Bollywood superhit film 1982 : जिस फिल्म की कहानी पूरी यूनिट को पसंद ना आए, कहानी भी आधी-अधूरी हो, उसी स्टोरी पर बनी मूवी सुपरहिट साबित हो जाए तो इसे चमत्कार ही कहा जाएगा. डायरेक्टर-प्रोड्यूसर और राइटर की मेहनत के चलते ही यह संभव हुआ. सबने मिलकर फिल्म को संपूर्णता दी. यह फिल्म ना केवल कामयाब रही, बल्कि उस साल की दूसरी सबसे ज्यादा कमाई करने वाली मूवी बनी. 41 साल पहले ऐसी ही एक फिल्म सिनेमाघर में आई थी जिसका एक-एक गाना आज भी सुपरहिट है. एक-एक सीन लोगों के जेहन में बसा हुआ है. फिल्म आज कल्ट क्लासिक मूवी का दर्जा रखती है. इस फिल्म को चाहे कितनी भी बार देखें, मन नहीं भरता है. फिल्म की कहानी इतना लगाव पैदा कर देती है कि एक मिनट के लिए भी स्क्रीन से दर्शक नजरें नहीं हटा पाते.
जिस फिल्म की कहानी आधी-अधूरी हो और पूरी यूनिट को कहानी पसंद ना आए लेकिन वही स्टोरी डायरेक्टर-प्रोड्यूसर के मन में ऐसी बसी कि उन्होंने सबके विरोध के बावजूद मूवी बनाने का फैसला लिया. फैसला कितना चुनौतीपूर्ण रहा होगा, इसका अंदाजा लगा पाना आसान नहीं है. राइटर की मदद से फिल्म को की कहानी को पूरा किया. बाद में कहानी को इस अंदाज में दर्शकों के सामने पेश किया जरा भी अहसास नहीं हुआ कि फिल्म अधूरी है. फिल्म की सफलता में सबसे बड़ा हाथ म्यूजिक ने निभाया. म्यूजिक सदाबहार संगीतकार लक्ष्मीकांत प्यारेलाल का था. ऐसा म्यूजिक जिसका असर पिछले 41 साल से बरकरार है. सिने प्रेमियों के दिल में म्यूजिक रच-बस गया. यह फिल्म थी प्रेम रोग जिसका डायरेक्शन-प्रोडक्शन राज कपूर ने किया था.
ऋषि कपूर-पद्मिनी कोल्हापुरे स्टारर ‘प्रेम रोग’ एक म्यूजिकल रोमांटिक ड्रामा फिल्म थी जो कि 30 जुलाई 1982 को रिलीज हुई थी. स्क्रीनप्ले जैनेंद्र जैन और कामना चंद्रा ने मिलकर लिखा था. वैसे यह मूवी लेखिका कामना चंद्र की पहली फिल्म थी. कामना चंद्र ने अपनी मां से एक रियल लाइफ कहानी सुनी थी. उन्होंने यह कहानी राज कपूर को सुनाने का फैसला किया. उन दिनों राज कपूर ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ बना रहे थे. जब कामना चंद्रा ने यह कहानी राज कपूर को सुनाई तो वहां पर मौजूद किसी भी शख्स को यह कहानी पसंद नहीं आई थी. कामना चंद्रा कहानी सुनाते समय फॉक सॉन्ग भी गाकर सुनाती थी. राज कपूर को फॉक सॉन्ग पसंद आए. उन्होंने फिल्म बनाने का फैसला किया. कामना चंद्रा की कहानी अधूरी थी. फिल्म के इंटरवल के बाद जो कुछ भी दिखाया जाता है, उसे राज साहब ने अपने से जोड़ा था.
ऋषि कपूर उन दिनों बहुत बिजी थे. यह पहला मौका था जब राज साहब को ऋषि कपूर से डेट्स एडजस्ट करनी पड़ीं. राज कपूर चाहते थे कि ऋषि ही फिल्म का निर्देशन करें लेकिन वो बहुत व्यस्त थे. फिर तय हुआ कि स्क्रीनप्ले-डायलॉग राइटर जैनेंद्र जैन फिल्म का डायरेक्शन करेंगे. जब डिस्ट्रीब्यूटर्स को पता चला तो उन्होंने राज कपूर से ऐसा ना करने के लिए कहा. उनका कहना था कि फिल्में राज कपूर के नाम से चलती है. अंत में राज कपूर ने ही इस मूवी का डायरेक्शन किया. राज साहब ने ऋषि कपूर से कहा था कि मुझे फिल्म में तुम्हारे चेहरे पर दिलीप कुमार जैसा सीरियस इंटेंस लुक चाहिए. यह दूसरा मौका था जब ऋषि कपूर ने राज कपूर के निर्देशन में काम किया. पहले मधु कपूर यह फिल्म करने वाली थीं. फिर पद्मिनी कोल्हापुरे इस फिल्म की नायिका बनी. राज कपूर ने एक विधवा के रूप में उनका स्क्रीन टेस्ट भी लिया था. पद्मिनी तब 20 साल की भी नहीं थीं.
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‘प्रेम रोग’ में राज कपूर के तीनों बेटे काम कर रहे थे. रणधीर कपूर प्रोडक्शन मैनेजर थे. राजीव कपूर असिस्टेंट डायरेक्टर थे. ऋषि कपूर हीरो थे. कहा जाता है कि फिल्म की शूटिंग के दौरान राजीव कपूर-पद्मिनी कोल्हापुरे के बीच बढ़ी नजदीकियों से राज कपूर परेशान हो गए थे. ऐसे में दोनों की वार्निंग भी थी. पद्मिनी कोल्हापुरे की ऑनस्क्रीन मां का रोल नंदा ने निभाया था.
‘प्रेम रोग’ फिल्म का सदाबहार म्यूजिक लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने कंपोज किया था. गीतकार संतोष आनंद, पंडित नारायण शर्मा और अमीर ककलबाश थे. गीतकार पंडित नारायण शर्मा ने भंवरे ने खिलाया फूल फूल को ले गया राजकुमार’ लिखा था. गाना एम्स्टर्डम में फिल्माया गया था. जून महीने में वहां पर ट्यूलिप के पौधे लगा दिए जाते हैं. एम्स्टर्डम में दिन में बहुत देर से अंधेरा होता है, इसलिए क्रू ने काफी लंबे समय तक शूटिंग की. गाना पूरे नौ दिन में फिल्माया गया था. गाना कितना शानदार शूट हुआ, बताने की जरूरत नहीं. गाना कई कारणों से खास है. लंबे-लंबे तीन अंतरे हैं. एक-एक लाइन को खास तरीके से कंपोज किया गया है. लता मंगेशकर-सुरेश वाडकर ने उतनी ही खूबसूरती से इसे गाया है. इस गाने में लता दीदी की हंसी-खिलखिलाहट भी सुनाई देती है. गाने का फिल्मांकन असाधारण है.
फिल्म का हर गाना सिचुएशन और कहानी के अनुरूप था. बैकग्राउंड म्यूजिक कमाल का था. फिल्म के अन्य पॉप्युलर गाने थे : ये प्यार था या कुछ और था (सुधा मल्होत्रा-अनवर) मैं हूं प्रेमरोगी (सुरेश वाडकर), मोहब्बत है क्या चीज हमको बताओ (लता मंगेशकर-सुरेश वाडकर) और ये गलियां ये चौबारा (लता मंगेशकर). लता मंगेशकर की आवाज प्रेम रोग के गानों में स्पेशल है. एक गाने में अलाप तो दूसरे गाने में उनकी हंसी मंत्रमुग्ध कर देती है. अमीर कजलबाश ने यादगार गाना ‘मेरी किस्मत में तू नहीं शायद’ लिखा था.
शम्मी कपूर ने फिल्म में पद्मिनी कोल्हापुरे के ताऊ का रोल निभाया था. यह पहला और आखिरी मौका था जब उन्होंने राज कपूर के निर्देशन में काम किया. फिल्म में रजा मुराद ने पद्मिनी कोल्हपुरे के जेठ का किरदार निभाया था. फिल्म जब शुरू होती है तो कलरफुल रहती है लेकिन जब पद्मिनी कोल्हापुरे के साथ हादसा हो जाता है तो पूरे सीन सफेद रंग के बेजान नजर आते हैं. यह इस बात का प्रतीक था कि सबकुछ बेरंग हो गया है. मनोरमा की जिंदगी उदास है. पद्मिनी जब हंसती हैं तो फूल खिलते नजर आते हैं. उसी समय गाना
‘भंवरे ने खिलाया फूल फूल को ले गया राजकुमार’ शुरू होता है. गाने के जरिये यह दिखाने की कोशिश की गई जैसे मनोरमा की जिंदगी में रंग भर जाएंगे. फिल्म का एक और यादगार गाना ‘ये गलियां ये चौबारा’ था. गाना आज तक सुपरहिट है.
फिल्म में हर कलाकार का काम बहुत अच्छा था. फिल्म को चार फिल्मफेयर अवॉर्ड मिले थे. बेस्ट डायरेक्टर का अवॉर्ड राज कपूर, बेस्ट एक्ट्रेस पद्मिनी कोल्हापुरे, बेस्ट लिरिसिस्ट संतोष आनंद ((मोहब्बत है क्या चीज), बेस्ट एडिटिंग राज कपूर. इन सबके बावजूद ‘प्रेम रोग’ फिल्म कम प्राइस पर बेचनी पड़ी थी. दरअसल, इस फिल्म के रिलीज से पहले ऋषि कपूर-पद्मिनी कोल्हापुरे की फिल्म ‘जमाने को दिखाना है’ फ्लॉप हो गई थी. फिल्म को 85% ओपनिंग मिली थी. फिल्म का बजट पौने तीन करोड़ था. नेट कलेक्शन 6.5 करोड़ था. बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म सुपरहिट साबित हुई थी. यह 1982 की सबसे ज्यादा कमाई करने वाली फिल्म की लिस्ट में दूसरे नंबर पर थी. पहले नंबर पर सुभाष घई की फिल्म ‘विधाता’ थी.
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