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लेखक: गौरव पांडेय, (स्वतंत्र पत्रकार)
(लेखक वरिष्ठ स्वस्थ्यविद्, सामाजिक, पर्यावरण एवं धार्मिक कार्यों से जुड़े रहते हैं। यह लेख उदय भूमि में प्रकाशन के लिए लिखा है।) इन विषयों पर अक्सर लिखते रहते है। यह लेख उदय भूमि के लिए लिखा है)

भारत केवल भौगोलिक सीमाओं में बसा एक देश नहीं, बल्कि हजारों वर्षों से चली आ रही जीवंत संस्कृति, शालीन परंपरा, मानवीय संस्कारों और जीवन मूल्यों की सशक्त अभिव्यक्ति है। यहां परिवार को पहली पाठशाला माना गया और माता-पिता, गुरु, बुजुर्ग तथा समाज को व्यक्ति के चरित्र निर्माण का आधार समझा गया। देश-काल-पात्र की कसौटी पर खरे संतों, ऋषियों-मुनियों और समाज सुधारकों ने अपने आचरण और विचारों के माध्यम से भारतीय समाज को मर्यादा, यम-नियम, संयम, सेवा, तप, त्याग और उत्तम आचरण का जो मार्ग दिखाया, वही लोककल्याणकारी समझा गया। वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामय: का स्रोत भी यही उदात्त विचार है जो हमारी अमिट दुनियावी छाप बन चुका है। ऐसे में जब सार्वजनिक मंचों पर या सोशल मीडिया के माध्यम से युवाओं के व्यवहार और सोच के ऐसे उदाहरण सामने आते हैं, जो सामाजिक मर्यादाओं और शालीनता पर प्रश्न खड़े करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से चिंता होती है। इस पर चलने वाले टीवी डिबेट से संवैधानिक संकीर्णताओं और उसके वैधानिक रूप से असहाय होने का पता चलता है। हाल के दिनों में जंतर-मंतर पर सामने आए घटनाक्रम ने भी इसी चिंता को सामने रखा है। किसी भी लोकतांत्रिक देश में अपनी बात रखने, विरोध करने और असहमति व्यक्त करने का अधिकार सभी को है, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और मर्यादा भी जुड़ी होती है। अधिकार और कर्त्तव्य साथ साथ चलते हैं।

ऐसे में विरोध का स्वर यदि भाषा, व्यवहार या आचरण की ऐसी सीमा तक पहुंच जाए जहां दूसरे व्यक्ति की गरिमा प्रभावित होने लगे, तो वहां समाज को ठहरकर विचार करने की आवश्यकता है। यह किसी एक व्यक्ति, वर्ग या पीढ़ी को दोष देने का विषय नहीं है, बल्कि बदलते सामाजिक परिवेश को समझने और उसके समाधान तलाशने का समय है। सबसे बड़ा सवाल यह कि हम हर बात के लिए पुलिस एवं सरकार को दोषी ठहराकर खुद को कब तक सुरक्षित रख पाएंगे? यह विचारणीय प्रश्न है। यह भी सच है कि देश की विशाल आबादी की तुलना में ऐसे उदाहरणों की संख्या बहुत कम हो सकती है। भारत में आज भी करोड़ों परिवार ऐसे हैं जहां संस्कार, अनुशासन, बड़ों का सम्मान और सामाजिक जिम्मेदारी जीवन का अहम हिस्सा हैं, विशेष रूप से ग्रामीण अंचलों में। लेकिन आधुनिक संचार माध्यमों और सामाजिक मीडिया के दौर में किसी छोटी सी घटना को भी तिल का ताड़ बनाकर कुछ ही समय में लाखों लोगों तक पहुंचाया जा सकता है। इसके दुष्प्रभावों को समझने और उसका कानूनी हल निकालना देश व समाज की सबसे बड़ी जरूरत है और यहीं पर ठोस नियम बनाने और उसके अनुपालन की जरूरत है।

यही कारण है कि समाज में घटित किसी भी असामान्य घटना का प्रभाव उसकी वास्तविक संख्या से कहीं अधिक दिखाई देने लगता है। इसके पीछे संपादकीय विवेक की किल्लत का भी बहुत बड़ा योगदान है, जबकि सोशल मीडिया से तो यह विवेक पूरी तरह से गायब प्रतीत होता है।इसके बावजूद इन घटनाओं को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा, क्योंकि छोटी-छोटी प्रवृत्तियां यदि समय रहते समझी और सुधारी न जाएं तो आगे चलकर बड़ी सामाजिक चुनौती बन सकती हैं। आज सबसे बड़ा सवाल जेन-जी युवाओं की प्रवृत्ति को लेकर है, जिससे जेन-अल्फा भी प्रभावित हो रहे हैं। वहीं जेन एक्स का धर्मसंकट भी बढ़ रहा है। आखिर युवा ही तो किसी भी राष्ट्र की ऊर्जा और भविष्य होते हैं। उनमें सवाल करने की क्षमता, बदलाव की इच्छा और नई सोच होती है। लेकिन नई सोच के साथ विवेक, संयम और अनुभव का संतुलन भी जरूरी है। यही संतुलन प्रौढ़ और वरिष्ठ पीढ़ी के अनुभव से प्राप्त होता है।

आजकल दुर्भाग्य से परिवारों में संवाद का समय कम हो रहा है। संयुक्त परिवारों का स्वरूप सूक्ष्म परिवारों में बदल रहा है और माता-पिता तथा बच्चों के बीच भी कई बार संवाद की दूरी बढ़ती जा रही है। ऐसे में बच्चों और युवाओं को सही-गलत का अंतर समझाने की जिम्मेदारी केवल विद्यालय या सरकार पर नहीं छोड़ी जा सकती। क्योंकि परिवार बच्चे के व्यक्तित्व निर्माण की पहली सीढ़ी है। ऐसे में माता-पिता यदि बच्चों से नियमित संवाद करें, उनकी समस्याओं को सुनें और बिना डराए उन्हें अपनी बात रखने का अवसर दें, तो अनेक मानसिक और सामाजिक समस्याओं का समाधान घर से ही शुरू हो सकता है। बच्चों को केवल सफलता की दौड़ में आगे बढ़ाना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें यह भी सिखाना होगा कि असफलता से कैसे निपटना है, क्रोध को कैसे नियंत्रित करना है, तनाव में खुद को कैसे संभालना है और असहमति के बावजूद दूसरे व्यक्ति का सम्मान कैसे बनाए रखना है।

यूँ तो विद्यालयों में नैतिक शिक्षा को भी केवल पाठ्यक्रम का विषय न बनाकर व्यवहार से जोड़ने की आवश्यकता है। बच्चों को राष्ट्र के प्रति प्रेम, समाज के प्रति जिम्मेदारी, परिवार के प्रति सम्मान, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और मानवता के मूल्यों को व्यावहारिक रूप से समझाना होगा। उन्हें यह बताया जाना चाहिए कि अधिकारों के साथ कर्तव्य भी होते हैं और स्वतंत्रता के साथ अनुशासन भी आवश्यक है। मानसिक स्वास्थ्य और जीवनशैली का विषय भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। आज की तेज रफ्तार जिंदगी में बच्चों और युवाओं पर पढ़ाई, प्रतियोगिता, करियर, सामाजिक अपेक्षाओं और डिजिटल दुनिया का दबाव बढ़ा है। ऐसे में योग, प्राणायाम, व्यायाम, ध्यान और तनाव प्रबंधन जैसी स्वस्थ आदतें जीवन का हिस्सा बननी चाहिए। इनका उद्देश्य किसी मानसिक स्वास्थ्य समस्या का अकेला इलाज बताना नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली और आत्मनियंत्रण की आदत विकसित करना होना चाहिए।

वहीं आवश्यकता पड़ने पर चिकित्सकों, अनुभव प्राप्त आध्यात्मिक गुरु, लाइफ़ स्टाइल कोच, व जरूरत के अनुसार विशेषज्ञों की सहायता लेने में भी किसी को संकोच नहीं करना चाहिए। क्रोध इसका एक सरल उदाहरण है। क्रोध आना मानवीय भावना है, लेकिन क्रोध में लिया गया निर्णय कई बार व्यक्ति, परिवार और समाज को लंबे समय तक प्रभावित कर सकता है। यदि बच्चों को छोटी उम्र से ही अपनी भावनाओं को पहचानने और उन्हें नियंत्रित करने की स्वस्थ तकनीक सिखाई जाए तो अनेक विवादों को बढ़ने से रोका जा सकता है। इसी तरह लगातार तनाव या निराशा से जूझ रहे व्यक्ति को समय पर परिवार, मित्रों और प्रशिक्षित विशेषज्ञों का सहयोग मिल जाए तो वह स्वयं को बेहतर तरीके से संभाल सकता है।

भारत की मर्यादाएं किसी किताब में बंद नियम नहीं हैं। वे हमारे दैनिक व्यवहार में दिखाई देती हैं—हम अपने माता-पिता से कैसे बात करते हैं, असहमति रखने वाले व्यक्ति के साथ कैसा व्यवहार करते हैं, सार्वजनिक स्थानों पर कैसी भाषा इस्तेमाल करते हैं और सोशल मीडिया पर क्या साझा करते हैं, क्या नहीं कर सकते हैं। इसलिए मर्यादा की रक्षा केवल वरिष्ठ पीढ़ी की जिम्मेदारी नहीं है। युवाओं को भी यह समझना होगा कि आधुनिकता का अर्थ अपनी जड़ों और शालीनता को छोड़ देना नहीं है। आज जरूरत किसी पीढ़ी को कठघरे में खड़ा करने की नहीं, बल्कि पीढ़ियों के बीच संवाद बढ़ाने की है। वरिष्ठ पीढ़ी को युवाओं की नई सोच समझनी होगी और युवाओं को वरिष्ठों के अनुभव का सम्मान करना होगा। परिवार, विद्यालय, समाज और सरकार-सभी को मिलकर एक ऐसा स्वस्थ वातावरण बनाना होगा जहां स्वतंत्र सोच के साथ जिम्मेदार आचरण भी विकसित हो।

भारत की ताकत उसकी विविधता के साथ-साथ उसके संस्कारों में भी रही है। यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ी को आधुनिक ज्ञान के साथ मानवीय मूल्य, आत्मसंयम, स्वस्थ जीवनशैली और सामाजिक जिम्मेदारी दे पाए, तो बदलते समय की चुनौतियों का सामना मजबूती से किया जा सकेगा। मर्यादाएं किसी पर थोपी नहीं जाती, वे संस्कारों से भीतर पैदा होती हैं। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि हम अपने बच्चों और युवाओं को केवल आगे बढ़ना सिखा रहे हैं या सही दिशा में आगे बढ़ना भी सिखा रहे हैं। हाल ही में जो जंतर मंतर पर हुआ, और जिस प्रकार से युवाओं की गहरी मानसिक सोच सामने आ गई, उससे यह प्रतीत होता है कि भारत जो एक पुरातन सांस्कृतिक राष्ट्र है जिसका आधार मर्यादा एवं उत्तम आचरण रहा है वह कुछ लोगों द्वारा गर्त की ओर ले जाने के लिए धकेला जा रहा है। भारत के संतों, ऋषियों मुनियों के पुण्य प्रताप एवं विभिन्न सामाजिक उत्थानकर्ताओं द्वारा दिए गए योगदान से भारत विश्व में अपनी एक अलग पहचान रखता है।

मैं ऐसा भी नहीं कह सकता कि यह प्रयास आज के दौर में जारी नहीं है। माता-पिता, संयुक्त कुटुंब एवं समाज के विभिन्न क्षेत्र में कार्यरत कार्यकर्ताओं के जागरूक न होने के कारण, या यूं कहें कि उदासीन रहने के कारण ऐसा लगता है कि यह स्थिति उत्पन्न हो रही है। हालांकि यह संख्या यदि भारत की जनसंख्या के हिसाब से देखा जाए तो बहुत ही कम है लेकिन सोशल मीडिया और आधुनिक संचार माध्यमों के मौजूदा स्वरूप की वजह से इनको आगे पहुंचाना बहुत आसान हो गया है। हालांकि यह एक गंभीर चिंता का विषय हो सकता है, क्योंकि युवा बिना प्रौढ़ एवं वरिष्ठ पीढ़ी के सहयोग से समाज में आगे बढ़ाने एवं प्रतिदिन के कार्यकलापों में कठिनाई महसूस कर सकते हैं। क्योंकि झुंड का व्यवहार अलग होता है और जब बच्चे अकेले होते हैं तो उनका व्यवहार बिल्कुल अलग होता है। काफी बच्चे निडर हैं लेकिन आज के बदलते पर्यावरण, खानपान और जीवन शैली की वजह से बहुत सारे बच्चे जल्दी भयभीत हो जाते हैं, तुरंत अपने से बड़ों की सहायता करते हैं।

यदि बच्चों की गहरी मानसिक सोच की छाप प्रौढ़ एवं वरिष्ठ पीढ़ी पर पड़ गई तो वह उनकी मदद के लिए कुछ संकोच तो जरूर करने लगेंगे। ऐसे में एक सामाजिक वैमनष्यता एवं असंतुलन उत्पन्न होने का भय हमेशा बना रहेगा। हालांकि जिस प्रौढ़ एवं वरिष्ठ पीढ़ी कि मैं बात कर रहा हूं, उनके संस्कार भी काफी गहरे हैं और इतनी जल्दी उनको इन बातों का असर नहीं पड़ेगा, किंतु स्थिति विचारणीय एवं सोचनीय जरूर है। स्कूलों में नैतिक शिक्षा, परिवार के माध्यम से नैतिक शिक्षा, बड़ों का आधार, धर्म के मूल्य, संस्कार, राष्ट्र के प्रति प्रेम, योगासन, प्राणायाम, व्यायाम, विभिन्न परिस्थितियों को नियंत्रित करने के लिए योग क्रियाएं, तनाव कम करने के उपाय, शरीर को स्वस्थ रखने के उपाय जैसी चीजें बच्चों को और उनके माता पिता को आज पता होना एवं सीखना बहुत जरूरी है। दो छोटे से उदाहरण से इसे समझा जा सकता है जैसे यदि किसी को क्रोध आता है तो वह उसके बस में नहीं होता किंतु यदि वह क्रोध को नियंत्रित करने की तकनीक समझ ले, सीख ले तो क्रोध की वजह से होने वाले शरीर एवं समाज को होने वाले बहुत सारे नुकसान बचाए जा सकते हैं। जो सब प्रकार से सबके लिए लाभदायक होगा।

इसी प्रकार से यदि किसी को लगातार तनाव रहता है और वह अवसाद में रहता है और वह कुछ ऐसी क्रियाएं तकनीक और खान-पान जीवन शैली सीख ले जिससे उसका तनाव और अवसाद काम हो सकता है तो उससे होने वाले बहुत सारी सामाजिक समस्याएं भी सुलझाई जा सकती हैं जिनमें से आत्महत्या की प्रवृत्ति या किसी को मार देने की प्रवृति प्रमुख है। समाज को इस पर गहन चिंतन करना होगा और इस पर ठोस काम करना होगा, ताकि भारतीय जीवन दर्शन व मानवीय मूल्य अप्रभावित रहें। दुर्भाग्यवश आज भारतीय युवाओं की मनोवृत्ति पर इस्लाम, ईसाइयत और यहुदियों की जो गहरी ‘हिंसक-प्रतिहिंसक छाप पड़ और बढ़ रही है, इसका निर्मूलन करने योग्य माहौल बनाना होगा ताकि सत्य और अहिंसा को बढ़ावा मिले तथा भोग की जगह त्याग की प्रवृत्ति पुनः प्रतिष्ठित की जा सके। इसी में सच्चा आनंद और सामाजिक सुख निहित है, जो राष्ट्रीय एकता व अखंडता का मूल है। इससे नक्सलवाद, आतंकवाद और संगठित अपराध की प्रवृति भी हतोत्साहित होगी तथा सर्वत्र सुख-शांति का मार्ग प्रशस्त होगा।

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