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<strong>Jyeshtha Amavasya vrat puja vidhi: </strong>ज्येष्ठ मास की अमावस्या, जिसे ज्येष्ठ अमावस्या या पितृ अमावस्या भी कहा जाता है, हिन्दू धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। यह दिन विशेष रूप से पितृ तर्पण और श्राद्ध के लिए पूजा जाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किए गए व्रत और दान का पुण्य पूर्वजों की आत्मा की शांति और परिवार की समृद्धि के लिए अत्यंत लाभकारी होता है।<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/religious-article/jyeshtha-month-dos-and-donts-2026-126050200005_1.html" target="_blank">Jyeshtha Month 2026: ज्येष्ठ माह में क्या करें और क्या नहीं?</a></strong>


 


इस दिन सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करना, घर को साफ करना और पूजा स्थल की शुद्धता बनाए रखना आवश्यक है। इसके साथ ही व्रत करने वाले लोग पूरे दिन फलाहार या एक समय का हल्का भोजन करते हैं। ज्येष्ठ अमावस्या को तिल, जल, चावल और पंचामृत से पितरों की तर्पण करने का विशेष महत्व है।


 


इस व्रत के माध्यम से व्यक्ति न केवल अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि देता है बल्कि अपने जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, स्वास्थ्य, समृद्धि और सुख-शांति भी प्राप्त करता है। इसके साथ ही गरीबों को दान और भोजन देने से पुण्य की प्राप्ति होती है। शनिवार, 16 मई 2026 को वट सावित्री व्रत, शनि जयंती, मासिक कार्तिगाई, दर्श अमावस्या, ज्येष्ठ अमावस्या आदि पर्व भी मनाए जाएगे।


 


यदि आप भी इस वर्ष ज्येष्ठ अमावस्या व्रत का पालन करना चाहते हैं, तो यहां हम आपको पूजा विधि, तर्पण का समय या मुहूर्त, मंत्र और दान की जानकारी विस्तार से बता रहे हैं।


 
  • ज्येष्ठ अमावस्या 2026 शुभ मुहूर्त
  • संपूर्ण पूजा विधि
  • प्रातः काल की तैयारी
  • पितृ तर्पण (दोपहर के समय)
  • शनि जयंती पूजा
  • वट सावित्री पूजा (सुहागिन महिलाओं के लिए)
  • दीपदान और संध्या पूजा
  • व्रत के नियम और खान-पान
  • ज्येष्ठ अमावस्या के विशेष दान
 

यहां ज्येष्ठ अमावस्या की संपूर्ण व्रत और पूजा विधि दी गई है:

ज्येष्ठ अमावस्या 2026 शुभ मुहूर्त/ शनि जयंती पूजा का समय

<strong>तिथि: 16 मई 2026 (शनिवार)</strong>


अमावस्या तिथि प्रारंभ: 16 मई, प्रातः 05:11 बजे


अमावस्या तिथि समाप्त: 17 मई, मध्यरात्रि 01:30 बजे


ब्रह्म मुहूर्त- 04:07 ए एम से 04:48 ए एम


अभिजित मुहूर्त- 11:50 ए एम से 12:45 पी एम

संपूर्ण पूजा विधि

1. प्रातः काल की तैयारी

स्नान: सूर्योदय से पूर्व उठकर किसी पवित्र नदी, सरोवर या घर पर ही गंगाजल मिले पानी से स्नान करें।


 


सूर्य अर्घ्य: तांबे के लोटे में जल, लाल चंदन और लाल फूल डालकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।


 


संकल्प: हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें- &#039;हे पितृ देव और भगवान विष्णु, मैं अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु ज्येष्ठ अमावस्या का व्रत रख रहा/रही हूं।&#039;<strong>ALSO READ: <a href="https://hindi.webdunia.com/jay-hanuman/adhik-maas-2026-jyeshtha-month-8-bade-mangal-mahatva-126050600031_1.html" target="_blank">अधिक मास में बना दुर्लभ संयोग: ज्येष्ठ माह में 8 बड़े मंगल, जानें इसका खास महत्व</a></strong>


 

2. पितृ तर्पण (दोपहर के समय)

अमावस्या पर पितरों के निमित्त तर्पण दोपहर के समय यानी कुतुप काल में करना श्रेष्ठ होता है।


 


हाथ में काले तिल, कुशा और जल लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों को जल अर्पित करें।


 


पितरों की शांति के लिए &#039;गीता&#039; के सातवें अध्याय का पाठ करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है।


 

3. शनि जयंती पूजा

चूंकि इसी दिन शनि जयंती है, अतः शनि मंदिर जाकर शनि देव का सरसों के तेल से अभिषेक करें।


 


यदि शनि दोष हो तो उन्हें नीले फूल और काले तिल अर्पित करें। &#039;ॐ शं शनैश्चराय नमः&#039; मंत्र का जाप करें।


 

4. वट सावित्री पूजा (सुहागिन महिलाओं के लिए)

बरगद (वट) के वृक्ष की जड़ों में जल अर्पित करें।


 


वृक्ष पर रोली, अक्षत और फूल चढ़ाएं।


 


सूत के कच्चे धागे या मोली को वृक्ष के चारों ओर 108 बार परिक्रमा करते हुए लपेटें।


 


भीगे हुए चने और फल का भोग लगाएं।


 

5. दीपदान और संध्या पूजा

शाम को पीपल के पेड़ के नीचे सरसों के तेल का दीपक जलाएं।


 


मान्यता है कि अमावस्या की शाम को मुख्य द्वार पर दीपक जलाने से पितर प्रसन्न होकर लौटते हैं।


 

व्रत के नियम और खान-पान

इस दिन तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस) और नशीले पदार्थों का पूरी तरह त्याग करें।


 


व्रत रखने वाले को दिन में सोना नहीं चाहिए।


 


यदि पूर्ण उपवास संभव न हो, तो शाम को सात्विक भोजन या फल ग्रहण किया जा सकता है।


 

ज्येष्ठ अमावस्या के विशेष दान

ज्येष्ठ माह की गर्मी को देखते हुए इन वस्तुओं का दान &#039;अश्वमेध यज्ञ&#039; के समान फल देता है:


 


<strong>जल सेवा: </strong>राहगीरों को पानी या शरबत पिलाना।


 


<strong>मिट्टी का घड़ा: </strong>पानी से भरा हुआ घड़ा दान करना।


 


<strong>छाता और चप्पल: </strong>गर्मी से बचाव के लिए इनका दान।


 


<strong>अन्न दान: </strong>चावल, चने की दाल और काले तिल का दान।


 


<strong>नोट: </strong>इस दिन गरीब और जरूरतमंद लोगों को सताना नहीं चाहिए, बल्कि उन्हें भोजन करवा कर अपने सामर्थ्य के अनुसार दान दें, क्योंकि शनि देव गरीबों के अपमान से रुष्ट हो जाते हैं।


 

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