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होमताजा खबरदेशजब निज़ाम की मदद के लिए पंजाब से आई लाहोरी फ़ौज, ऐसे बसी सिख छावनी

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Hyderabad Sikh Chawni History: हैदराबाद की सिख छावनी और गुरुद्वारा साहेब बारम्बाला महाराजा रणजीत सिंह और निज़ाम आसफ़ जाह चतुर्थ की ऐतिहासिक दोस्ती का प्रतीक हैं. साल 1832 में निज़ाम की मदद के लिए पंजाब से 1,400 सिख सैनिकों की ‘लाहोरी फ़ौज’ हैदराबाद आई थी. उनकी वीरता से प्रभावित होकर निज़ाम ने उन्हें यहीं बसा लिया. आज उनकी पीढ़ियां ‘डेक्कनी सिख’ कहलाती हैं जो पंजाबी के साथ-साथ तेलुगु और उर्दू भी सहजता से बोलती हैं और उत्तर-दक्षिण की साझी संस्कृति को दर्शाती हैं.

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Hyderabad: दक्षिण भारत के दिल कहे जाने वाले ऐतिहासिक हैदराबाद शहर में इतिहास की कई ऐसी परतें मौजूद हैं जो आज भी लोगों के मन में गहरा कौतूहल पैदा करती हैं. इन्हीं में से एक बेहद खास और ऐतिहासिक स्थान है किशनबाग इलाके में स्थित ‘सिख छावनी’ और ‘गुरुद्वारा साहेब बारम्बाला’. यह स्थान आज केवल एक पवित्र धार्मिक केंद्र भर नहीं है, बल्कि पंजाब के महान महाराजा रणजीत सिंह और हैदराबाद के निज़ाम के बीच की ऐतिहासिक दोस्ती तथा अद्वितीय सैन्य सहयोग का एक अनोखा और जीवंत प्रतीक माना जाता है.

इतिहास के जानकार और दस्तावेज़ बताते हैं कि इस अद्भुत धरोहर की शुरुआत साल 1832 के आसपास हुई थी. उस दौर में हैदराबाद के निज़ाम आसफ़ जाह चतुर्थ को अपने ही राज्य के कुछ शक्तिशाली जागीरदारों और आंतरिक विद्रोहियों से टैक्स वसूलने में काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा था. इसके साथ ही राज्य की कानून-व्यवस्था बनाए रखने में भी उनके सामने भारी चुनौतियां खड़ी थीं.

जब संकट में घिरे निज़ाम ने पंजाब से मांगी सैन्य सहायता
अपनी राजनीतिक और सैन्य स्थिति को मजबूत करने के लिए निज़ाम आसफ़ जाह चतुर्थ ने पंजाब के तत्कालीन शक्तिशाली शासक महाराजा रणजीत सिंह से विशेष सैन्य सहायता का अनुरोध किया. निज़ाम के इस कूटनीतिक आग्रह को सहर्ष स्वीकार करते हुए शेर-ए-पंजाब महाराजा रणजीत सिंह ने अपने करीब 1,200 से 1,400 जांबाज और अनुशासित सिख सैनिकों की एक विशेष टुकड़ी को हैदराबाद के लिए रवाना किया. इस जांबाज सैन्य टुकड़ी को इतिहास के पन्नों में ‘लाहोरी फ़ौज’ के नाम से जाना जाता है.

हैदराबाद पहुंचते ही सिख सैनिकों ने अपनी अभूतपूर्व वीरता, युद्ध कौशल और कुशल कूटनीति के बल पर बेहद कम समय में निज़ाम के राज्य में अशांति को पूरी तरह समाप्त कर दिया और शांति स्थापित कर दी.

‘लाहोरी फ़ौज’ की वफादारी से प्रभावित होकर निज़ाम ने दी छावनी
सिख सैनिकों की इस अटूट वफादारी, अद्वितीय शौर्य और कूटनीतिक अनुशासन से निज़ाम इतने ज्यादा प्रभावित हुए कि उन्होंने इस सेना को वापस पंजाब भेजने के बजाय हमेशा के लिए अपने ही राज्य की सुरक्षा व्यवस्था में शामिल कर लिया. इन सिख सैनिकों के सपरिवार ठहरने और रहने के लिए हैदराबाद के जिस खास क्षेत्र में सैन्य शिविर या छावनी का निर्माण किया गया, वही इलाका कालान्तर में ‘सिख छावनी’ के नाम से जगप्रसिद्ध हुआ.

डेक्कनी सिख: उत्तर और दक्षिण भारत की साझी संस्कृति की अनूठी मिसाल
सैकड़ों साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी यह पराक्रमी सैन्य टुकड़ी कभी वापस पंजाब नहीं लौटी और हमेशा के लिए हैदराबाद की माटी में रच-बस गई. आज इस ऐतिहासिक सिख छावनी में उन्हीं वीर सैनिकों की तीसरी और चौथी पीढ़ी पूरे मान-सम्मान के साथ निवास कर रही है, जिन्हें दुनिया भर में ‘डेक्कनी सिख’ (Deccani Sikhs) कहा जाता है.

समय के बदलते चक्र के साथ इन परिवारों ने दक्षिण भारत की समृद्ध संस्कृति को इस कदर आत्मसात कर लिया है कि वे न सिर्फ अपनी मातृभाषा पंजाबी, बल्कि तेलुगु, उर्दू, हिंदी और फारसी भाषाएं भी उतनी ही सहजता और मिठास के साथ बोलते हैं. ऐतिहासिक और पुरातात्विक दस्तावेजों के अनुसार, किशनबाग का गुरुद्वारा साहेब बारम्बाला आज भी उस अटूट सांस्कृतिक, धार्मिक और ऐतिहासिक गठबंधन की गवाही देता है, जिसने उत्तर और दक्षिण भारत के दो महान और शक्तिशाली साम्राज्यों को हमेशा-हमेशा के लिए एक अटूट सूत्र में पिरो दिया था.

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vicky Rathore

Vicky Rathore (born July 25, 1994) is a multimedia journalist and digital content specialist currently working with News18 Rajasthan. I have over 8 years of experience in digital media, where I specialize in cr…और पढ़ें

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