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नई दिल्ली (Former Maoists Clear SSC Exam). कुछ लोगों को जिंदगी ऐसे दोराहे पर खड़ा कर देती है, जहां एक तरफ बंदूकों की गड़गड़ाहट और दूसरी तरफ किताबों की खामोशी होती है. तब सही रास्ता चुनना चुनौती बन जाता है. छत्तीसगढ़ के जंगलों में कभी बंदूक थामने वाले कुछ युवाओं ने जब हिंसा का रास्ता छोड़कर समाज में लौटने का फैसला किया तो किसी ने नहीं सोचा था कि वे इतनी जल्दी नई इबारत लिखेंगे. पिछले साल हथियार डालने वाले 210 माओवादियों में से 7 ने छत्तीसगढ़ ओपन स्कूल की एसएससी परीक्षा में शानदार सफलता हासिल की है.

इनमें से 3 ने फर्स्ट क्लास अंकों के साथ यह परीक्षा पास की है. इनकी जीत साबित करती है कि इंसान ठान ले तो वह अतीत का हर काला पन्ना पलटकर नया और रोशन भविष्य लिख सकता है. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, पूर्व माओवादियों में से कई ने कम उम्र में अपनों को खो दिया था या किन्हीं मजबूरियों की वजह से गलत दिशा में भटक गए थे. गीता, अर्जुन और संतोष कभी संगठन के अंदर अलग ही दुनिया में जी रहे थे, जहां AK-47 और बारूदी सुरंगों के साये में बचपन और जवानी गुजरती है. लेकिन जब इन्होंने आत्मसमर्पण किया तो सरकार की पुनर्वास नीतियों और स्थानीय प्रशासन के समर्थन ने इन्हें नई जिंदगी दी.

अतीत को पीछे छोड़ रचा भविष्य

जेल की सलाखों के पीछे या पुनर्वास केंद्रों में रहते हुए इन लोगों ने अपनी अधूरी पढ़ाई को दोबारा शुरू करने की जिद पकड़ी. किसी ने टैबलेट पर ऑनलाइन किताबें पढ़कर रातें एक कीं तो किसी को साथियों का साथ मिला. आज इनकी कामयाबी उन तमाम युवाओं के लिए बड़ा सबक है जो किसी भी वजह से अपने जीवन में पिछड़ गए हैं.

गीता की दास्तान: छठी कक्षा में छूटी पढ़ाई, 35 साल की उम्र में बनीं ‘डॉ चंपा’

गीता नारोते की कहानी बेहद झकझोर देने वाली और प्रेरित करने वाली है. महाराष्ट्र के गढ़चिरौली की रहने वाली गीता जब महज 10 साल की थीं, तब माओवादियों ने उनके पिता की हत्या कर दी थी. इसके बाद वे माओवादी मूवमेंट के संपर्क में आ गईं और लंबे समय तक संगठन का हिस्सा रहीं. पिछले साल उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में वापसी की. 35 की उम्र में गीता ने हिम्मत नहीं हारी और एसएससी परीक्षा पास कर ली. संगठन के दिनों में उन्हें ‘डॉ चंपा’ के नाम से जाना जाता था क्योंकि वे साथियों का इलाज करती थीं और गोलियों के घाव सिलती थीं. अब गीता नर्स बनकर परिवार का सहारा बनना चाहती हैं.

जेल की चारदीवारी से किताबों के पन्नों तक का सफर

अर्जुन ओयाम और संतोष अचला जैसे युवाओं की कहानी भी कम संघर्ष भरी नहीं है. 32 साल के अर्जुन जब बस्तर के जंगलों में थे, तब उनका जीवन बिल्कुल अलग था. लेकिन मुख्यधारा में लौटने के बाद उन्होंने अपनी रुकी हुई जिंदगी को पटरी पर लाने की ठान ली. पुलिस और प्रशासन ने उनकी काउंसलिंग की, डॉक्यूमेंट बनवाने में मदद की और उन्हें पढ़ाई के लिए प्रेरित किया. दिनभर मछली पालन और इलेक्ट्रीशियन का काम सीखने वाले अर्जुन अपनी रातें पढ़ाई में गुजारते थे. इसी तरह संतोष अचला ने भी कठिन परिस्थितियों और पारिवारिक त्रासदियों का सामना करते हुए अपनी लगन से यह परीक्षा पास की.

डिजिटल गैजेट्स और WhatsApp ने ऐसे आसान की पढ़ाई

जंगलों और गांवों से ताल्लुक रखने वाले इन पूर्व विद्रोहियों के लिए अचानक से पढ़ाई के माहौल में ढलना आसान नहीं था. लेकिन मॉडर्न टेक्नोलॉजी और मददगार दोस्तों ने उनका सफर आसान बना दिया. इनमें से कई के पास पढ़ाई के लिए टैबलेट थे, जिन पर वे ऑनलाइन चैप्टर और पीडीएफ पढ़ा करते थे. कुछ युवाओं ने बताया कि उनके दोस्तों ने WhatsApp के जरिए पढ़ाई में उनकी मदद की, नोट्स भेजे और कठिन सवालों के जवाब समझाए. पुलिसकर्मियों और लोकल टीचर्स ने भी इनकी बहुत मदद की, जिससे इनका कॉन्फिडेंस लगातार बढ़ता गया.

नफरत और हिंसा छोड़कर विकास की रोशनी का दामन

पूर्व माओवादियों की सक्सेस स्टोरी इस बात का जीता-जागता सुबूत है कि समाज और शासन किसी भटके हुए इंसान को सही दिशा और अवसर दे तो वह पॉजिटिव बदलाव ला सकता है. आज ये सातों पूर्व माओवादी उन युवाओं के लिए रोल मॉडल बन चुके हैं जो अभी भी हथियारों की अंधेरी दुनिया में फंसे हुए हैं. इनकी सफलता पैगाम देती है कि बंदूक से कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता. असली ताकत और मुक्ति केवल कलम और शिक्षा में ही है.

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