लखनऊ की समिट बिल्डिंग में पिछले 6-7 महीनों से यह साइबर फ्रॉड का कॉल सेंटर संचालित हो रहा था. इस दौरान अमेरिकी नागरिकों से करीब 75 करोड़ रुपये की ठगी किए जाने की बात सामने आई है. इस साइबर फ्रॉड सिंडिकेट की जानकारी देने के लिए बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में कॉल सेंटर के ऑपरेशन मैनेजर अहमदाबाद निवासी ललित खैराजानी और विक्रम सिंह परमार को पेश किया गया.
ऐसे बनाते थे लोगों को शिकार
लखनऊ के पुलिस कमिश्नर अमरेंद्र सेंगर के मुताबिक, विदेशी नागरिकों, विशेषकर अमेरिकी नागरिकों को साइबर ठगी के लिए निशाना बनाया जा रहा था. साइबर ठगी का यह कॉल सेंटर कॉरपोरेट स्टाइल में बेहद संगठित तरीके से संचालित किया जा रहा था. अमेरिकी नागरिकों को निशाना बनाने के लिए कई टीमें बनाई गई थीं और हर टीम की अलग-अलग जिम्मेदारी थी.
पहली टीम लोगों से संपर्क करती थी. अमेरिकी नागरिकों को एसएमएस भेजकर बताया जाता था कि उनके Amazon, Apple या Samsung खाते का इस्तेमाल चाइल्ड पोर्नोग्राफी, ड्रग ट्रैफिकिंग और आतंकवादी गतिविधियों में हुआ है. इसके बाद उन्हें अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए एक टोल-फ्री नंबर पर कॉल करने के लिए कहा जाता था.
पीड़ित से लेते थे सारी जानकारी
टोल-फ्री नंबर पर कॉल आने के बाद दूसरी टीम (डायलर टीम) पीड़ित से सहानुभूति के साथ बात कर उसका भरोसा जीतती थी. उसे बताया जाता था कि उसके खाते का इस्तेमाल आपराधिक और आतंकवादी गतिविधियों में हुआ है. डायलर टीम पीड़ित का वित्तीय डेटा हासिल कर लेती थी और यह जताती थी कि वह गंभीर मुसीबत में फंस गया है. इसके बाद मामला आगे की कार्रवाई के लिए बैंकर टीम को सौंप दिया जाता था.
बैंकर टीम पीड़ित की बैंक संबंधी जानकारी सत्यापित करने के बहाने उसे बताती थी कि उसके खाते का इस्तेमाल गैरकानूनी गतिविधियों में हुआ है और उसमें संदिग्ध लेनदेन पाए गए हैं. इसके बाद उसे धमकी दी जाती थी कि उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है, उसे गिरफ्तार किया जा सकता है और उसका सोशल सिक्योरिटी नंबर और बैंक खाते फ्रीज किए जा सकते हैं. डरे हुए अमेरिकी नागरिक को अंतिम चरण में क्लोजर टीम के पास ट्रांसफर कर दिया जाता था. यह टीम पीड़ित को बताती थी कि वह इस कार्रवाई से कैसे बच सकता है.
क्लोजर टीम तीन तरीके बताती थी:
1. पीड़ित से कहा जाता था कि उसका बैंक खाता फ्रीज होने वाला है, इसलिए वह अपनी जमा रकम निकालकर उससे Amazon, Flipkart जैसी कंपनियों के गिफ्ट वाउचर खरीद ले. इसके बाद गिफ्ट वाउचर का नंबर और पिन लेकर उन्हें रिडीम कर लिया जाता था.
2. दूसरे तरीके में पीड़ित को एक क्यूआर कोड भेजा जाता था और उससे क्रिप्टो वॉलेट में पैसे ट्रांसफर कराए जाते थे.
3. तीसरे तरीके में अमेरिका की United States Postal Service (USPS) के माध्यम से नकदी, गहने, सोना-चांदी आदि मंगवाए जाते थे. बाद में इस रकम को हवाला के जरिए भारत भेजा जाता था.
वेतन के साथ ठगों को मिलता था बोनस
इसी रकम से कॉल सेंटर के कर्मचारियों को वेतन दिया जाता था. प्रत्येक कर्मचारी को लगभग 30 से 40 हजार रुपये मासिक वेतन मिलता था, जबकि कुछ लोगों को बोनस भी दिया जाता था. कर्मचारियों के आने-जाने की व्यवस्था भी की गई थी और उन्हें लखनऊ में ठहराया जाता था.
पुलिस कमिश्नर के मुताबिक, देश के लगभग हर राज्य से इस कॉल सेंटर के लिए लोगों की भर्ती की गई थी. विशेष रूप से अमेरिकन एक्सेंट में बात करने वाले और इंटरनेशनल कॉल सेंटर का अनुभव रखने वाले लोगों को नौकरी पर रखा गया था. अब शासन, केंद्रीय गृह मंत्रालय और विदेश मंत्रालय के माध्यम से भारतीय दूतावास के जरिए अमेरिकी नागरिकों को इस साइबर ठगी के बारे में जानकारी दी जाएगी. पुलिस कमिश्नर के अनुसार इस पूरे गिरोह के पीछे किसी भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक की भूमिका हो सकती है.
10 में से 3 लोग होते थे शिकार
आरोपियों को अमेरिकी नागरिकों का डेटा चार्ल्स नामक व्यक्ति उपलब्ध कराता था. पुलिस के मुताबिक, हर 10 कॉल में से लगभग 3 कॉल ठगी में बदल जाती थीं, जबकि 7 कॉल सफल नहीं हो पाती थीं. पुलिस कमिश्नर ने बताया कि गिरफ्तार आरोपियों के ऊपर भी कई लोग हैं, जिन्हें जल्द ट्रेस किया जाएगा. इस मामले के लखनऊ कनेक्शन की भी गहन जांच की जा रही है. पुलिस कमिश्नर के अनुसार, यह गिरोह पिछले करीब छह महीनों से समिट बिल्डिंग से संचालित हो रहा था और प्रतिदिन अमेरिकी नागरिकों से लगभग 35 से 40 लाख रुपये की ठगी कर रहा था.
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