प्रस्तावित बुलेट ट्रेन कॉरिडोर राजधानी दिल्ली से अपनी यात्रा शुरू करेगा. यह ट्रेन लखनऊ, वाराणसी और पटना होते हुए सिलीगुड़ी तक पहुंचेगी. सिलीगुड़ी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों का सबसे अहम और इकलौता गेटवे है. यह सिक्किम, भूटान, दार्जिलिंग और पूर्वी हिमालय का मुख्य दरवाजा माना जाता है. यह भारत की दूसरी बुलेट ट्रेन लाइन होगी. फिलहाल मुंबई-अहमदाबाद कॉरिडोर पर काम चल रहा है और यह 2027 में शुरू होने वाली है.
सिलीगुड़ी लंबे समय से खुद को देश के आखिरी छोर पर महसूस करता रहा है. अब देश की सबसे फास्ट रेलवे का डेस्टिनेशन बनना इसके लिए बहुत बड़ी बात है. यह खबर सिलीगुड़ी के लोगों में गजब का करंट दौड़ा रही है. लेकिन सिलीगुड़ी को कोई भी जश्न मनाने से पहले कुछ जरूरी बातों पर जरूर ध्यान देना चाहिए. दुनिया के बाकी हिस्सों में बुलेट ट्रेन की कहानी कैसे आगे बढ़ी है. इसका एनालिसिस करना हमारे लिए बहुत जरूरी हो जाता है.
जापान का शिंकानसेन मॉडल: बुलेट ट्रेन ने वहां की इकॉनमी को कैसे बदला है?
- बुलेट ट्रेन के असली असर को समझने के लिए जापान सबसे बेहतरीन उदाहरण है. जापान ने दुनिया में सबसे लंबे समय तक बुलेट ट्रेन चलाई है. इसलिए वहां का डेटा हमारे सामने सबसे क्लियर तस्वीर पेश करता है. वहां की ओरिजिनल तोकाइडो शिंकानसेन लाइन 1964 में शुरू हुई थी. इस लाइन ने टोक्यो, नागोया और ओसाका को एक साथ जोड़ दिया था.
- सेंट्रल जापान रेलवे कंपनी के प्रेसिडेंट ने ‘द वर्ल्डफोलियो’ को दिए एक इंटरव्यू में कुछ बहुत अहम आंकड़े बताए थे. ये तीनों मेट्रो शहर जापान की केवल एक चौथाई जमीन पर बसे हुए हैं. लेकिन इन शहरों में जापान की 60 प्रतिशत आबादी रहती है. इसके अलावा यह इलाका जापान की लगभग 65 प्रतिशत इकोनॉमिक आउटपुट को भी अपने पास होल्ड करता है.
- शिंकानसेन को जापानी इकॉनमी की रीढ़ की हड्डी कहना सिर्फ एक आकर्षक स्लोगन नहीं है. सेंटर फॉर इकोनॉमिक पॉलिसी रिसर्च के एक कॉलम में अहम रिसर्च पब्लिश हुई थी. इसके अनुसार अगर इस बुलेट ट्रेन नेटवर्क को हटा दिया जाए तो नेशनल वेलफेयर में 6.5 प्रतिशत की भारी गिरावट आ जाएगी. ‘इन्फ्रास्ट्रक्चर’ जर्नल की एक स्टडी में भी चौंकाने वाली बात सामने आई. जिन शहरों में बुलेट ट्रेन स्टेशन बने वहां की आबादी 22 प्रतिशत ज्यादा तेजी से बढ़ी है.
कैसे बुलेट ट्रेन ने जापान में छोटे शहरों का बहुत बड़ा नुकसान कर दिया?
ऊपर बताई गई बातें सिर्फ तस्वीर का एक पॉजिटिव पहलू हैं. इसका दूसरा हिस्सा यानी फाइन प्रिंट देखना भी हमारे लिए बहुत जरूरी है. जापानी रिसर्च का ही एक हिस्सा यह भी बताता है कि बुलेट ट्रेन का फायदा हमेशा एकतरफा रहा है. ‘ट्रांसपोर्ट पॉलिसी’ जर्नल में 2023 में एक बहुत अहम पेपर पब्लिश हुआ था. इसका टाइटल ‘डबल-एज्ड ट्रेन्स’ रखा गया था. इस स्टडी में पाया गया कि किसी शहर में रेल कनेक्टिविटी बढ़ने से उसकी कुल इनकम में 0.43 प्रतिशत का इजाफा हुआ. लेकिन यह फायदा केवल टोक्यो और पहले से समृद्ध बड़े हब तक ही पूरी तरह सीमित रहा.
कई छोटे शहरों के लिए बुलेट ट्रेन का असर न के बराबर था या फिर पूरी तरह नेगेटिव ही रहा. ट्रेन ने पैसे और टैलेंट का मूवमेंट काफी आसान बना दिया था. लेकिन इस बात की कोई गारंटी नहीं थी कि यह पैसा और टैलेंट छोटे शहरों की तरफ ही जाएगा. ज्यादातर मामलों में टैलेंट और पैसा छोटे शहरों से निकलकर बड़े हब में शिफ्ट हो गया.
चीन के बुलेट ट्रेन नेटवर्क ने विकास किया या छोटे शहरों के रिसोर्सेज को बड़े शहरों में खींच लिया?
- चीन का उदाहरण बुलेट ट्रेन के इसी दोहरे पहलू को बहुत बड़े लेवल पर दिखाता है. हार्वर्ड के ‘जर्नलिस्ट्स रिसोर्स’ के अनुसार चीन की बुलेट ट्रेन अब बहुत ज्यादा पैसेंजर्स लेकर चलती है. यह संख्या चीन की सभी घरेलू एयरलाइंस के कुल यात्रियों से लगभग दोगुनी हो चुकी है.
- ‘पीएनएएस’ जर्नल में हाई-स्पीड रेल पर एक अहम स्टडी पब्लिश हुई थी. इसके अनुसार कनेक्टेड शहरों में मार्केट पोटेंशियल बढ़ने का 59 प्रतिशत क्रेडिट इसी हाई-स्पीड रेल को जाता है. बीजिंग, शंघाई और ग्वांगझू के आसपास के कई टियर-टू शहरों में वास्तव में बूम आया था.
- इन शहरों ने मेगासिटी से बाहर निकले वर्कर्स और कंपनियों को अपने यहां बहुत आसानी से जगह दी. लेकिन जिन छोटे और बाहरी कस्बों को बुलेट ट्रेन तो मिली पर इंडस्ट्रियल बेस नहीं मिला उनका बहुत बुरा हाल हुआ. रिसर्चर्स ने इसके लिए एक शब्द इस्तेमाल किया है जिसे साइफन इफेक्ट कहते हैं.
- ‘सिटीज’ जर्नल में 2023 में 237 चीनी शहरों का डिटेल एनालिसिस किया गया. इसमें पाया गया कि इन कस्बों का सर्विस सेक्टर अब बड़े शहरों में पूरी तरह शिफ्ट हो गया है. बड़े शहर अब उनके लिए सिर्फ एक घंटे की दूरी पर थे. ऐसे में दो बड़े शहरों के बीच फंसे छोटे कस्बों की हालत सबसे ज्यादा खराब हो गई.
फ्रांस की टीजीवी ट्रेन का मॉडल हमें क्या सिखाता है?
- यूरोप का अनुभव भी बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट्स के लिए एक बड़ी चेतावनी की तरह काम करता है. यह कहानी हर सिटी प्लानिंग ऑफिस के बोर्ड पर चिपका देनी चाहिए. फ्रांस ने 1980 के दशक की शुरुआत में अपना हाई-स्पीड नेटवर्क बनाया था. इसे टीजीवी यानी ट्रेन ए ग्रांडे विटेसे नाम दिया गया था. यह पूरे यूरोप महाद्वीप का सबसे पहला हाई-स्पीड रेल नेटवर्क था.
- इस प्रोजेक्ट के समर्थक लिल शहर का उदाहरण देना बहुत ज्यादा पसंद करते हैं. यह फ्रांस का एक उत्तरी शहर है जिसने पेरिस-लंदन-ब्रुसेल्स ट्रायंगल के बीच खुद को एक बड़े हब में बदल लिया. लेकिन चार दशक बाद सामने आया रिजल्ट काफी विचार करने वाला है.
- ‘जर्नल ऑफ ट्रांसपोर्ट जियोग्राफी’ में एक बहुत बड़ी तुलनात्मक स्टडी पब्लिश हुई थी. इसके अनुसार फास्ट ट्रेनों ने रीजनल कैपिटल को तो बहुत ज्यादा मजबूत किया. लेकिन इसके आसपास के छोटे इंडस्ट्रियल कस्बों को इससे कोई खास फायदा नहीं मिला.
- रेल ग्रुप ‘ग्रीनगेज 21’ के असेसमेंट ने भी एक बहुत अहम पॉइंट नोट किया. ले मैंस और टूर्स जैसे शहरों में रहने वाले लोग पहले पेरिस वीकली जाते थे. फास्ट ट्रेन आने के बाद वे हर दिन अप-डाउन करने लगे. ट्रेन ने बड़े शहरों की नौकरियों को छोटे शहरों में बिल्कुल शिफ्ट नहीं किया. इसने बस छोटे शहरों के वर्कर्स को राजधानी तक हर रोज भेजना आसान बना दिया.
दिल्ली से सिलीगुड़ी तक बुलेट ट्रेन चलाने में कितना खर्च आएगा?
बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट्स की लागत कभी भी कम नहीं होती है. इसके नंबर्स देखकर ही इसमें शामिल बड़े रिस्क का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है. 508 किलोमीटर लंबी मुंबई-अहमदाबाद लाइन का शुरुआती बजट लगभग 1.08 लाख करोड़ रुपये तय किया गया था. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक देरी के कारण इसका फाइनल खर्च 2 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है.
इसका मतलब है कि ट्रैक के हर एक किलोमीटर पर लगभग 200 करोड़ रुपये का भारी खर्च आएगा. यह पूरा खर्च ट्रेन के ट्रैक पर उतरने से पहले का है. दिल्ली-सिलीगुड़ी कॉरिडोर की कुल लंबाई मुंबई-अहमदाबाद लाइन से कम से कम तीन गुना ज्यादा होगी.
अगर हम बहुत पॉजिटिव होकर भी सोचें तो यह प्रोजेक्ट कई लाख करोड़ रुपये की डिमांड करेगा. यह पब्लिक कैपिटल का एक बहुत बड़ा और रिस्की इन्वेस्टमेंट है. इसे फ्यूचर की इकॉनमी को गिरवी रखकर फाइनेंस किया जाएगा. इसलिए यह सवाल बहुत मायने रखता है कि इस बड़े प्रोजेक्ट से आखिर सीधा फायदा किसे होने वाला है.
सिलीगुड़ी की जियोग्राफिकल लोकेशन कैसे गेम चेंजर बन सकती है?
- बुलेट ट्रेन किसी भी शहर के लिए एक तेज एक्सलरेटर की तरह काम करती है. अगर इसे किसी ऐसे शहर से जोड़ा जाए जिसके पास अपना खुद का मजबूत बेस हो तो चमत्कार हो सकता है. जिस शहर में यूनिवर्सिटी, मैन्युफैक्चरिंग हब, डीप सर्विस सेक्टर और एंटरप्रेन्योर क्लास मौजूद हो वहां यह पक्का ग्रोथ लाती है. यह ऐसे शहर में अगले दस सालों के लिए विकास का एक नया इंजन स्टार्ट कर सकती है.
- लेकिन अगर बुलेट ट्रेन को सिर्फ एक ट्रांजिट पॉइंट वाले शहर में लाया जाए तो रिजल्ट बहुत खतरनाक हो सकता है. यह आसानी से उस शहर को एक ऐसी जगह में बदल सकती है जहां से लोग सिर्फ गुजरते हैं. वे अपना पैसा किसी बड़े शहर में जाकर खर्च करना ज्यादा पसंद करते हैं. यहीं पर सिलीगुड़ी की जियोग्राफिकल लोकेशन इसकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है. बस शर्त यह है कि इसका सही और स्मार्ट तरीके से इस्तेमाल किया जाए.
- सिलीगुड़ी पूरे पूर्वोत्तर भारत का सबसे अहम और प्रैक्टिकल गेटवे है. यह हिमालयन टूरिज्म इकॉनमी और चाय बागानों तक पहुंचने का बहुत अहम रास्ता है. इसके जरिए भूटान, नेपाल और बांग्लादेश के साथ बड़े लेवल पर क्रॉस-बॉर्डर ट्रेड भी होता है. दिल्ली से छह घंटे की कनेक्टिविटी हिमालयी क्षेत्र में टूरिस्ट्स की भारी बाढ़ ला सकती है.
बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के बाद सिलीगुड़ी का टैलेंट और बिजनेस कहीं बड़े शहरों की तरफ तो शिफ्ट नहीं हो जाएगा?
अगर सिलीगुड़ी अपने लोकल इन्फ्रास्ट्रक्चर पर तेजी से काम करता है तो उसे बड़े फायदे मिल सकते हैं. कई मल्टीनेशनल कंपनियां अपने बैक-ऑफिस और लॉजिस्टिक्स हब यहां आसानी से बना सकती हैं.
यहां जमीन और लेबर की लागत कम है और बुलेट ट्रेन के कारण नेशनल रीच बहुत आसान हो जाएगी. ऐसा होने पर सिलीगुड़ी भी लिल शहर की तरह एक मजबूत क्रॉसरोड बन सकता है. लेकिन इसका दूसरा डरावना पहलू यह है कि बुलेट ट्रेन सिलीगुड़ी के लिए एक साइफन भी बन सकती है.
इसी फास्ट लाइन का इस्तेमाल करके सिलीगुड़ी के सबसे होनहार ग्रेजुएट्स बड़े शहरों में शिफ्ट हो सकते हैं. यहां की मजबूत और महत्वाकांक्षी लोकल कंपनियां भी बड़े मार्केट की तरफ जा सकती हैं. पीछे सिर्फ एक चमकता हुआ बड़ा रेलवे स्टेशन और एक खाली होती इकॉनमी ही बच जाएगी.
दुनिया के हर उस देश में यही डिसाइडिंग फैक्टर रहा है जिसने बुलेट ट्रेन का यह मॉडल अपनाया है. क्या बुलेट ट्रेन के साथ लोकल ट्रांसपोर्टेशन, इंडस्ट्रियल लैंड और स्किलिंग प्रोग्राम भी वहां आए. यह सवाल सबसे ज्यादा जरूरी है और इसका जवाब खोजना होगा.
सिलीगुड़ी को साइफन इफेक्ट से बचाने के लिए क्या कदम उठाने होंगे?
- सिलीगुड़ी को साइफन इफेक्ट से बचाने के लिए सिर्फ ट्रेन के आने का इंतजार करना काफी नहीं होगा. राज्य सरकार और केंद्र सरकार के पॉलिसी मेकर्स को मिलकर एक कंबाइंड स्ट्रेटजी बनानी होगी. स्टेशन के आसपास नए इंडस्ट्रियल पार्क डेवलप करने की बहुत ज्यादा जरूरत है. ताकि बाहर से आने वाली कंपनियां यहां अपना नया सेटअप आसानी से लगा सकें.
- इसके अलावा सिटी के लोकल ट्रांसपोर्ट को भी बहुत बेहतर करना होगा. अगर बुलेट ट्रेन स्टेशन तक पहुंचने के लिए शहर के अंदर लंबे जाम में फंसना पड़े तो कोई फायदा नहीं होगा. टूरिज्म को सिर्फ एक सीजन तक सीमित रखने की बजाय उसे साल भर का बिजनेस बनाना होगा.
- दार्जिलिंग, गंगटोक और डुआर्स जाने वाले टूरिस्ट्स को सिलीगुड़ी में रुकने का कोई सॉलिड कारण देना होगा. इसके लिए शहर में वर्ल्ड-क्लास एंटरटेनमेंट जोन, शॉपिंग हब और बड़े कन्वेंशन सेंटर बनाने होंगे. युवाओं के लिए नए स्किल डेवलपमेंट सेंटर्स खोलने होंगे ताकि उन्हें लोकल लेवल पर ही अच्छी जॉब मिल सके. अगर इन सभी चीजों पर अभी से काम शुरू नहीं किया गया तो बुलेट ट्रेन सिर्फ एक टूरिस्ट एक्सप्रेस बनकर रह जाएगी.
- बुलेट ट्रेन किसी भी शहर को सिर्फ दूसरे शहर से कनेक्ट नहीं करती है. यह दो अलग-अलग इकोनॉमिक जोन्स को भी आपस में पूरी तरह मर्ज कर देती है. जब दिल्ली की मजबूत इकॉनमी सिलीगुड़ी की इमर्जिंग इकॉनमी से सीधे टकराएगी तो इसका इम्पैक्ट बहुत बड़ा होगा. सिलीगुड़ी को खुद को एक मजबूत सर्विस प्रोवाइडर के रूप में डेवलप करना होगा. यहां के लोकल बिजनेस और मार्केट्स को तेजी से डिजिटल और मॉडर्न बनाना होगा.
- रेलवे मिनिस्ट्री को भी सिर्फ पटरियां बिछाने तक अपना काम सीमित नहीं रखना चाहिए. उसे राज्य सरकारों के साथ मिलकर एक ऐसा मजबूत इकोसिस्टम बनाना चाहिए जो हमेशा सस्टेनेबल हो. अगर सिलीगुड़ी एक मजबूत कमर्शियल हब बनता है तो इसका सीधा फायदा पूरे नॉर्थईस्ट को मिलेगा. गुवाहाटी, शिलॉन्ग और ईटानगर जैसे शहरों के लिए सिलीगुड़ी एक बहुत मजबूत बेस बन जाएगा.
कुल मिलाकर बात सिर्फ इतनी है कि स्पीड कोई जादू की छड़ी नहीं होती है. बुलेट ट्रेन से जो बड़ी अपॉर्चुनिटी मिलेगी उसका फायदा उठाने के लिए सिलीगुड़ी को अपनी पिच खुद तैयार करनी होगी. जब दिल्ली से सिलीगुड़ी का सफर छह घंटे में पूरा होगा तो सबसे बड़ी हेडलाइन उसकी रफ्तार ही होगी. लेकिन असली कहानी इस बात से तय होगी कि यह रीजन बुलेट ट्रेन को कैसे ट्रीट करता है. इसे एक फिनिश लाइन मान लिया जाता है या फिर एक शुरुआती गन की तरह इस्तेमाल किया जाता है. यह सब सिलीगुड़ी के मजबूत विजन पर ही डिपेंड करेगा.
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