्म करना चाहती है.
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पत्रकारिता में 14 साल से भी लंबे वक्त से सक्रिय हूं. साल 2010 में दैनिक भास्कर अखबार से करियर की शुरुआत करने के बाद नई दुनिया, दैनिक जागरण और पंजाब केसरी में एक रिपोर्टर के तौर पर काम किया. इस दौरान क्राइम और…और पढ़ें
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