बॉलीवुड की चमक-दमक अक्सर स्क्रीन पर दिखने वाले स्टार्स तक ही सीमित रहती हैं, लेकिन उस चमक के पीछे की दिल को छू लेने वाली आवाजें और जादुई धुनें ही एक फिल्म को अमर बनाती हैं. बॉलीवुड म्यूजिक हिस्ट्री में एक समय ऐसा था, जब हर दूसरी फिल्म के क्रेडिट रोल पर एक ही परिवार का दबदबा था- ‘राठौर परिवार’. रूप कुमार राठौर, विनोद राठौर, और श्रवण राठौर… ये तीन भाई म्यूजिक के तीन पिलर हैं, जिनके बिना 90s का गोल्डन एरा कभी पूरा नहीं होता. जहां श्रवण की धुनों ने ‘आशिकी’ में धूम मचा दी, वहीं विनोद की एनर्जी ने गोविंदा को ‘नंबर 1’ बना दिया और रूप कुमार की गंभीरता ने शाहरुख खान के रोमांस में जान डाल दी. यह इन तीन भाइयों के अटूट डेडिकेशन और एक म्यूजिकल लेगेसी की कहानी है जो आज भी लाखों दिलों में गूंजती है.
नई दिल्ली. जब हम 90 के दशक के हिंदी सिनेमा के बारे में सोचते हैं, तो हम सिर्फ रंगीन कॉस्ट्यूम या बड़े सेट के बारे में नहीं सोचते, बल्कि उन गानों के बारे में सोचते हैं जो आज भी यूट्यूब पर सबसे ज्यादा सुने जाते हैं. अगर उस जमाने में कोई एक परिवार म्यूजिक की दुनिया का ‘बेताज बादशाह’ था, तो वह राठौर परिवार था. पंडित चतुर्भुज राठौर के तीन बेटों श्रवण, विनोद और रूप कुमार ने म्यूजिक के तीन अलग-अलग पहलुओं को अपनाया और बॉलीवुड को वह मुकाम दिया जिसकी आज कल्पना करना भी मुश्किल है. (तस्वीर बनाने में एआई की मदद ली गई है.)
1. श्रवण राठौर: राठौर भाइयों में सबसे बड़े श्रवण राठौर ने अपनी जादुई उंगलियों से म्यूजिक डायरेक्शन की दुनिया में धूम मचा दी. उनकी जोड़ी ‘नदीम-श्रवण’ ने नदीम सैफी के साथ 1990 की फिल्म ‘आशिकी’ से तहलका मचा दिया, जिसने बॉलीवुड की पूरी दिशा बदल दी. 80 के दशक के आखिर तक बॉलीवुड में एक्शन और शोरगुल वाले म्यूजिक का बोलबाला हो गया था, लेकिन श्रवण राठौर ने मेलोडी को फिर से मेनस्ट्रीम में ला दिया. श्रवण का म्यूजिक सिंपल था, फिर भी उसमें क्लासिकल रागों की मिठास थी जो आम आदमी और अमीर लोगों, दोनों को पसंद आती थी. ‘साजन’, ‘फूल और कांटे’, ‘दीवाना’, ‘राजा हिंदुस्तानी’ और ‘परदेस’ जैसी फिल्मों के म्यूजिक ने साबित कर दिया कि श्रवण सिर्फ धुनें नहीं बनाते थे, बल्कि फिल्म की आत्मा लिखते थे. श्रवण राठौर की खासियत थी एक सिंगर की आवाज की काबिलियत को पहचानना. उन्होंने कुमार सानू और अलका याग्निक जैसे कलाकारों को म्यूजिक की दुनिया में सबसे ऊपर पहुंचाया, एक नई परिभाषा बनाई. उनके बिना 90 के दशक का रोमांटिक दौर कभी मुमकिन नहीं होता.
2. विनोद राठौर: जब श्रवण पर्दे के पीछे से धुनें बना रहे थे, तब उनके छोटे भाई विनोद राठौर अपनी आवाज से पर्दे पर स्टार्स के किरदारों में जान डाल रहे थे. विनोद राठौर को बॉलीवुड के सबसे वर्सेटाइल सिंगर्स में से एक माना जाता है. जहां लोग उन्हें अक्सर उनके ‘मजेदार’ गानों के लिए ही जानते हैं, वहीं उनकी रेंज काफी बड़ी थी. वह गोविंदा के लिए लकी चार्म साबित हुए. ‘कुली नंबर 1’, ‘राजा बाबू’ और ‘हीरो नंबर 1’ जैसी फिल्मों में गोविंदा के डांस मूव्स के साथ उनकी आवाज के तालमेल ने उन्हें आम लोगों का सिंगर बना दिया. लेकिन, उनका टैलेंट सिर्फ कॉमेडी तक ही सीमित नहीं था. शाहरुख खान की सबसे बड़ी फिल्म ‘बाजीगर’ के टाइटल ट्रैक और ‘डर’ के गानों में विनोद ने जो इंटेंसिटी दिखाई, उसने शाहरुख खान को विलेन और लवर के तौर पर स्थापित करने में मदद की. ‘नायक नहीं खलनायक हूं मैं’ गाने में विनोद ने जो बेस और गहराई डाली, उसने संजय दत्त के करियर को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया. वह एक ऐसे सिंगर थे जो गाने के मूड के हिसाब से अपनी आवाज का टेक्सचर बदल सकते थे.
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3. रूप कुमार राठौर: सबसे छोटे भाई रूप कुमार राठौर ने म्यूजिक की दुनिया में अपने लिए एक खास जगह बनाई. जहां उनके भाइयों ने बॉलीवुड की चमक-दमक को अपनाया, वहीं रूप कुमार ने गजल गाने और क्लासिकल म्यूजिक की गरिमा को बॉलीवुड के साथ जोड़ा. उनकी आवाज में एक ऐसा संतुलन और गहराई है जो सीधे रूह तक पहुंचती है. रूप कुमार राठौर का नाम सुनते ही सबसे पहले जो बात दिमाग में आती है, वह है फिल्म ‘बॉर्डर’ का गाना ‘संदेशे आते हैं’. इस एक गाने ने उन्हें अमर कर दिया. जिस तरह से उन्होंने देशभक्ति और जुदाई के दर्द को अपनी आवाज में पिरोया, वह आज भी हर सुनने वाले की आंखों में आंसू ला देता है. शाहरुख खान की फिल्म ‘वीर-जारा’ के गाने ‘तेरे लिए’ और ‘रब ने बना दी जोड़ी’ के गाने ‘तुझ में रब दिखता है’ जैसे बाद के गानों ने साबित कर दिया कि रूप कुमार दिल को छू लेने वाले म्यूजिक के बेताज बादशाह हैं. वह सिर्फ एक प्लेबैक सिंगर ही नहीं, बल्कि एक तबला प्लेयर और म्यूजिक के गहरे जानकार भी हैं. उनकी आवाज ने बॉलीवुड को वह इज्जत दी जो अक्सर कमर्शियल फिल्मों में खो जाती है.
बॉलीवुड में ऐसा बहुत कम होता है कि एक ही परिवार के सदस्य एक ही प्रोजेक्ट में अलग-अलग रोल निभाएं. लेकिन राठौर भाइयों ने ऐसा कई बार किया. ऐसी कई फिल्में थीं जिनमें श्रवण ने म्यूजिक बनाया, विनोद ने प्लेबैक दिया और रूप कुमार ने गजल या क्लासिकल गाने गाए. यह उनके आपसी तालमेल और एक-दूसरे के सम्मान का नतीजा था. इन तीनों भाइयों की सफलता का सबसे बड़ा कारण उनके पिता पंडित चतुर्भुज राठौर थे. उन्होंने न सिर्फ अपने बेटों को म्यूजिक सिखाया, बल्कि उनमें म्यूजिक के लिए ऐसा डेडिकेशन भी डाला जो आज के समय में बहुत कम देखने को मिलता है. राठौर भाइयों ने कभी एक-दूसरे से मुकाबला नहीं किया, बल्कि वे एक-दूसरे के पूरक थे. विनोद और रूप कुमार की आवाजें, श्रवण की धुनों के साथ, म्यूजिक पसंद करने वालों के लिए एक दावत थीं. (तस्वीर बनाने में एआई की मदद ली गई है.)
आज के जमाने में जब म्यूजिक मशीनों और रीमिक्स से चलता है, राठौर भाइयों का काम एक टेक्स्टबुक है. 2021 में श्रवण राठौर के जाने से म्यूजिक की दुनिया में एक ऐसा खालीपन आ गया जो कभी नहीं भरा जा सकेगा. लेकिन जो धुनें वे पीछे छोड़ गए, वे अमर रहेंगी. विनोद राठौर और रूप कुमार राठौर अपनी कला के जरिए उस विरासत को संभाले हुए हैं.
वे सिर्फ सिंगर या कंपोजर नहीं थे. वे उस जमाने के ‘म्यूजिकल सुल्तान’ थे, जिन्होंने बॉलीवुड को ग्लोबल पहचान दिलाई. चाहे वह ‘परदेसी परदेसी’ का दर्द हो, ‘बाजीगर’ का जुनून हो या ‘संदेशे आते हैं’ की देशभक्ति हो… राठौर भाइयों ने हमें हर इमोशन को जीने के लिए एक धुन दी.
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