Image Slider

Last Updated:

भारत ही नहीं बल्कि चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान को भी अमेरिका के नए फैसले से राहत मिली है. राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने की योजना फिलहाल रोक दी है. यह फैसला ऐसे समय आया है जब इसकी समयसीमा 18 अक्टूबर को खत्म होने वाली थी. ट्रंप ने छूट को अमेरिका के राष्ट्रीय हित में बताया है. मिड टर्म चुनाव से पहले महंगाई और ऊर्जा कीमतों का दबाव इस फैसले के पीछे संभावित कारण माने जा रहे हैं. हालांकि टैरिफ स्थायी रूप से रद्द नहीं हुए हैं और भविष्य में दोबारा लगाए जा सकते हैं.

भारत ही नहीं 5 और देशों को राहत, 100% टैरिफ फैसले से क्यों पलटे ट्रंप?Zoom

टैरिफ पर भारत समेत पांच देशों को राहत क्यों मिली और अमेरिका ने क्यों लिया यू-टर्न. (फाइल फोटो)

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 फीसदी टैरिफ लगाने की योजना फिलहाल रोक दी है. इससे भारत समेत चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान को बड़ी राहत मिली है. कुछ समय पहले तक इन देशों पर भारी टैरिफ लगने का खतरा मंडरा रहा था. ट्रंप ने इस फैसले को अमेरिका के राष्ट्रीय हित में बताया है. लेकिन सवाल उठता है कि आखिर आखिरी वक्त पर ऐसा क्या हुआ कि अमेरिका को अपने ही फैसले से पीछे हटना पड़ा? इसके पीछे सिर्फ कूटनीति नहीं बल्कि घरेलू राजनीति और ऊर्जा बाजार की चुनौतियां भी अहम मानी जा रही हैं. अमेरिका में मध्यावधि चुनाव करीब हैं. ऐसे में महंगाई और पेट्रोल-डीजल की कीमतें भी सरकार के लिए बड़ा मुद्दा बन सकती हैं.

ट्रंप ने पिछले महीने रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों पर सख्ती बढ़ाने वाले कानून पर हस्ताक्षर किए थे. इसमें रूस के बड़े तेल खरीदारों से आने वाले सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का प्रावधान था. इसकी समयसीमा 18 अक्टूबर को खत्म होने वाली थी. लेकिन शुक्रवार देर रात जारी कार्यकारी आदेश में ट्रंप ने फिलहाल इन टैरिफ और संबंधित प्रतिबंधों को लागू करने से छूट दे दी. उन्होंने कांग्रेस को बताया कि मौजूदा समय में यह छूट अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है. हालांकि राहत को स्थायी फैसला नहीं माना जा सकता. ट्रंप बाद में परिस्थितियों के अनुसार फिर से टैरिफ लगाने का विकल्प अपने पास रख सकते हैं. यही वजह है कि भारत को राहत तो मिली है लेकिन व्यापारिक अनिश्चितता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है.

ट्रंप ने किस कानून के तहत टैरिफ लगाने की तैयारी की थी?

  • इस विवाद की जड़ रूस और ईरान से जुड़े प्रतिबंधों वाला कानून है जिसे ‘लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026’ नाम से बताया गया है. इसका मकसद रूस को यूक्रेन के खिलाफ युद्ध जारी रखने के लिए मिलने वाले आर्थिक संसाधनों पर दबाव बढ़ाना था. कानून में रूसी अधिकारियों, बैंकों और ऊर्जा कंपनियों पर प्रतिबंध लगाने के साथ उन विदेशी देशों पर भी कार्रवाई का प्रावधान था जो रूस से तेल खरीदते हैं.
  • इसके तहत भारत, चीन, स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान जैसे देशों से आने वाले सामान पर 100 फीसदी तक टैरिफ लगाने का रास्ता खुलता. इसके अलावा रूस के ऊर्जा उत्पादों के अमेरिकी आयात पर 500 फीसदी तक टैरिफ और रूसी संस्थाओं के खिलाफ प्रतिबंधों का प्रावधान भी बताया गया था. हालांकि कार्यकारी आदेश के बाद ये उपाय फिलहाल लागू नहीं किए जा रहे हैं. इसका अर्थ यह नहीं कि पूरा कानून रद्द हो गया है.

आखिर अमेरिका ने आखिरी वक्त पर क्यों लिया यू-टर्न?

  1. पहली वजह: अमेरिका में मिड टर्म चुनाव नजदीक हैं. ऐसे समय में ईंधन की कीमतें और महंगाई आम मतदाताओं के लिए अहम मुद्दे बन सकती हैं. यदि रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर भारी टैरिफ लगाए जाते तो वैश्विक व्यापार और ऊर्जा बाजार पर उसका असर पड़ सकता था. इससे कीमतें बढ़ने का जोखिम भी रहता. इसलिए घरेलू आर्थिक दबाव ट्रंप प्रशासन के फैसले को प्रभावित करने वाला एक कारण है.
  2. दूसरी वजह: रूस दुनिया के बड़े तेल सही ऊर्जा उत्पादकों में शामिल है. उसके तेल के प्रवाह पर बहुत ज्यादा रोक लगाने से वैश्विक आपूर्ति और कीमतों पर दबाव पड़ सकता है. अमेरिका के लिए भी महंगी ऊर्जा आर्थिक चुनौती बन सकती है. ऐसे में रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर टैरिफ लगाने की योजना को फिलहाल रोकना बाजार में अनिश्चितता कम करने की कोशिश के तौर पर देखा जा सकता है. हालांकि ट्रंप के आदेश में अमेरिका द्वारा रूस से तेल खरीदने की इच्छा को वजह नहीं बताया गया है. आधिकारिक तौर पर फैसला राष्ट्रीय हित के आधार पर लिया गया है.
  3. तीसरी वजह: टैरिफ को फिलहाल टालने से अमेरिका के पास आगे की बातचीत और रणनीति के लिए विकल्प खुले रहते हैं. यदि परिस्थितियां बदलती हैं तो ट्रंप प्रशासन इन शुल्कों को फिर लागू करने पर विचार कर सकता है. यानी यह कदम रूस के खिलाफ आर्थिक दबाव की नीति को पूरी तरह छोड़ने के बजाय उसे कुछ समय के लिए रोकने जैसा है.

भारत को कितनी बड़ी राहत मिली?

भारत के लिए यह फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस उसके प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल है. यदि भारतीय सामान पर 100 फीसदी टैरिफ लगा दिया जाता तो अमेरिकी बाजार में भारतीय उत्पादों की कीमत बढ़ सकती थी. इससे भारत के निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने और अमेरिकी खरीदारों की मांग घटने का खतरा था.

भारत और अमेरिका के व्यापारिक रिश्तों में पिछले साल रूसी तेल की खरीद को लेकर तनाव बढ़ा था. उस समय ट्रंप प्रशासन ने भारत पर सामान्य टैरिफ के अलावा रूसी कच्चे तेल की खरीद से जुड़ा अतिरिक्त 25 फीसदी टैरिफ लगाया था. हालांकि फरवरी 2026 में अतिरिक्त शुल्क हटा दिया गया और पारस्परिक टैरिफ को घटाकर 18 फीसदी किया गया. ऐसे में नया 100 फीसदी टैरिफ लागू होना व्यापार संबंधों के लिए एक और बड़ी चुनौती बन सकता था. फिलहाल इस आशंका से राहत मिली है.

About the Author

authorimg

सुमित कुमारSenior Sub Editor

सुमित कुमार हिंदी पत्रकारिता का एक उभरता और सक्रिय नाम हैं. वर्तमान में वे News18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे हैं और सेंट्रल डेस्क टीम का हिस्सा हैं. पिछले चार साल से वे Network18और पढ़ें

———-

🔸 स्थानीय सूचनाओं के लिए यहाँ क्लिक कर हमारा यह व्हाट्सएप चैनल जॉइन करें।

 

Disclaimer: This story is auto-aggregated by a computer program and has not been created or edited by Ghaziabad365 || मूल प्रकाशक ||