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कानपुरः आंखों की बीमारी का कारण पता करने से लेकर चश्मा हटाने तक इलाज की तकनीक तेजी से बदल रही है. अब आंखों में होने वाले इंफेक्शन की वजह पता करने के लिए पॉलीमर्स एंड रिएक्शन टेस्ट का इस्तेमाल किया जा रहा है. इस जांच से संक्रमण किस वायरस, बैक्टीरिया या दूसरे कारण से हुआ है, इसकी जानकारी कम समय में मिल सकती है. इससे डॉक्टरों को बीमारी के सही कारण के अनुसार इलाज शुरू करने में मदद मिलती है. वहीं इमेजिंग के क्षेत्र में ऑप्टिकल कोहरेंस टोमोग्राफी यानी ओसीटी ने आंखों के अंदर की बारीक गड़बड़ियों को पहचानना आसान कर दिया है. दूसरी ओर लेसिक सर्जरी में भी नई तकनीक के आने से अब पास का चश्मा हटाने के विकल्प भी उपलब्ध हो गए हैं.

आंखो के लिए खतरा

नेत्र विशेषज्ञों के अनुसार, आंखों में इंफेक्शन होने पर सबसे बड़ी चुनौती उसका सही कारण पता करना होता है. कई बार आंख लाल होने, पानी आने या दर्द जैसे लक्षणों से यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि संक्रमण किस वजह से हुआ है. ऐसे में पॉलीमर्स एंड रिएक्शन टेस्ट काफी उपयोगी साबित हो रहा है. इसमें संक्रमण फैलाने वाले सूक्ष्म जीवों की पहचान की जा सकती है. इससे मरीज को बिना जरूरत अलग-अलग दवाएं देने के बजाय बीमारी के कारण के हिसाब से उपचार करने में मदद मिलती है.

ओसीटी से आंख के अंदर की परतों तक पहुंचेगी नजर

आंखों की जांच में ओसीटी एक महत्वपूर्ण आधुनिक तकनीक बनकर सामने आई है. यह नॉन इंवेसिव जांच है, यानी इसमें आंख के अंदर किसी उपकरण को डालने की जरूरत नहीं होती. इसकी मदद से रेटिना समेत आंख के अंदर मौजूद अलग-अलग परतों की बेहद बारीक तस्वीर ली जा सकती है. इससे डॉक्टर यह पता लगा सकते हैं कि आंख में समस्या किस हिस्से में है और उसका असर कितना है. ओसीटी का इस्तेमाल ग्लूकोमा, रेटिना से जुड़ी बीमारियों और आंखों की कई अन्य समस्याओं की जांच में किया जा रहा है. इसका एक फायदा यह भी है कि इलाज के दौरान आंख में होने वाले बदलावों को समय-समय पर देखा जा सकता है. इससे बीमारी की स्थिति और उपचार के असर को समझना आसान होता है.

नई लेसिक तकनीक से पास का चश्मा हटाने का विकल्प

लेसिक सर्जरी लंबे समय से दूर की नजर का चश्मा हटाने के लिए इस्तेमाल होती रही है. अब इसमें नई तकनीक के इस्तेमाल से उम्र बढ़ने के साथ आने वाली पास की नजर की समस्या को दूर करने के विकल्प भी बढ़े हैं. विशेषज्ञों के मुताबिक, मरीज की उम्र, आंखों की स्थिति और नजर की समस्या की जांच करने के बाद यह तय किया जाता है कि उसके लिए कौन सी तकनीक बेहतर रहेगी. इस तकनीक से उन लोगों को भी राहत मिलने की उम्मीद है, जिन्हें दूर देखने के लिए तो चश्मे की जरूरत नहीं होती, लेकिन पास का काम करने के लिए चश्मा लगाना पड़ता है. आधुनिक सर्जरी में सटीकता बढ़ने के साथ मरीज को रिकवरी में भी कम समय लग सकता है.

बारिश में आंखों को रगड़ना पड़ सकता है भारी

तकनीक कितनी भी आधुनिक हो, आंखों की सामान्य देखभाल जरूरी है. बारिश के मौसम में कंजेक्टिवाइटिस समेत कई तरह के संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है. आंखों में लालिमा, खुजली, जलन या पानी आने पर लोग अक्सर उन्हें हाथ से रगड़ने लगते हैं. इससे संक्रमण बढ़ सकता है और आंख की सतह को नुकसान पहुंच सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे लक्षण होने पर आंखों को रगड़ने के बजाय साफ-सफाई का ध्यान रखना चाहिए और समस्या लगातार बनी रहने पर नेत्र रोग विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए. खासकर 40 वर्ष की उम्र के बाद नियमित रूप से आंखों की जांच कराना जरूरी है, ताकि ग्लूकोमा और रेटिना से जुड़ी बीमारियों को शुरुआती स्तर पर ही पहचाना जा सके. आधुनिक जांच और सर्जरी की तकनीकों ने अब आंखों की बीमारी को जल्दी पकड़ने से लेकर उसके सटीक इलाज तक कई नए रास्ते खोल दिए हैं.

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