झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के संथाल समुदाय से आने वाले 33 साल रवि राज मुर्मू ने 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में इतिहास रच दिया. उनकी 12 मिनट की संथाली शॉर्ट फिल्म ‘आंगेन’ को Adivasi filmmaker Ravi Raj Murmu: बेस्ट डेब्यू फिल्म ऑफ ए डायरेक्टर का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला. खास बात यह है कि फीचर फिल्म बनाने के लिए उन्हें करीब सात साल तक कोई प्रोड्यूसर नहीं मिला, जिसके बाद उन्होंने उसी कहानी को शॉर्ट फिल्म के रूप में बनाया. सीमित बजट में बनी यह फिल्म अब संथाली भाषा की पहली राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म बन गई है. रवि की यह सफलता आदिवासी सिनेमा और लोककथाओं को नई पहचान दिलाने वाली मानी जा रही है.
नई दिल्ली. झारखंड के एक छोटे से आदिवासी गांव में बचपन बिताने वाला एक लड़का हर शाम अपने दादा-दादी और बुजुर्गों से लोककथाएं सुनता था. उन कहानियों में जंगल थे, नदियां थीं, आत्माओं की रहस्यमयी दुनिया थी और अपनी मिट्टी की खुशबू थी. वक्त बदला, वह लड़का मुंबई पहुंचा, बड़े OTT प्लेटफॉर्म्स के लिए काम किया लेकिन जब अपनी कहानी पर्दे पर उतारने की बारी आई तो 7 साल तक उसे एक भी प्रोड्यूसर नहीं मिला. करोड़ों रुपये की फंडिंग न मिलने के बावजूद उसने हार नहीं मानी. अपनी ही कहानी का 12 मिनट का छोटा रूप बनाया और 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में इतिहास रच दिया.
33 साल के आदिवासी निर्देशक रवि राज मुर्मू को लोग आज पहले शायद ही जानते होंगे. लेकिन आज दुनियाभर में लोग उन्हें जानने लगे हैं. झारखंड के संथाली समुदाय से आने वाले रवि राज मुर्मू की शॉर्ट फिल्म ‘आंगेन’ ने 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार में इतिहास रच दिया. फोटो साभार-@ravirajmurmu/Instagram
झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले के संथाली समुदाय से आने वाले रवि राज मुर्मू ने अपनी 12 मिनट की संथाली शॉर्ट फिल्म ‘अंगेन’ के लिए बेस्ट डेब्यू फिल्म ऑफ ए डायरेक्टर का राष्ट्रीय पुरस्कार जीत लिया है. यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि ‘आंगेन’ राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाली पहली संथाली भाषा की फिल्म बन गई है. इसके साथ ही यह किसी आदिवासी भाषा में बनी केवल दूसरी फिक्शन फिल्म है, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर यह सम्मान मिला है. फोटो साभार-@ravirajmurmu/Instagram
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इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 33 साल के रवि राज मुर्मू का बचपन झारखंड के एक छोटे से आदिवासी गांव में बीता. उस समय मनोरंजन के साधन बेहद सीमित थे. शाम होते ही परिवार के बड़े-बुजुर्ग बच्चों को संथाली लोककथाएं सुनाते थे. इन कहानियों में बोंगा (आदिवासी मान्यता के अनुसार आत्माएं), जंगल, नदियां और रहस्यमयी दुनिया का जिक्र होता था. यही कहानियां रवि के मन में बस गईं और आगे चलकर उनकी फिल्मों की सबसे बड़ी प्रेरणा बन गईं. फोटो साभार-@ravirajmurmu/Instagram
स्कूल की पढ़ाई गांव में पूरी करने के बाद रवि ने जमशेदपुर से मास कम्युनिकेशन की पढ़ाई की. इसके बाद उन्होंने फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया , पुणे से 2016 से 2019 के बीच फिल्म एडिटिंग में निपुणता हासिल की. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने मुंबई में रहते हुए नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम वीडियो, जियोसिनेमा और कई विज्ञापन फिल्मों के लिए काम किया. हालांकि, मुख्यधारा की इंडस्ट्री में काम करने के बावजूद उनका मन हमेशा अपने गांव और आदिवासी समाज की कहानियों में ही अटका रहा. फोटो साभार-@ravirajmurmu/Instagram
रवि बताते हैं कि उन्हें महसूस हुआ कि अगर उन्हें ईमानदारी से फिल्में बनानी हैं तो उन्हें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा. इसी सोच के साथ उन्होंने ‘अंगेन’ की कहानी लिखनी शुरू की. यह कहानी दरअसल एक फीचर फिल्म के रूप में लिखी जा रही थी, जिस पर वे करीब सात सालों से काम कर रहे हैं. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती फंडिंग थी. रवि के मुताबिक, इस फिल्म को फीचर फिल्म के रूप में बनाने के लिए करीब 25 से 30 करोड़ रुपये की जरूरत थी. कई निर्माताओं से बातचीत हुई, लेकिन कोई निवेश के लिए तैयार नहीं हुआ. आखिरकार उन्होंने फैसला किया कि पहले इसी कहानी का एक छोटा रूप बनाया जाए, ताकि लोगों को इसकी संभावनाएं दिखाई जा सकें. इसी सोच से 12 मिनट की शॉर्ट फिल्म ‘अंगेन’ बनी. फोटो साभार-@ravirajmurmu/Instagram
‘आंगेन’ संथाली लोककथा पर आधारित है. फिल्म का मुख्य किरदार सुक्कू नाम का एक बांसुरी वादक है, जिसकी धुन से आत्माओं की दुनिया में रहने वाली एक देवी मोहित हो जाती है. पानी के जरिए वह दूसरी दुनिया में पहुंच जाता है, लेकिन कुछ समय बाद उसे एहसास होता है कि उसका असली घर उसका गांव है. इसके बाद वह वापस लौटने की तलाश शुरू करता है. फिल्म का अंत जानबूझकर खुला छोड़ा गया है क्योंकि इसी कहानी पर पूरी फीचर फिल्म अभी बननी बाकी है. फोटो साभार-@ravirajmurmu/Instagram
रवि मुर्मू के मुताबिक, फिल्म सिर्फ एक पौराणिक कथा नहीं है, बल्कि यह आदिवासी समाज और प्रकृति के बदलते रिश्ते की कहानी भी है. तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण जंगल, जल स्रोत और वे स्थान लगातार खत्म हो रहे हैं, जिन्हें आदिवासी समुदाय अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक पहचान का हिस्सा मानता है. फिल्म में पानी को दो दुनियाओं के बीच पुल के रूप में दिखाया गया है. रवि का कहना है कि विज्ञान भी मानता है कि जीवन की शुरुआत पानी से हुई थी, इसलिए उन्होंने इसे फिल्म का केंद्रीय प्रतीक बनाया. फोटो साभार-@ravirajmurmu/Instagram
रवि बताते हैं कि उन्हें महसूस हुआ कि अगर उन्हें ईमानदारी से फिल्में बनानी हैं तो उन्हें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा. इसी सोच के साथ उन्होंने ‘आंगेन’ की कहानी लिखनी शुरू की. यह कहानी दरअसल एक फीचर फिल्म के रूप में लिखी जा रही थी, जिस पर वे करीब सात सालों से काम कर रहे हैं. लेकिन सबसे बड़ी चुनौती फंडिंग थी. रवि के मुताबिक, इस फिल्म को फीचर फिल्म के रूप में बनाने के लिए करीब 25 से 30 करोड़ रुपये की जरूरत थी. कई निर्माताओं से बातचीत हुई, लेकिन कोई निवेश के लिए तैयार नहीं हुआ. आखिरकार उन्होंने फैसला किया कि पहले इसी कहानी का एक छोटा रूप बनाया जाए, ताकि लोगों को इसकी संभावनाएं दिखाई जा सकें. इसी सोच से 12 मिनट की शॉर्ट फिल्म ‘आंगेन’ बनी.
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