Image Slider

एक्सप्लेनर | नई दिल्ली: Pakistani Armed Forces का गठन, उसके हथियारों की रुपरेखा और युद्ध लड़ने की रणनीतियां (Doctrines) ऐतिहासिक रूप से भारत के साथ एक आमने-सामने के युद्ध (Conventional Warfare) को ध्यान में रखकर तैयार की गई थीं. स्टीफन पी. कोहेन की पुस्तक ‘द पाकिस्तान आर्मी’ में वर्णित ‘इंडिया-सेंट्रिक’ के अनुसार, पाकिस्तानी सेना ने अपनी कोर गठन, बख्तरबंद डिवीजन और तोपखाने केवल मैदानी और रेगिस्तानी मोर्चों पर दुश्मन को रोकने के लिए विकसित किए. जब इसी भारी युद्ध मशीन को खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के कठिन पहाड़ी इलाकों में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) के खिलाफ उतारा जाता है, तो उसकी Traditional मारक क्षमता काम नहीं आती. अनिमित युद्ध (Irregular Warfare) में भारी तोपें और जेट विमान केवल बुनियादी ढांचे का विनाश करते हैं, जबकि छोटे विद्रोही समूह स्थानीय आबादी में घुल-मिलकर सेना की इस तकनीकी बढ़त को बेअसर कर देते हैं.

पाकिस्तान की सबसे बड़ी वैचारिक और रणनीतिक भूल उसकी ‘Strategic Depth’ की विदेश नीति रही, जिसे अफगानिस्तान और भारत के संदर्भ में दशकों तक लागू किया गया. वरिष्ठ पत्रकार जाहिद हुसैन अपनी पुस्तक ‘फ्रंटलाइन पाकिस्तान’ में रेखांकित करते हैं कि कैसे पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी (ISI) ने अफगान तालिबान और विभिन्न उग्रवादी गुटों को राज्य की ‘रणनीतिक संपत्ति’ (Strategic Assets) के रूप में पाला-पोसा. 2001 के बाद जब अमेरिका ने अफगानिस्तान में युद्ध शुरू किया, तो वही वैचारिक नेटवर्क TTP के रूप में पाकिस्तानी राज्य के ही खिलाफ खड़ा हो गया. जिन चरमपंथी तत्वों को कभी सीमा पार प्रभाव बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया गया था, उन्होंने देश के भीतर ही अपनी Parallel सत्ता स्थापित कर ली, जिससे सेना अब उसी ढाँचे के खिलाफ असहाय खड़ी है, जिसे उसने खुद सुरक्षा कवच मानकर खड़ा किया था.

विश्व भर के सैन्य इतिहासकारों, जैसे डेविड गैलुला के काउंटर-इंसर्जेंसी सिद्धांत के अनुसार, किसी भी आंतरिक विद्रोह को कुचलने के लिए 80% राजनीतिक-सूचनात्मक प्रयास और केवल 20% सैन्य बल की आवश्यकता होती है. इसके विपरीत, पाकिस्तानी सेना का नज़रिया हमेशा ‘कठोर सैन्य बल’ (Hard Military Power) तक सीमित रहा है. ऑपरेशन राह-ए-निजात और ज़र्ब-ए-अज़ब जैसे अभियानों के माध्यम से सेना ने इलाकों को खाली (Clear and Hold) तो कराया, लेकिन नागरिक प्रशासन और खुफिया तंत्र (HUMINT – Human Intelligence) के अभाव में वे जीत स्थायी नहीं रह सकीं. स्थानीय मुखबिरों और मजबूत सिविल पुलिसिंग के बिना उग्रवादी नेटवर्क फिर से संगठित हो जाते हैं, जिससे सैन्य विजय अल्पकालिक बनकर रह जाती है और सुरक्षा बल बार-बार उसी चक्र में फंसते चले जाते हैं.

आयशा सिद्दीका की चर्चित पुस्तक ‘मिलिट्री इंक: इनसाइड पाकिस्तान्स मिलिट्री इकॉनमी’ पाकिस्तान सेना के आंतरिक संकट का एक बड़ा कारण उजागर करती है. सेना केवल देश की रक्षक नहीं है, बल्कि ‘फौजी फाउंडेशन’ और ‘आर्मी वेलफेयर ट्रस्ट’ जैसी संस्थाओं के जरिए देश के कॉर्पोरेट, रियल एस्टेट, बैंकिंग और सीमेंट उद्योगों पर उसका विशाल व्यावसायिक अधिकार (Milbus) है. जब किसी सैन्य संस्थान की सर्वोच्च कमान का ध्यान पेशेवर युद्ध-कौशल से हटकर अरबों डॉलर के व्यावसायिक साम्राज्यों को चलाने, राजनीतिक सत्ता के संतुलन को नियंत्रित करने और नौकरशाही को संचालित करने में बंट जाता है, तो उसकी वास्तविक युद्ध तत्परता और आंतरिक सुरक्षा मोर्चे की Strategic Concentration गंभीर रूप से प्रभावित होता है.

बलूचिस्तान और उत्तर-पश्चिमी कबायली इलाकों (पूर्व FATA) में केवल हथियारों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह केंद्र सरकार की राजनीतिक उपेक्षा और सामाजिक-आर्थिक अधिकारों से छल का परिणाम है. पॉल कॉलिन्स और क्रिस्टोफर क्लेरी जैसे रणनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सेना सुरक्षा अभियान चलाकर विद्रोहियों को पीछे तो धकेल सकती है, लेकिन वह स्थानीय लोगों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व या आर्थिक न्याय नहीं दे सकती. इस्लामाबाद के राजनीतिक तंत्र की असफलता और लोकतांत्रिक संस्थाओं को पंगु बनाने की सैन्य आदत के कारण विद्रोहियों को हमेशा नए रंगरूट मिलते रहते हैं, जिससे एक राजनीतिक समस्या को केवल सैन्य दृष्टिकोण से हल करने की कोशिश लगातार विफल हो रही है.

1965, 1971 या 1999 के कारगिल संघर्ष के दौरान पाकिस्तानी सेना को भारत के खिलाफ एक ‘एकजुट राष्ट्र’ और ‘राष्ट्रीय भय’ (National Fear) का मनोवैज्ञानिक समर्थन हासिल था. परंतु जब सेना बलूचिस्तान के पश्तून, बलूच या स्थानीय नागरिकों पर बल प्रयोग करती है, तो युद्धक्षेत्र का मनोविज्ञान पूरी तरह बदल जाता है. गृहयुद्ध या आंतरिक सैन्य अभियानों में पाकिस्तानी सेना पर मानवाधिकार उल्लंघनों, जबरन गुमशुदगी (Enforced Disappearances) और अपने ही नागरिकों खासकर बलूचों को निशाना बनाने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं. इससे सेना का नैतिक आधार कमजोर पड़ता है, जनता के बीच उसका जनाधार खत्म होता है, और युद्ध की कोई स्पष्ट परिभाषा या सर्वसम्मति न होने के कारण सैनिकों का मनोबल भी आंतरिक रूप से प्रभावित होता है.

एक प्रभावी राज्य के सिस्टम में उग्रवाद से निपटने की पहली सीढ़ी “नागरिक पुलिस, स्थानीय खुफिया तंत्र, अभियोजन (Prosecution) और न्यायपालिका” होती है. सी. क्रिस्टीन फेयर अपनी पुस्तक ‘फाइटिंग टू द एंड: द पाकिस्तान आर्मीज वे ऑफ वॉर’ में दर्शाती हैं कि पाकिस्तान में नागरिक संस्थाओं को जानबूझकर कमजोर रखा गया है ताकि सत्ता का केंद्र हमेशा रावलपिंडी (सैन्य मुख्यालय) बना रहे. इसका सबसे बड़ा उदाहरण हाल ही में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में नागरिक अधिकारों के लिए हुए विरोध प्रदर्शनों को दबाने में सेना का इस्तेमाल किया जाना है, और साथ ही अक्टूबर 2026 में केंद्र सरकार द्वारा खैबर पख्तूनख्वा सरकार के अधिग्रहण के बाद वहां आपातकाल और गवर्नर शासन लागू करने के उपरांत उठे व्यापक असंतोष को भी पूरी तरह से सैन्य बल के माध्यम से कुचला जाना है.

जब स्थानीय पुलिस बल और आपराधिक न्याय प्रणाली पूरी तरह ध्वस्त होती है, तो छोटी-मोटी कानून-व्यवस्था बनाए रखने से लेकर बड़े अभियानों तक हर चीज़ के लिए सेना को बुलाना पड़ता है. किसी भी आधुनिक राज्य के लिए सेना को स्थायी रूप से आंतरिक पुलिसिंग में झोंकना उसकी दीर्घकालिक मारक क्षमता को पंगु बना देता है.

सैन्य रणनीति के नज़रिये से, किसी भी उग्रवाद को तब तक पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता जब तक कि विद्रोहियों के पास सीमा पार सुरक्षित ठिकाने (Cross-Border Sanctuaries) मौजूद हों. डूरंड रेखा (पाकिस्तान-अफगानिस्तान सीमा) का दुर्गम और छिद्रित भूगोल TTP के लिए एक रणनीतिक ढाल का काम करता है. अफगान तालिबान के काबुल की सत्ता में आने के बाद, पाकिस्तानी सेना की यह उम्मीद टूट गई कि अफगान सीमा सुरक्षित हो जाएगी. आज TTP उग्रवादी पाकिस्तान के भीतर हमले करके आसानी से अफगानिस्तान के शरण स्थलों में लौट जाते हैं, और सीमा पर बाड़ लगाने (Border Fencing) की सेना की पूरी तकनीक इस अनियंत्रित भौगोलिक वास्तविकता के सामने बेअसर साबित हो रही है.

दोहरे मोर्चों की तकनीकी जटिलता पाकिस्तानी सेना आज केवल एक तरह के दुश्मन से नहीं, बल्कि दो बिल्कुल विपरीत वैचारिक मोर्चों से एक साथ लड़ रही है. एक तरफ खैबर पख्तूनख्वा में TTP का वैचारिक ‘धार्मिक कट्टरपंथ’ है, जो राज्य के संविधान को खत्म कर शरिया व्यवस्था लागू करना चाहता है; वहीं दूसरी तरफ बलूचिस्तान में BLA और BLF का ‘धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद’ (Secular Nationalism) है, जो अपनी ज़मीन, आज़ादी और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण की मांग कर रहा है. सेना का पारंपरिक धार्मिक या राष्ट्रवादी आख्यान इन दोनों मोर्चों पर एक साथ काम नहीं करता. एक ही रणनीति से दो बिल्कुल अलग विचारधाराओं और युद्ध-पद्धतियों वाले शत्रुओं का सामना करना पाकिस्तानी सेना के रणनीतिक ढांचे के लिए एक दुःस्वप्न बन चुका है.

पाकिस्तान की विफलता किसी सैन्य इकाई की हार नहीं, बल्कि ‘समग्र राज्य क्षमता’ (Comprehensive State Capacity) के चरमराने का परिणाम है. इतिहासकार शुजा नवाज़ अपनी पुस्तक ‘क्रॉस्ड स्वॉर्ड्स’ में स्पष्ट करते हैं कि युद्ध केवल बैरक और टैंकों से नहीं जीते जाते, बल्कि वे मजबूत अर्थव्यवस्था, स्थिर राजनीति, सामाजिक सद्भाव और वैध शासन के बल पर जीते जाते हैं.

जब तक पाकिस्तान अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं को भारत-केंद्रित द्वेष और आंतरिक हेरफेर से हटाकर वास्तविक राजनीतिक सुधारों, पुलिस तंत्र के सुदृढ़ीकरण और अपने ही नागरिकों के साथ संवाद की दिशा में नहीं मोड़ता, तब तक दुनिया की कोई भी शक्तिशाली सेना अपने ही घर के भीतर छिपे इस बहुस्तरीय संकट पर निर्णायक जीत हासिल नहीं कर सकती.

———-

🔸 स्थानीय सूचनाओं के लिए यहाँ क्लिक कर हमारा यह व्हाट्सएप चैनल जॉइन करें।

 

Disclaimer: This story is auto-aggregated by a computer program and has not been created or edited by Ghaziabad365 || मूल प्रकाशक ||