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PV Narasimha Rao Birthday: आज से ठीक 35 वर्ष पहले इसी जून माह में भारतीय राजनीति में दो ऐसी घटनाएं हुई थीं, जिनके बारे में किसी ने सोचा तक नहीं था. पहली, सियासी बियाबान में रह रहे एक नेता को अचानक देश की बागडोर सौंप देना और दूसरी, उसी शख्स द्वारा ऐसे व्यक्ति को देश का वित्त मंत्री बनाना, जिनका राजनीति से कोई वास्ता नहीं था. लेकिन इन दोनों घटनाओं ने देश की दशा और दिशा को बदलने में अहम भूमिका निभाई. इनमें से पहले शख्स थे पी. वी. नरसिम्हा राव जो 21 जून 1991 से 16 मई 1996 तक देश के प्रधानमंत्री रहे. दूसरे थे डॉ. मनमोहन सिंह, जो बाद में स्वयं भी भारत के प्रधानमंत्री के पद पर पहुंचे. राव के कार्यकाल को आर्थिक उपलब्धियों और साम्प्रदायिक त्रासदियों के मिले-जुले दौर के तौर पर याद किया जाता है. एक तरफ जहां उन्होंने 1991 में आए भीषण आर्थिक संकट से देश को बाहर निकाला, वहीं कालांतर में साम्प्रदायिक ताकतों को नियंत्रण में न रख पाने की वजह से देश धार्मिक उन्माद के चक्रव्यूह भी फंसता चला गया. इसी की परिणति बाबरी मस्जिद के विध्वंस के रूप में सामने आई. यहीं से देश धार्मिक ध्रुवीकरण की तरफ बढ़ा, जो आज और तेजी से पंख फैला चुका है.

‘कामचलाऊ’ व्यवस्था के तहत बने थे पीएम!

1991 के आम चुनावों के समय राव 71 साल के हो गए थे और अपने गृह प्रांत आंध्र प्रदेश में निर्लिप्त भाव से जिंदगी बसर कर रहे थे. लोकसभा चुनावों की पूरी प्रक्रिया से भी उन्होंने स्वयं को बाहर कर लिया था. संगठन बाबत उच्च स्तरीय निर्णय लेने वाली कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य भी वे नहीं थे. लेकिन फिर तमिलनाडु के श्रीपैरंबदूर में राजीव गांधी की हुई जघन्य हत्या के बाद हालात कुछ ऐसे बने कि कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने एक ‘सर्वसम्मत’ उम्मीदवार के तौर पर शीर्ष पद के लिए राव का नाम आगे बढ़ा दिया. दरअसल, उस समय अर्जुन सिंह और शरद पवार समेत कांग्रेस के अनेक दिग्गज नेता उन्हें कामचलाऊ व्यवस्था के तहत ऐसा ‘कारिंदा’ मानकर चल रहे थे, जो जल्दी ही सेवानिवृत्त हो जाएगा और फिर वे स्वयं सत्ता की बागडोर संभाल लेंगे. सोनिया गांधी को राव के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं थी. उनकी नजर में राव सिर्फ एक बुद्धिमान, विश्वसनीय तथा पार्टी के परम सम्माननीय वरिष्ठ नेता थे.

राव-सोनिया के बीच गहरी होती गई मतभेदों की खाई…

राव ने जिस होशियारी और तेजी से स्थितियों को अपने काबू में किया, उससे अर्जुन सिंह जैसे उनके प्रतिद्वंद्वी भौंचक रह गए. अर्जुन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस के एक धड़े ने सोनिया गांधी के निवास स्थल 10 जनपथ पर लगातार आना-जाना जारी रखा. राव के विरोधी सोनिया के मन में यह बात बैठाने में सफल रहे कि राव बेहद योजनाबद्ध ढंग से नेहरू-गांधी परिवार की विरासत की अहमियत को कम करते जा रहे हैं. अयोध्या विवाद हल करने में राव की अक्षमता, आर्थिक सुधार, राजीव गांधी हत्या षड्यंत्र मामले में जांच की सुस्त रफ्तार तथा राव के करीबी लोगों पर भ्रष्टाचार के आरोप जैसे मुद्दों ने सोनिया और उनके बीच की खाई को और गहरा कर दिया था.

फिर विन्सेंट जॉर्ज को टिकट न देना भारी पड़ा!

जनवरी 1992 में ऐसी घटना घटी, जिसका ऊपर से तो ज्यादा असर नजर नहीं आया, लेकिन बाद में वह राव को बहुत भारी पड़ी. सोनिया गांधी के निजी सचिव विन्सेंट जॉर्ज राज्यसभा में जाने के इच्छुक थे. पार्टी के ज्यादातर दिग्गज नेता, विशेषकर के. करुणाकरन और अर्जुन सिंह, जॉर्ज का नामांकन चाहते थे. राव ने सोनिया की मंशा जानने के लिए उनसे संपर्क किया कि क्या जॉर्ज को राज्यसभा का टिकट दे दिया जाए? तब सोनिया ने साफ कह दिया कि अगर पार्टी चाहे तो जॉर्ज को राज्यसभा का टिकट दिया जा सकता है, लेकिन यह निर्णय पूरी तरह किसी भी सदस्य की राजनीतिक उपयोगिता को देखकर ही लिया जाना चाहिए. राव ने पता नहीं इसका क्या मतलब निकाला, लेकिन अंतत: जॉर्ज को टिकट नहीं मिला.

लेकिन बाद के चार सालों (1992-96) में 10 जनपथ व 7 रेसकोर्स रोड के बीच अविश्वास की खाई गहरी करने में इस मुद्दे ने अहम भूमिका निभाई. कहा जाता है कि टिकट न दिए जाने से सोनिया के निजी सचिव प्रधानमंत्री राव के एक तरह से दुश्मन हो गए थे. प्रधानमंत्री व सोनिया गांधी के संबंधों में कटुता के लिए जॉर्ज को सबसे ज्यादा जिम्मेदार माना जाता है.

किताब में बताया था अयोध्या पर ‘अपना सच’!

वर्ष 2004 में सोनिया गांधी के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) की सरकार केंद्र में सत्तासीन हुई. इसके करीब 8 माह बाद 23 दिसंबर 2004 को राव का निधन हो गया. अंतिम समय में वे अयोध्या की घटनाओं पर केंद्रित एक पुस्तक पर काम करते रहे. अपनी मृत्यु से पूर्व वे किताब तैयार कर चुके थे, लेकिन इसे उन्होंने अपने जीवनकाल में प्रकाशित नहीं किया, बल्कि चाहते थे कि यह उनकी मृत्यु के एक साल बाद प्रकाशित की जाए. और उनकी इस इच्छा का सम्मान किया गया.

अंतत: 2006 में ‘अयोध्या 6 दिसंबर 1992’ शीर्षक से उनकी पुस्तक प्रकाशित हुई. इसमें उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि भाजपा ने मंदिर विवाद के हर संभावित हल का विरोध किया, ताकि अयोध्या मुद्दा सुलगता रहे. उन्होंने लिखा कि अगस्त 1992 तक ‘अराजनीतिक’ साधु-संन्यासियों से इस मुद्दे पर उनकी बात चलती रही कि ‘सांप्रदायिक सौहार्द को ठेस पहुंचाए बिना’ अयोध्या में कैसे और कहां राम मंदिर बनवाया जा सकता है. तभी अचानक साधुओं ने बात करने से मना कर दिया. इसके चार माह बाद ही कारसेवकों के समूहों ने मस्जिद गिरा दी. राव ने किसी का नाम लिए बगैर लिखा, ‘यह स्पष्ट था कि साधुओं की सोच बदल गई या बहुत हद तक उन राजनीतिक शक्तियों की, जो उन्हें नियंत्रित कर रही थीं. ये ताकतें जानबूझकर (इस विवाद) के शांतिपूर्ण हल वाले मामले से बाहर होना चाहती थीं, जो मेरे और संन्यासियों के बीच तय किया जा रहा था. अगर यह हो जाता तो मंदिर का मुद्दा पूरी तरह अराजनीतिक होकर रह जाता.’ इसमें राव यह भी रेखांकित करते हैं कि ‘बहुसंख्यकों में सांप्रदायिक सोच पैदा करने वाले’ एक राजनीतिक गिरोह की मजबूरी थी कि वह अयोध्या को ‘सतत उबलती रहने वाली एक समस्या’ बनाए रखे.

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