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  • अंडमान-निकोबार के घने जंगलों में मिली नई जंगली बैंगन की दुर्लभ प्रजाति, अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित हुई खोज
  • इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र डॉ. लाल जी सिंह की उपलब्धि से देश का बढ़ा मान, अब तक 28 से अधिक नई वनस्पति प्रजातियों की कर चुके हैं खोज
  • रोग प्रतिरोधी बैंगन की नई किस्म विकसित करने की खुलीं संभावनाएं, पर्यावरण संरक्षण और कृषि अनुसंधान को मिलेगा नया आधार

उदय भूमि संवाददाता
प्रयागराज। इलाहाबाद विश्वविद्यालय की गौरवशाली वैज्ञानिक परंपरा में एक और स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है। विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र और भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण के वरिष्ठ वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. लाल जी सिंह ने अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह के घने जंगलों में जंगली बैंगन की एक नई और दुर्लभ प्रजाति की खोज कर अंतरराष्ट्रीय विज्ञान जगत में भारत का नाम रोशन किया है। उनकी यह खोज केवल वनस्पति विज्ञान की दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि भविष्य में रोग प्रतिरोधी बैंगन की नई किस्में विकसित करने की दिशा में भी मील का पत्थर साबित हो सकती है। इस नई प्रजाति का विस्तृत वैज्ञानिक विवरण प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वनस्पति शोध पत्रिका में प्रकाशित होने के बाद इसे वैश्विक वैज्ञानिक समुदाय ने भी महत्वपूर्ण उपलब्धि माना है। पूरब का ऑक्सफोर्ड कहे जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय का वनस्पति विज्ञान विभाग लंबे समय से अपनी शोध गुणवत्ता और वैज्ञानिक उपलब्धियों के लिए देश-विदेश में पहचान रखता है।

इसी विभाग से शिक्षा प्राप्त करने वाले डॉ. लाल जी सिंह ने वनस्पति विज्ञान में प्रोफेसर डी. आर. धर्मराज मिश्रा के निर्देशन में शोध उपाधि प्राप्त की और बाद में भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण में वैज्ञानिक के रूप में अपनी अलग पहचान बनाई। आज वे देश के अग्रणी पादप वर्गिकी वैज्ञानिकों में गिने जाते हैं। वर्तमान में डॉ. लाल जी सिंह अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह की जैव विविधता और वनस्पति संपदा पर शोध कर रहे हैं। अपने लंबे वैज्ञानिक जीवन में उन्होंने एक नए पादप वंश और 28 से अधिक नई वनस्पति प्रजातियों की खोज कर विज्ञान जगत को नई दिशा दी है। इनमें साइकस, केला, बैंगन, अदरक, करौंदा और अन्य आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पौधों की नई जंगली प्रजातियां शामिल हैं। इन खोजों का उद्देश्य केवल नई प्रजातियों का दस्तावेजीकरण नहीं, बल्कि कृषि और पर्यावरण संरक्षण के लिए उनके उपयोग की संभावनाओं को भी सामने लाना है।

हाल ही में डॉ. सिंह ने अंडमान द्वीप समूह के मध्य क्षेत्र के जंगलों से जंगली बैंगन की एक नई प्रजाति खोजी है, जिसका नाम  ‘सोलनम पाण्डेआई’ रखा गया है। इसका नामकरण दिल्ली विश्वविद्यालय के वरिष्ठ वनस्पति वैज्ञानिक प्रोफेसर अरुण कुमार पाण्डेय के सम्मान में किया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह नई प्रजाति बाह्य संरचना और आणविक स्तर पर अब तक ज्ञात सभी जंगली बैंगन प्रजातियों से पूरी तरह अलग है। इसकी वैज्ञानिक जानकारी अंतरराष्ट्रीय वनस्पति वर्गिकी एवं पादप भूगोल शोध पत्रिका के वर्ष 2025 के अंक में प्रकाशित की गई है। डॉ. सिंह के अनुसार अंडमान की आदिम निग्रिटो जनजाति और ग्रेट अंडमानी समुदाय इस जंगली बैंगन का उपयोग वर्षों से खाद्य पदार्थ और औषधि के रूप में करते रहे हैं। वहीं रांची और बंगाली समुदाय इसके पके नारंगी रंग के फलों से खट्टी-मीठी चटनी बनाते हैं। स्थानीय लोग इसे नारंगी बैंगन के नाम से पहचानते हैं। यह तथ्य दर्शाता है कि यह प्रजाति केवल वैज्ञानिक दृष्टि से ही नहीं बल्कि स्थानीय जीवन और पारंपरिक ज्ञान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है।

इस नई प्रजाति की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता है। शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने पाया कि इस पौधे में किसी भी प्रमुख फसल रोग का प्रभाव नहीं मिला। यही कारण है कि कृषि वैज्ञानिक इसे भविष्य में रोग प्रतिरोधी बैंगन की नई उन्नत किस्में विकसित करने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण आनुवंशिक आधार मान रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस प्रजाति पर आगे व्यापक अनुसंधान किया गया तो किसानों को अधिक उत्पादन देने वाली और रोगों से सुरक्षित नई किस्में उपलब्ध कराई जा सकती हैं। डॉ. लाल जी सिंह इससे पहले भी कई ऐतिहासिक खोज कर चुके हैं। उन्होंने अंडमान से जुरासिक काल के दुर्लभ पौधे साइकस धर्मराजाई की खोज की थी, जिसका नाम अपने गुरु प्रोफेसर डी. आर. धर्मराज मिश्रा के सम्मान में रखा। इसके अलावा उन्होंने दुनिया के सबसे बड़े पुष्पगुच्छ वाले जंगली केले मूसा इंडोअंडामानेन्सिस की भी खोज की, जिसे आज भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण और भारतीय संग्रहालय में संरक्षित किया गया है।

वनस्पति विज्ञान के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी डॉ. सिंह का योगदान उल्लेखनीय है। उन्होंने पर्यावरण हितैषी पुन: उपयोग योग्य पेय स्ट्रॉ का भी विकास किया, जिसे भारत सरकार ने पेटेंट प्रदान किया है। यह आविष्कार प्लास्टिक से बने एकल उपयोग वाले स्ट्रॉ का पर्यावरण अनुकूल विकल्प माना जा रहा है। डॉ. सिंह की वैज्ञानिक उपलब्धियों को देखते हुए उनके सम्मान में भी कई वनस्पति प्रजातियों का नामकरण किया जा चुका है। विज्ञान जगत में उनके शोध को भारत की जैव विविधता संरक्षण, कृषि विकास और पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय के शिक्षकों और शोधार्थियों ने डॉ. लाल जी सिंह की इस उपलब्धि पर गर्व व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी खोज ने न केवल विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई है, बल्कि यह भी सिद्ध कर दिया है कि भारतीय वैज्ञानिक विश्व स्तर पर मौलिक अनुसंधान और खोज के क्षेत्र में लगातार नए कीर्तिमान स्थापित कर रहे हैं। डॉ. सिंह की यह उपलब्धि युवा शोधार्थियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनने के साथ-साथ भारत की समृद्ध जैव विविधता के संरक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान की नई संभावनाओं का भी मार्ग प्रशस्त करती है।

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