आरोप तो वे यह भी लगा चुके हैं कि SIR के क्रम में जान-बूझकर वोटर लिस्ट से लोगों के नाम काटे जा रहे हैं. हालांकि चुनाव आयोग की इस प्रक्रिया को देश की सर्वोच्च अदालत ने भी सही करार दिया है. पर, राहुल गांधी की पार्टी कांग्रेस और उसके सहयोगी कई अन्य विपक्षी दल भी इसे लेकर चुनाव आयोग के खिलाफ सड़क से संसद तक कोहराम मचाते रहे हैं. इस काम में अब आभासी दुनिया की उपज काक्रोच जनता पार्टी (CJP) ने भी जेन Z की ताकत के सहारे मददगार बन कर उभरी है. इन दिनों गैर भाजपा इन ताकतों ने राष्ट्रीय स्तर पर आंदोलन शुरू कर दिया है. वे मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लिए बिना मानने के तैयार नहीं हैं.
राहुल गांधी के तर्क सुनिए
वे आश्चर्य जताते हैं कि ऐसा क्या कारण है कि नरेंद्र मोदी, अमित शाह और भाजपा के साथ ऐसा नहीं होता. वे राज्यों का भी उदाहरण देते हैं. कहते हैं कि हरियाणा, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात में दशकों से सत्ता बदलती रही है, लेकिन अचानक एंटी इनकम्बेंसी गायब हो गई.
दुनिया के दूसरे देश भी उनके उदाहरण की फेहरिस्त में हैं. वे बताते हैं कि दुनिया के किसी भी लोकतंत्र में एंटी इनकम्बेंसी न होने जैसी बात नहीं होती. इसके बावजूद नरेंद्र मोदी के राज में ऐसा न होना उन्हें अबूझ पहेली लगती है. उनकी बातों का लब्बोलुआब यही है कि कोई न कोई तिकड़म जरूर है, जिसकी वजह से भाजपा सरकार के प्रति एंटी इनकम्बेंसी नहीं दिखाई देती है. उनका संदेह चुनाव आयोग और मोदी सरकार पर है. उनका मानना है कि दोनों की की मिलीभगत से ही भारत में एंटी इनकम्बेंसी नहीं दिखती.
आरोपों की हकीकत समझें
राहुल गांधी और उनके सहयोगी विपक्षी नेताओं के आरोपों की हकीकत समझने के लिए राज्य और राष्ट्रीय स्तर की कुछ सरकारों पर गौर फरमाना जरूरी है. राहुल गांधी एंटी इनकम्बेंसी को राजनीति का अनिवार्य आयाम बताते वक्त यह भूल जाते हैं कि 1947 से 1977 तक देश में लगातार कांग्रेस की ही सरकार बनती रही. यह भी कि उनके परिवार से ही पंडित जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी प्रधानमंत्री बनते रहे. बाद में राजीव गांधी भी उनके परिवार से ही पीएम बने. मौका तो सोनिया गांधी को भी मिला, लेकिन उन्होंने विवादों से बचने के लिए मनमोहन सिंह को मुखौटा पीएम बनवा दिया, जो 2014 तक सत्ता में रहे. राज्यों की बात करें तो कई मुख्यमंत्रियों ने जीत की हैट्रिक लगाई है.
आजादी के बाद से दर्जनों मुख्यमंत्रियों के खाते में यह उपलब्धि दर्ज है. कई तो 3 से भी ज्यादा बार लगातार मुख्यमंत्री बने हैं. हालिया उदाहरण 2 मुख्यमंत्रियों का है. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ही लगातार 3 टर्म सीएम रहीं. बिहार में नीतीश कुमार को लगातार 20 साल सीएम रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ. ओडिशा में नवीन पटनायक ने भी रिकॉर्ड बनाया था. तब एंटी इनकम्बेंसी की बात किसी ने क्यों नहीं की.
कई सीएम ने हैट्रिक लगाई
गुजरात में नरेंद्र मोदी ने तब हैट्रिक लगाई, जब केंद्र में गैर भाजपा सरकार थी. वे 2001 से लेकर 2012 तक चुनाव जीतकर सीएम बनते रहे. उस वक्त भी उन पर एंटी इनकम्बेंसी का कोई असर नहीं दिखा, जबकि केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए की सरकार थी. केंद्र में भाजपा की सरकार रहते भी पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी 2 बार सीएम बनीं. पहली बार 2011 में वे सीएम बनीं. लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री का उन्होंने रिकॉर्ड बनाया. 2026 में भाजपा से वे परास्त हुईं. छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के ही रमन सिंह 2003 से 2018 तक 3 बार लगातार सीएम रहे.
असम में कांग्रेस के तरुण गोगोई भी लगातार 2001, 2006 और 2011 में सीएम बने. दिल्ली में कांग्रेस की शीला दीक्षित भी 1998 से 2008 तक 3 बार मुख्यमंत्री बनीं. कांग्रेस राज में ही भाजपा के शिवराज सिंह चौहान 2003, 2008 और 2013 में जीत हासिल कर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने. इसी तरह ओडि़शा में नवीन पटनायक 2000 से 2024 तक लगातार 5 बार मुख्यमंत्री बने. सिक्किम में पवन कुमार चामलिंग 1994 से 2019 तक सीएम रहे. बंगाल में ममता बनर्जी के पहले ज्योति बसु ने भी 5 बार लगातार मुख्यमंत्री का कार्यकाल (1977-2000) पूरा किया. त्रिपुरा में मानिक सरकार, नगालैंड में नेफ्यू रियो और मणिपुर में ओकरम इबोबी सिंह, त्रिपुरा में मानिक सरकार भी लगातार हैट्रिक बनाने वालों में शामिल हैं. इसलिए राहुल गांधी का यह कहना कि एंटी इनकम्बेंसी सत्ता सियासत की अनिवार्य शर्त है, उचित नहीं लगता.
राहुल को क्या खल रहा है
राहुल गांधी की एंटी इनकम्बेंसी वाली बात कुछ हद तक सही है, पर, यह उन्हीं नेताओं या पार्टियों पर लागू होती है, जिनके काम या नीतियां लोगों को पसंद नहीं आते. कई नेता अपनी छवि, कल्याणकारी योजनाओं, संगठनात्मक ताकत और विपक्ष की कमजोरी के कारण इसे पार कर जाते हैं. अगर नरेंद्र मोदी की सरकार पर एंटी इनकम्बेंसी का कोई खास असर नहीं दिखता तो इसका प्रथम दृष्टया यही मायने निकलता है कि उनके काम और भाजपा की नीतियों को लोगों का समर्थन मिल रहा है.
लगातार 3 बार भाजपा के सत्ता में रहते लोकसभा चुनावों में उसके वोट शेयर पर गौर कीजिए. गुजरात में 2002 में मोदी के मुख्यमंत्री रहते भाजपा का वोट शेयर 49.85 प्रतिशत था. 2007 में मामूली कमी के साथ वोट शेयर 49.12 फीसदी रहा. 2012 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुए चुनाव में भाजपा को 47.85 प्रतिशत वोट मिले थे. यानी यानी 1-1.5 प्रतिशत के करीब ही वोटों की घट-बढ़ रही.
ममता पर भी बेअसर रहा
पश्चिम बंगाल में वाम शासन को परास्त कर 2011 में सत्ता संभालने वाली ममता बनर्जी पर तो एंटी इनकम्बेंसी के बजाय प्रो इनकम्बेंसी दिखाई देता है. 2011 में उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) को 38.9 प्रतिशत वोट मिले थे. 2016 के चुनाव में बढ़ोतरी के साथ यह आंकड़ा 44.9 प्रतिशत पर पहुंच गया. 2021 में उन्हें रिकॉर्ड वोट मिले और वोट शेयर करीब 45 प्रतिशत पर पहुंच गया. यहां एंटी इनकम्बेंसी का उल्टा असर दिखा. टीएमसी का वोट शेयर लगातार बढ़ा. हालांकि कांग्रस की तरह ही ममता बनर्जी भाजपा विरोधी थीं. 2021 में भाजपा से उनकी कड़ी टक्कर भी थी.
इसी तरह ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक ने भी अपने हर कार्यकाल में 40-45 प्रतिशत का वोट शेयर बरकरार रखा. इसलिए यह कहना कि एंटी इनकम्बेंसी होगी ही, कहीं से उचित नहीं लगता. एंटी-इनकम्बेंसी का असर ज्यादातर मामलों में दिखता है, लेकिन मजबूत नेतृत्व, मुफ्त बिजली, राशन, पेंशन जैसी कल्याण योजनाओं, संगठनात्मक शक्ति और विपक्ष की कमजोरी एंटी इनकम्बेंसी को बेअसर कर देती है. नरेंद्र मोदी ने पीएम के रूप में अगर हैट्रिक बनाई है तो इसकी असल वजहें यही हैं. भाजपा 2014 से लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता में है. उसका वोट शेयर लगातार बढ़ता रहा है.
कांग्रेस नाकाम क्यों है?
राहुल गांधी को सामने रख कर कांग्रेस सत्ता में आने की लगातार कोशिश करती रही है. पर, उसकी संगठनात्मक और नीतिगत कमजोरियां उसे कामयाब नहीं होने देतीं. कांग्रेस के संगठन की स्थिति तो स्थिति तो यह है कि वहां एक ही परिवार (गांधी परिवार) की चलती है. इसके लिए जब भी आवाज उठी, उसे दबा दिया गया. साल 2020 में कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं ने अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक आंतरिक चिट्ठी लिखकर संगठन की कमजोरी की ओर इशारा किया था. पार्टी के लगातार चुनावी पतन पर चिंता जताते हुए ऊपर से नीचे तक संगठनात्मक चुनाव कराने की मांग की गई थी.
शरद पवार, ममता बनर्जी, गुलाम नबी आजाद जैसे अपने प्रदेशों में लोकप्रिय रहे नेता इन्हीं वजहों से पार्टी छोड़ते रहे. इस पर ध्यान देने के बजाय राहुल गांधी को लगता है कि अपने बूते कांग्रेस भले कामयाब न हो, लेकिन विपक्ष के सहयोग से वे प्रधानमंत्री जरूर बन सकते हैं. इसी मकसद से विपक्षी पार्टियों ने यूपीए की तर्ज पर ‘इंडिया’ नाम का गठबंधन बनाया. इसका अधिकतम लाभ यह हुआ कि भाजपा की लगातार बढ़त पर 2024 में ब्रेक लगा. भाजपा सीटों की संख्या में लगातार बढ़त के बाद तीसरी बार अकेले बहुमत का आंकड़ा नहीं जुटा पाई. इसके बावजूद भाजपा ने राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व के अपने कोर एजेंडे को नहीं छोड़ा है. उसे पता है कि इसी के सहारे कभी लोकसभा में 2 सीटों पर रहने के बाद से उसे यह मुकाम हासिल हुआ है.
कांग्रेस समझ नहीं पाई
कांग्रेस अब भी समझ नहीं पाई कि उसके वोटर कौन हैं. हिन्दुत्व के कारण ब्राह्मण जैसे उसके कोर वोटर अलग होकर भाजपा से सट गए. मुस्लिम तुष्टीकरण की उसकी नीति के कारण दूसरी हिन्दू जातियों ने भी भाजपा के साथ जाने में ही भलाई समझी. ऐसा नहीं कि कांग्रेस को इसके बारे में जानकारी नहीं है. 2014 में सत्ता छिन जाने के बाद एके एंटोनी ने अपनी समीक्षा रिपोर्ट में इसकी जानकारी नेतृत्व को दे दी थी.
फिर भी कांग्रेस मुस्लिम तुष्टीकरण के नाम पर कभी जम्मू कश्मीर में धारा 370 का विरोध करती है तो कभी प्रियंका गांधी जन भावनाओं को समझे बगैर फिलिस्तीन का बैग लेकर संसद पहुंच जाती हैं. उमर खालिद और शरजिल इमाम जैसे देश विरोधी लोगों के लिए इनके टेसुए बहते रहते हैं. हद तो तब हो गई, जब एक भारतीय पर इजरायल के यात्रियों वाले विमान में ओमान के को पायलट ने चाकू से हमला किया. किसी तरह भारतीय मूल के पायलट स्मिथ मच्छर ने जख्मी हालत में यात्रियों की जान बचाई. भारत के अलावा कई देशों ने इसके लिए उसकी तारीफों के पुल बांधे, लेकिन कांग्रेस के किसी नेता ने सामान्य प्रतिक्रिया देने से भी परहेज कर लिया.
कांग्रेस के लिए जरूरी है
कांग्रेस अब भी अपनी दुर्गति की असलियत समझ नहीं पाई है. कांग्रेस नेताओं को लगता है कि उनकी असफलता की असल वजह चुनाव आयोग और उसका SIR है. वह इसी में अटकी है. बिहार और बंगाल के नतीजे देखने के बावजूद उसकी सुई वहीं अटकी हुई है. उसे यह समझ में नहीं आ रहा कि SIR को लोगों ने अब स्वीकार कर लिया है.
बिहार में ही कांग्रेस के बड़े नेता रहे शकील अहमद खां ने SIR में कटे नामों के बाबत कहा था कि जिन 65 लाख लोगों के नाम कटे, उनमें 65 ने भी इसके खिलाफ कोई शिकायत नहीं की. इसके बावजूद राहुल गांधी ने वोटर जागरूकता रैली निकाली. नतीजा सबने देख लिया. चुनाव आयोग और SIR के बजाय कांग्रेस को अपनी दुर्गति की असल वजहों पर ध्यान देने की जरूरत है. यह भी सच है कि भाजपा का विकल्प बनने की राष्ट्रीय पार्टियों में कांग्रेस में ही कूबत दिखती है. पर, उसे कामयाबी मिलनी तभी संभव है, जब वह जन भावना के अनुरूप अपनी नीतियां बनाए और आचरण करे. सिर्फ हंगामा खड़ा करने से सफलता की संभावना सिर्फ सपना ही रहेगी.
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