सोशल मीडिया पर यह वीडियो तेजी से वायरल होने लगा और लोग सवाल उठाने लगे. सवाल उठना लाजमी है क्या नए चेहरे, नई पीढ़ी और नए दौर के दावों के बावजूद बसपा में कुछ नहीं बदला? क्या बीएसपी के अतीत, वर्तमान और भविष्य का सियासी समीकरण?
कांशीराम के संघर्ष से आकाश आनंद के भव्य मुकुट तक
बहुजन समाज पार्टी की नींव कांशीराम ने एक सांस्कृतिक और सामाजिक परिवर्तन के आंदोलन के रूप में रखी थी. उनका उद्देश्य शोषित, वंचित और दलित समाज को राजनीतिक शक्ति देना था. शुरुआती दिनों में बीएसपी का चुनावी प्रचार बेहद साधारण और जमीनी स्तर का होता था. लेकिन 1990 और 2000 के दशक में जब मायावती उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं, तो पार्टी का स्वरूप बदलने लगा.
मायावती से आकाश आनंद तक
नोटों की गद्दी से सोने की मुकुट तक
विपक्षी दलों खासकर काग्रेस, बीजेपी और सपा तब इसे दलित राजनीति के नाम पर राजा-महाराजाओं वाली सामंती मानसिकता बोलते नहीं थकते. इन पार्टियों ने इसे धनबल का प्रदर्शन करार दिया था. हालांकि, मायावती और पार्टी ने हमेशा इसका बचाव करते हुए कहा कि यह बहुजन समाज का अपने मसीहा के प्रति स्वाभिमान और समर्पण का प्रतीक है, जिसे ‘मनुवादी पार्टी और लोग’ स्वीकार नहीं कर रहे हैं.
नए लीडर आकाश आनंद में भी पुरानी कार्यशैली?
मायावती ने जब अपने भतीजे आकाश आनंद को अपना राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया और पार्टी की कमान सौंपी, तो माना जा रहा था कि बीएसपी अब एक ‘न्यू एज’ पार्टी बनेगी. डिजिटल मीडिया का इस्तेमाल, युवाओं को जोड़ना, कैडर आधारित राजनीति और कॉर्पोरेट-स्टाइल वर्किंग की उम्मीद जताई जा रही थी. हाल के समय में आकाश आनंद ने युवाओं के मुद्दे, कानून व्यवस्था और रोजगार पर आक्रामक तेवर भी दिखाए. लेकिन सहारनपुर की घटना ने यह साबित कर दिया कि बसपा का जमीनी कैडर आज भी अपने नेताओं को रिझाने और सम्मानित करने के लिए पुरानी ही शैली पर निर्भर है.
वर्तमान में बीएसपी की चुनौतियां
यूपी चुनाव 2027 से पहले बीएसपी का पारंपरिक ‘जाटव’ वोट बैंक भी सेंध लग चुका है. दलित वोट बैंक बीजेपी और चंद्रशेखर की आजाद समाज पार्टी की ओर खिसकता दिख रहा है. 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बसपा महज 1 सीट पर सिमट गई थी, जबकि 2024 के लोकसभा चुनावों में बीएसपी को एक भी सीट हासिल नहीं हुई. नए युवाओं को पार्टी से जोड़ने के बजाय, स्थानीय नेता अब भी पुराने ‘राजाशाही’ प्रदर्शनों से शीर्ष नेतृत्व को खुश करने में लगे हैं.
क्या सोने का मुकुट दिला पाएगा खोई हुई सियासी जमीन?
सहारनपुर में आकाश आनंद को सोने का मुकुट पहनाया जाना केवल एक स्वागत समारोह नहीं था, यह 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए बीएसपी की शुरुआती रणनीति का हिस्सा है. गैरयादव ओबीसी जैसे सैनी समाज को साधना, बीएसपी की एक रणनीति है. क्योंकि यह समाज बीते कई सालों से बीजेपी की ओऱ खिसक गई है. ऐसे में सोने का मुकुट पहनाकर सैनी समाज बसपा के करीब तो नहीं आ रही है?
राजनीति विज्ञान के जानकारों का मानना है कि आज का मतदाता बदल चुका है. आज का युवा और दलित मतदाता अब केवल प्रतीकात्मक राजनीति या सोने के मुकुटों से प्रभावित नहीं होता. उसे शिक्षा, रोजगार, सामाजिक सुरक्षा और सीधी भागीदारी चाहिए. नगीना से सांसद बने चंद्रशेखर आजाद जैसे युवा नेता सड़कों पर उतरकर आंदोलन की राजनीति कर रहे हैं. ऐसे में आकाश आनंद की ‘मुकुट वाली राजनीति’ उनके जमीनी संघर्ष के सामने कैसी दिखेगी?
यदि आकाश आनंद और बीएसपी को 2027 में अपनी खोई हुई साख वापस पानी है, तो उन्हें भव्य आयोजनों और मुकुटों के बजाय बूथ स्तर के संगठन और जनता के बुनियादी मुद्दों पर ध्यान देना होगा. सहारनपुर से आई सोने के मुकुट की तस्वीर यह बयां करती है कि बीएसपी के भीतर नेतृत्व भले ही बदल रहा हो, लेकिन पार्टी का ‘सिंबल ऑफ पावर’ सत्ता और सम्मान का प्रतीक आज भी वही है जो दो दशक पहले था. मायावती के दौर से चला आ रहा यह उपहार-संस्कृति का सिलसिला आकाश आनंद के दौर में भी जारी है. अब देखना यह होगा कि 2027 के चुनावी समर में यह ‘सोने का मुकुट’ बीएसपी के लिए स्वाभिमान का ताज बनता है या फिर विपक्ष के हाथों में एक नया सियासी हथियार
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