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होमताजा खबरदेशनागपुर एमएलसी चुनाव में कैसे हार गई BJP? 5 कारण में समझिए पूरा खेल

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Nagpur MLC Election Analysis: नागपुर स्नातक एमएलसी चुनाव में कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने बीजेपी के सुधाकर कोहले को 3,271 वोट से हरा दिया है. यह दूसरी बार हुआ है जब नागपुर में अभिजीत वंजारी की जीत हुई है. इस बार के चुनाव में पहली गिनती में बीजेपी आगे थी, लेकिन दूसरी पसंद के मतों के मामले में अभिजीत वंजारी ने बाजी मार ली. इसके बाद बीजेपी के हारने पर तमाम वजहें बताई जा रही हैं,जिसमें एक वजह 15,106 अवैध वोटों का अवैध होना भी माना जा रहा है. इसके साथ ही निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले ने भी जबरदस्त वोट लेकर मामले को बिगाड़ दिया. जो इस बार निर्दलीय ही चुनाव मैदान में थे. तो आइए जानते हैं वो पांच संभावित कारण जिसकी वजह से नागपुर एमएलसी चुनाव में हार गई BJP.

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नागपुर एमएलसी चुनाव में कैसे हार गई BJP? 5 कारण में समझिए पूरा खेलZoom

नागपुर एमएलसी चुनाव में कैसे पलटी बाजी? पहली गिनती में आगे थी बीजेपी, फिर 15,106 अवैध वोटों के बीच कांग्रेस ने कैसे मारी बाजी.

Maharashtra MLC Election Result: महाराष्ट्र के नागपुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के एमएलसी चुनाव में कांग्रेस जीत गई है. जिसकी खूब चर्चा हो रही है. यहां से कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज की है. उन्होंने बीजेपी के सुधाकर कोहले को हराया है. शुरुआती गिनती में कोहले आगे चल रहे थे. इसके बावजूद वह चुनाव नहीं जीत सके. तो आइए जानते हैं कि आखिर क्या वजह रही कि नागपुर में बीजेपी हार गई, देखते हैं पांच संभावित कारण.

1.निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले  की भूमिका

इस चुनाव में सोशल मीडिया पर बेहद लोकप्रिय शिक्षक और निर्दलीय उम्मीदवार नितेश कराले (कराले मास्तर) भाजपा की हार में सबसे बड़े ‘एक्स-फैक्टर’ (X-Factor) साबित हुए. कराले ने युवाओं और बेरोजगार स्नातकों के मुद्दों को उठाकर बड़ी संख्या में वोट हासिल किए. सबसे दिलचस्प बात यह रही कि अभिजीत वंजारी ने उन्हें अपना “छोटा भाई” और दोस्त बताया और इसे एक सोची-समझी चुनावी रणनीति का हिस्सा माना. जब दूसरी वरीयता (Second Preference) के वोटों की गिनती हुई तो कराले को मिले वोटों का एक बहुत बड़ा हिस्सा सीधे कांग्रेस के अभिजीत वंजारी के खाते में ट्रांसफर हो गया, जिसने भाजपा उम्मीदवार सुधाकर कोहले की बढ़त को खत्म कर दिया.

2.भाजपा के भीतर आंतरिक कलह और बगावत

नागपुर को संघ (RSS) और भाजपा का अभेद्य किला माना जाता है, लेकिन इस बार पार्टी के भीतर आंतरिक गुटबाजी और बगावत ने भाजपा का गणित बिगाड़ दिया. टिकट वितरण को लेकर स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं में अंदरूनी नाराजगी थी. सुधाकर कोहले को उम्मीदवार बनाए जाने के बाद भाजपा का पारंपरिक कैडर उस आक्रामकता और एकजुटता के साथ जमीन पर नहीं उतरा. जिसके लिए बीजेपी जानी जाती है. पार्टी के भीतर असंतुष्टों और बागी रुख के कारण अंदरखाने वोटों का बिखराव हुआ, जिसका सीधा नुकसान पार्टी को भुगतना पड़ा.

3.अभिजीत वंजारी की व्यक्तिगत पकड़ और ‘सिंक’ समीकरण

कांग्रेस के अभिजीत वंजारी ने इस निर्वाचन क्षेत्र में पिछले 6 सालों से लगातार जमीनी काम किया था और उनकी स्नातकों के बीच गहरी व्यक्तिगत पकड़ थी. उन्होंने मतदाताओं के साथ एक ऐसा ‘सिंक’ (सामंजस्य) बिठाया, जिसे बीजेपी भांप नहीं पाई. वंजारी की टीम ने स्नातक मतदाताओं के पंजीकरण (Voter Registration) से लेकर उन्हें पोलिंग बूथ तक लाने तक की माइक्रो-प्लानिंग की थी. उनका यह व्यक्तिगत जनसंपर्क बीजेपी के बड़े नेताओं की रैलियों और संगठनात्मक दावों पर भारी पड़ गया.

4.बड़ी संख्या में अवैध वोट (15,000+ अमान्य मत)

तकनीकी रूप से यह बीजेपी के लिए सबसे बड़ा झटका था. नागपुर संभाग में 15,000 से अधिक वोट अवैध (Invalid) घोषित किए गए. स्नातक चुनाव में बैलेट पेपर पर वरीयता अंक (1, 2, 3) लिखने होते हैं. खुद बीजेपी उम्मीदवार सुधाकर कोहले ने हार के बाद निराशा जताते हुए दावा किया कि “इन खारिज हुए वोटों में से लगभग 9,000 वोट हमारे (बीजेपी के) थे और वोटों के अमान्य होने से लोकतंत्र का मजाक बना है.” बीजेपी अपने मतदाताओं को बैलेट पेपर पर सही ढंग से वोट डालने की ट्रेनिंग देने में पूरी तरह चूक गई. जिससे जीत के करीब पहुंचते-पहुंचते उनकी गणित बिगड़ गई.

5.सत्ता विरोधी रुझान और महाविकास आघाडी (MVA) का लामबंद होना

इस सीट पर लंबे समय से बीजेपी का कब्जा रहने के कारण शिक्षित युवाओं और मध्यमवर्ग में एक स्वाभाविक सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) थी. रोजगार की कमी और स्थानीय मुद्दों को लेकर स्नातकों में नाराजगी थी. इस नाराजगी को भांपकर महाविकास आघाडी (MVA – कांग्रेस, राकांपा शरद पवार) ने बेहद मजबूत और लामबंद (Unified) तरीके से चुनाव लड़ा. कांग्रेस उम्मीदवार को सहयोगी दलों के कैडर का पूरा जमीनी समर्थन मिला. जिससे विपक्ष का वोट बैंक कहीं नहीं बिखरा और वे सामूहिक रूप से भाजपा के गढ़ में सेंध लगाने में सफल रहे.

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