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Twisha Sharma Death Case: ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में हाल में सीबीआई से चार्जशीट दायर की है. इस चार्जशीट में सीबीआई ने बताया है कि ट्विशा पर उनके पति और सास ने मानसिक क्रूरता की. इसकी वजह से ट्विशा ने आत्महत्या की. सीबीआई ने इसे चार्जशीट में शामिल तो कर लिया, लेकिन कोर्ट में कैसे साबित करेगी? भारतीय कानून में मानसिक क्रूरता को लेकर क्या प्रावधान हैं? आइए जानते हैं

Twisha Sharma Death Case: शादी में कैसे साबित होती है 'मानसिक क्रूरता'?Zoom

ट्विशा शर्मा सुसाइड केस पर सीबीआई ने चार्जशीट फाइल की.

Twisha Sharma Death Case: मॉडल और एक्ट्रेस ट्विशा शर्मा की मौत के मामले में CBI ने चार्जशीट फाइल की. इस चार्जशीट के जरिए एक बरसों से चला आ रहे सवाल को फिर उठाया गया है. यह सवाल है- क्या कोर्ट में मेंटल क्रुएल्टी (मानसिक क्रूरता) को साबित क्या जा सकता है? क्या क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप को साबित किया जा सकता है? इसके बारे में जानने से पहले, हमें ट्विशा डेथ केस के पूरे मामले को समझना होगा. ट्विशा ने वकील समर्थ सिंह से शादी की थी. शादी के पांच महीने बाद, 12 मई 2026 को ट्विशा भोपाल में अपने ससुराल में फंदे से लटकी हुई पाई गईं. उनकी सास रिटायर्ड ज़िला जज गिरिबाला सिंह हैं. CBI ने सोमवार को भोपाल की अदालत में अपनी फाइनल रिपोर्ट में कहा, “जांच से पता चला है कि दोनों आरोपियों ने मृतका के साथ इतनी ज़्यादा मानसिक क्रूरता की थी कि उसके पास अपनी जान देने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचा था.” चार्जशीट में क्रूरता के लिए भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 और आत्महत्या के लिए उकसाने के लिए धारा 108 जैसे प्रावधानों का ज़िक्र किया गया है.

AIIMS के मेडिकल बोर्ड ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि ट्विशा शर्मा की मौत फंदे से लटकने से हुई थी. उनपर शारीरिक हमले या संघर्ष का कोई निशान नहीं मिला. बता दें, चार्जशीट में सीबीआई के आरोप और उसके द्वारा इकट्ठा की गए सबूत शामिल होते हैं. ये कोर्ट का फैसले नहीं हैं. दोषी या निर्दोष होने का फैसला पूरी सुनवाई के बाद ही होगा, जब सबूतों की क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) के ज़रिए जांच की जाएगी और अदालत अपना फैसला सुनाएगी.

भारतीय कानून के अनुसार ‘क्रूरता’ क्या है?

वकील ध्रुव चौधरी बताते हैं, “पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता को पहली बार 1986 में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत एक दंडनीय अपराध के रूप में शामिल किया गया था. इसे भारतीय न्याय संहिता, 2023 के तहत धारा 85 और 86 के रूप में मूल रूप से वैसा ही रखा गया है. इसलिए अदालतों के पास इस प्रावधान के दायर- इसके अर्थ, तत्वों और सीमाओं- को विकसित करने के लिए लगभग चार दशक का समय रहा है.”

BNS की धारा 85 के तहत, पति या पति के रिश्तेदार द्वारा किसी महिला के साथ क्रूरता करना अपराध माना जाता है. इसके लिए अधिकतम सज़ा तीन साल की जेल और जुर्माना है. इस मकसद के लिए सेक्शन 86 में क्रूरता को इस तरह बताया गया है:

  • (a) कोई भी जान-बूझकर किया गया ऐसा व्यवहार जिससे किसी महिला के आत्महत्या करने या उसके शरीर, अंग या सेहत (चाहे मानसिक हो या शारीरिक) को गंभीर चोट या खतरा पहुंचने की संभावना हो; या
  • (b) किसी महिला को या उससे जुड़े किसी व्यक्ति को संपत्ति या कीमती चीज़ की गैर-कानूनी मांग पूरी करने के लिए मजबूर करने के इरादे से उसे परेशान करना, या ऐसी मांग पूरी न होने पर उसे परेशान करना.

माननीय अदालतों के अलग-अलग फैसलों में कही गई बातें अपराध की प्रकृति को समझने में मददगार हो सकती हैं. ध्रुव चौधरी के अनुसार, कुछ ऐसे क्लासिक उदाहरण हैं जो आज भी रिलेवेंट हैं:

  1. एस. हनुमंत राव बनाम एस. रमानी मामले में, अदालत ने माना कि मानसिक क्रूरता का मोटे तौर पर मतलब है जब कोई एक पक्ष दूसरे पक्ष को इतना मानसिक दर्द, पीड़ा या तकलीफ देता है कि पति-पत्नी के बीच का रिश्ता टूट जाता है और इसके परिणामस्वरूप पीड़ित पक्ष के लिए दूसरे पक्ष के साथ रहना असंभव हो जाता है. दूसरे शब्दों में, गलत काम करने वाले पक्ष से दूसरे पक्ष के साथ रहने की उम्मीद नहीं की जाती है.
  2. वी. भगत बनाम श्रीमती डी. भगत मामले में, यह देखा गया कि यह साबित करना ज़रूरी नहीं है कि मानसिक क्रूरता ऐसी हो जिससे याचिकाकर्ता की सेहत को नुकसान पहुंचे. ऐसे निष्कर्ष पर पहुंचते समय, पक्षों की सामाजिक स्थिति, शिक्षा का स्तर, वे जिस समाज में रहते हैं, यदि वे पहले से ही अलग रह रहे हैं तो उनके भविष्य में एक साथ रहने की संभावना या न होने की संभावना, और अन्य सभी संबंधित तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए. एक मामले में जो क्रूरता है, वह दूसरे मामले में क्रूरता नहीं भी हो सकती है. यह हर मामले में उस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तय किया जाने वाला मामला है.
  3. श्रीमती राज रानी बनाम स्टेट (दिल्ली प्रशासन) मामले में, अदालत ने कहा कि धारा 498A के प्रावधानों के तहत क्रूरता के मामले पर विचार करते समय, अदालत को यह देखना चाहिए कि आरोप बहुत गंभीर प्रकृति के हों और उन्हें बिना किसी उचित संदेह के साबित किया जाना चाहिए.
  4. सुशील कुमार शर्मा बनाम भारत संघ मामले में, कोर्ट ने IPC की धारा 306 और 498A के तहत ‘क्रूरता’ (cruelty) के बीच अंतर समझाया. कोर्ट ने कहा कि धारा 498A के तहत पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा की गई क्रूरता महिला को आत्महत्या आदि करने के लिए मजबूर करती है, जबकि IPC की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने और ऐसा करने के इरादे की बात होती है. इसलिए, इन प्रावधानों को लागू करने में इरादे का बुनियादी अंतर है.
  5. गिरधर शंकर तावड़े बनाम महाराष्ट्र राज्य मामले में, कोर्ट ने कहा कि “क्रूरता” का मतलब वही होना चाहिए जो IPC की धारा 498A में कानूनी तौर पर बताया गया है, और इसमें एक व्यक्ति द्वारा दूसरे व्यक्ति को लगातार प्रताड़ित करने की स्थिति होनी चाहिए.

मानसिक क्रूरता को साबित करने वाले सबूत क्या

  • वैवाहिक जीवन निजी होता है, और शादी के अंदर ज़्यादातर घटनाएं घर के भीतर, बाहरी लोगों की नज़र से दूर होती हैं. ध्रुव चौधरी का कहना है, “मानसिक क्रूरता को हमेशा किसी प्रत्यक्ष गवाह से साबित नहीं किया जा सकता. इसे आमतौर पर मौखिक बयानों, दस्तावेजों, मेडिकल रिकॉर्ड, डिजिटल बातचीत और आस-पास की परिस्थितियों के कुल असर पर विचार करके साबित किया जाता है.”
  • WhatsApp मैसेज, ईमेल, सोशल-मीडिया चैट, वॉयस नोट और कॉल रिकॉर्डिंग से धमकी, अपमान, बेइज्जती, चरित्र पर सवाल उठाना, आर्थिक दबाव, गैर-कानूनी मांग, अलग-थलग करना या बार-बार बुरा व्यवहार करने जैसी बातें सामने आ सकती हैं. कुछ चुने हुए स्क्रीनशॉट की तुलना में पूरी बातचीत ज़्यादा भरोसेमंद होती है. यह साबित करना भी ज़रूरी है कि मैसेज किसने भेजे और क्या वे असली और पूरे हैं. यह काम असली फ़ोन, अकाउंट की जानकारी, तारीखों और मैसेज के साथ सेव की गई दूसरी टेक्निकल जानकारी, क्लाउड बैकअप, सर्विस प्रोवाइडर से मिले रिकॉर्ड और ज़रूरत पड़ने पर फ़ोरेंसिक जांच और तय इलेक्ट्रॉनिक-सबूत सर्टिफ़िकेट के ज़रिए किया जा सकता है. कॉल-डिटेल रिकॉर्ड से यह पता चल सकता है कि कॉल कब और कितनी बार किए गए, लेकिन उनसे यह पता नहीं चल सकता कि उन कॉल्स के दौरान क्या बात हुई.
  • मेडिकल और काउंसलिंग रिकॉर्ड से यह पता चल सकता है कि महिला एंग्जायटी, डिप्रेशन, डर या किसी दूसरी मानसिक परेशानी से जूझ रही थी. हालाकि, ऐसे रिकॉर्ड अपने आप में यह साबित नहीं करते कि उस हालत की वजह कौन था.
  • परिवार के सदस्यों, दोस्तों, पड़ोसियों, साथ काम करने वालों या घरेलू काम करने वालों के बयान भी अहम हो सकते हैं, खासकर तब जब उन्होंने खुद उस व्यवहार को देखा हो या उस समय शिकायतें सुनी हों.
  • CCTV फ़ुटेज, डायरी, बैंक और UPI रिकॉर्ड, लोकेशन डेटा और डिलीट किए गए या रिकवर किए गए मैसेज से उन हालात को समझने में और मदद मिल सकती है जिनमें महिला रह रही थी.
  • कोर्ट को सभी सबूतों पर एक साथ विचार करना चाहिए और यह तय करना चाहिए कि क्या इससे गंभीर क्रूरता साबित होती है, न कि पति-पत्नी के बीच आम असहमति या कभी-कभार होने वाली लड़ाई-झगड़े.

आम लोग क्या कर सकते हैं?

ध्रुव चौधरी न्याय पाने की प्रक्रिया के बारे में कहते हैं, “न्याय पाने की प्रक्रिया में पुलिस को जानकारी देना शामिल है. अगर जानकारी से किसी अपराध के होने का पता चलता है, तो FIR दर्ज होनी चाहिए. आरोपों की जांच करने के बाद, अगर पुलिस को पीड़िता के दावों का समर्थन करने वाले सबूत मिलते हैं, तो वह चार्जशीट दाखिल करेगी और आरोपी पर मुक़दमा चलाएगी.”

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रमेश कुमारSenior Sub Editor

रमेश कुमार, सितंबर 2021 से बतौर सीनियर सब एडिटर न्यूज18 हिंदी डिजिटल से जुड़े हैं. एक्सप्लेनर/नॉलेज डेस्क पर काम कर रहे हैं. समय-समय पर विधानसभा-लोकसभा चुनाव पर …

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