कन्या महाविद्यालय, रीवा के प्रोफेसर डॉ. मुकेश एंगल के अनुसार, ये शैलचित्र मानव सभ्यता के शुरुआती काल की मित्रता, कला और संस्कृति का जीता-जागता उदाहरण हैं. यह खजाना न केवल स्थानीय बल्कि वैश्विक महत्व का है.
इनमें प्राकृतिक जीवन का सटीक चित्रण किया गया है. सिरमौर की इन पेंटिंग्स को हड़प्पा कालीन सभ्यता के समकालीन माना जा रहा है. सिरमौर के शैलचित्र संरक्षण के अभाव में तेजी से खराब हो रहे हैं. शैलचित्रों में इस्तेमाल रंग प्राकृतिक और टिकाऊ हैं.
प्राकृतिक कारण: बारिश और बदलते मौसम के कारण पेंटिंग्स का रंग फीका पड़ रहा है.
मानव गतिविधियां: गिट्टी तोड़ने वाले स्थानीय लोगों ने कई चट्टानों को नुकसान पहुंचाया है.
सिरमौर के इन शैलचित्रों को मिले महत्व
प्रोफेसर मुकेश एंगल का मानना है कि जिस तरह भीमबेटका को संरक्षण और पर्यटन के लिहाज से बढ़ावा दिया गया है, सिरमौर के इन शैलचित्रों को भी वैसा ही महत्व मिलना चाहिए. सिरमौर की रॉक पेंटिंग्स का एक दिलचस्प पहलू यह है कि मौसम के अनुसार इनके रंग बदलते हैं.
गर्मियों में: ये चित्र हल्के और फीके नजर आते हैं.
बरसात के मौसम में: ये गहरे और स्पष्ट दिखते हैं.
इन चित्रों में आदिमानवों की रोजमर्रा की गतिविधियों को दर्शाया गया है, जैसे शिकार करना, नृत्य करना, और हाथियों की झलक दिखाई गई है. स्थानीय समुदायों में इन शैलचित्रों के महत्व के प्रति जागरूकता की कमी है. लोग इन दुर्लभ धरोहरों को लेकर लापरवाह हैं. कई चट्टानों पर अनावश्यक छेड़छाड़ और तोड़फोड़ हो रही है. रीवा इतिहासकारों और पुरातत्वविदों का कहना है कि यदि इन पेंटिंग्स को सही तरीके से संरक्षित किया जाए, तो यह क्षेत्र न केवल पर्यटन का प्रमुख केंद्र बन सकता है, बल्कि वैश्विक धरोहर के रूप में भी मान्यता प्राप्त कर सकता है.
धार्मिक स्थल के रूप में पहचान
सरकार द्वारा सिरमौर को धार्मिक और पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने की योजना पर काम किया जा रहा है. रॉक पेंटिंग्स के आसपास रंग-रोगन का कार्य शुरू हो चुका है.
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